ज्योति चावला

ज्योति  चावला



ज्योति चावला का जन्म ५ अक्टूबर १९७९ को दिल्ली में हुआ. नया ज्ञानोदय, आलोचना, वागर्थ, प्रगतिशील वसुधा, परिकथा, पाखी आदि पत्र पत्रिकाओं में कवितायेँ एवं कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं. ज्योति ने 'पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस' से प्रकाशित 'श्रेष्ठ हिंदी कहानियां' (१९९०-2000) का संपादन भी किया है. इनका पहला कविता संकलन शीघ्र ही आने वाला है.


ज्योति चावला आज के युवा लेखकों में अपनी कहानियों और कविताओं के माध्यम से एक सशक्त पहचान बना चुकी हैं. कविता से कहानी और कहानी से कविता में आवाजाही उन्हें दोनों विधाओं में एक अलग अंदाज का कवि-लेखक बनाती है. ज्योति की कविताओं में आज की स्त्री जीवन की विडम्बना एवं उन विडंबनाओं से जूझने का माद्दा स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है. इनके पास वह जामुनी आभा है, जिसमें एक ऐसी शाश्वतता होती है जो शताब्दियाँ बीतने के बावजूद अपने जीवट से न केवल खुद को बरकरार रखता है बल्कि तमाम स्मृतियों, संस्कृतियों को सहेजे रहता है. इनकी कविताओं में वह लडकी है जो अपना जीवन जीते हुए प्रेम करने का दुस्साहस करती है, उसमें वह सारी तकलीफों, सारे भय को भूल जाती है, फिर भी उसे हकीकत पता है की घर लौटते ही उस पर तमाम शर्तें, नियम और कानून लागू हो जायेंगे, जिसे आम तौर पर हमारे समाज में आज भी लड़कियों पर थोप दिया जाता है.

संपर्क-  अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण विद्यापीठ,  अकादमिक कामप्लेक्स,  जी ब्लाक, इग्नू,  मैदानगढ़ी, नयी दिल्ली-६८.

मोबाइल- ०९८७१८१९६६६

ई-मेल: jyoti_chl@rediffmail.com


पिता के जाने पर





पिता माँ की जिन्दगी और
हमारे बचपन से कब गये
ठीक- ठीक कुछ याद नहीं



स्मृतियाँ बेहद धुंधली हैं जो
जुडी हैं पिता की उपस्थिति से
पिता के साथ हम कहाँ-कहाँ घूमें
उनके कंधे पर बैठ कितनी यात्राये कीं
कितनी बार उन्होंने झिड़का
और कितनी बार पुचकारा
कितनी बार उनसे डर कर हम माँ के
आँचल के झुटपुटे में हम दौड़ कर जा छुपे
याद करने पर भी हाथ खाली ही रह जाते हैं



लेकिन पिता की अनुपस्थिति दर्ज नहीं है हमारे जीवन में
यह कहना उनकी उपस्थिति को ठुकराना होगा


पिता को न जाने कितने मौकों और पडावों पर
अनुपस्थित पाया है हमने
उनकी अनुपस्थिति ने अकेला किया है माँ को
और रीता किया है संबंधों को
उनकी अनुपस्थिति से हमारे कई संबोधन छूट गये अधूरे ही
पिता होते तो पूरा जो हो पाता माता-पिता का मुहावरा



अगर होते पिता तो बेटे के व्याह पर
होते माँ की आँखों में आंसू की जगह पैरों में थिरकन
होते पिता तो होता एक कंधा माँ के लिए भी
पिता किसी परिवार के लिए केवल एक पुरुषवाची संज्ञा ही नहीं
बल्कि एक सम्पूर्णता हैं.





जामुन का पेड़




मेरे घर के पास वाली सड़क के किनारे
हुआ करता था एक जामुन का पेड़
 
बेहद घना और विशाल
इतना उंचा की मैं सोचा करती थी कि
पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर चढ़ कर
छूआ जा सकता है आसमान भी



उस पेड़ से जुड़ें हैं मेरे बचपन की ढेरों स्मृतियाँ
जामुन के इस पेड़ के नीचे खेलते कूदते हम हुए हैं बड़े
कई बार माँ से रूठ कर घंटों बैठी हूँ इस पेड़   के नीचे
और तब भरी दोपहर में इस पेड़ ने दी है मुझे
माँ के आँचल सी छाँव और भर पेट भोजन



जामुन के मौसम में अपनी झोली में बटोरे ढेर सारे जामुन
आज भी याद है मुझे
कई बार झुला झुला है सावन के मौसम में
झूले की पींग पर  ऊपर तक जाते हुए डरती थी मैं
लेकिन साथ ही यह विश्वास भी की जामुन का यह पेड़
मुझे गिरने नहीं देगा



गर्मी में अक्सर बिजली गुल हो जाने पर
खूब लगा करती थी बैठक इसी पेड़ के नीचे
और हमें मिल जाता था मौका हुडदंग मचाने का



हम भाई-बहनों और साथ बढ़ते हुए दोस्तों के बीच
क्या जगह थी इस पेड की शब्दों में नहीं बता सकती
घर से दूर घर को याद् करते हुए साथ खडा
दिख जाया करता था वही जामुन का पेड



आज का कई दिनों बाद घर गयी तो देखा
जामुन का वह पेड अब नहीं है वहां
घरों की इमारतें जितनी ऊँची होती जा रही हैं
उतने ही छोटे होते जा रहे हैं उनके दिल
और उन छोटे दिलों में नहीं अंट पाता
वह विशाल जामुन का पेड



अब नहीं है वह पेड वहां और
मेरे घर की पहचान अब अधूरी जान पड़ती है



अब राहगीरों को होगी मेरा घर ढूढने में कठिनाई
कि मोड़ पर खड़ा वह पेड अब कहीं इशारा नहीं करेगा



खुली  रोशनी और हवा को रोकते उस पेड का
वहां न होना ही अच्छा है
हम बचपन के साथियों ने एक मृत बुजुर्ग की तरह
उस पेड को भीगी आँखों से दे दी है  विदा



अब नहीं लौटेगा वह पेड बूढ़े दादा और दादी की तरह
अब हमारी स्मृतियों का एक कोना सूना ही रहेगा
सदा के लिए...





लड़की





वह लड़की जो चलती फिरती सड़क के किनारे
बैठी है अपने प्रेमी के साथ हाथों में हाथ डाले
उसके लिए यह दुनिया अभी वीरान   
यह चलती फिरती सडक किसी नदी का निर्जन किनारा




वह लड़की जो अपने प्रेमी से बातें करते हुए
उसमें खो सी गयी है उसे नहीं याद इस समय
लड़की होने कि सारी शर्तें, नियम और कायदे



इस समय प्यार में डूबी वह लड़की नहीं जानती
दुनिया और समाज के दायरे जैसा कुछ भी
उसकी सृष्टी तो समां सी गयी है उसके प्रेमी में
जीसे वह जीवन का अंतिम सत्य मान
भूल गयी है सब कुछ



उस लड़की के भूले हुए सब कुछ में शामिल हैं
उसके लड़की होने का सत्य
बचपन से ले कर अब तक सिखायी गयी वे सीखें
उसका समाज और समाज में तय किया गया
उसका छोटा सा कोना



प्यार में डूबी इस लड़की के होठो को
जब छू     लेता है उसका प्रेमी बीच सड़क पर अपने होठो से
तब वह दुनिया को इस प्रेम का गवाह मान
सौप देती है खुद को उसकी बाँहों में
और घर लौटने के वे रास्ते उसे गड्ड मड्ड से दिखने लगते हैं



लेकिन लड़की को अभी लौटना है वापस उसी घर में
जहाँ लौटे ही नदी का किनारा
चलती फिरती सड़क में बदल जायेगा
और जहाँ लागू होंगे फिर से वही नियम कायदे
और वही शर्तें
लड़की के पहुँचने से पहले पहुँच चुकी होगी
वह सड़क और सड़क के लोग उसके घर तक
लड़की फिर तब्दील हो जाएगी लड़की में




रहना यूँ ही जैसे रहे तुम सदा से






मुझे याद है वो दिन
जब कहा था मैंने तुमसे
सुनो मुझे भी तुमसे प्यार है


मैं चाहूंगी तुमको वैसे ही
जैसे चाहा था हीर ने रांझे को
लैला ने मजनू को
शीरी ने फ़रहाद को
तुम्हें आकंठ डूब कर प्यार करूंगी मै
और तुमने मेरे उस भावात्मक उद्वेग को
ठीक बीचोबीच रोक दिया था
कहा था तुमने की नहीं चाहिए तुम्हें अपने लिए
कोई हीर, कोई लैला या कोई शीरी
कहा था तुमने हम प्यार में रहेंगे वैसे ही
जैसे रहे हैं हम सदा से
मैं सब कुछ हो कर भी रहूंगा मै ही
और तुम चाहना मुझे सिर्फ तुम हो कर



सच कहूँ उस दिन तुम्हारी वह बात
कुछ बुरी सी लगी थी मुझे
की तुम नहीं चाहोगे कभी मुझे उतनी शिद्दत से
जितनी शिद्दत से मजनू ने चाहा लैला को
फरहाद ने चाहा शीरी को और
चाहा रांझे ने अपनी हीर को
कभी नहीं पार करोगे तुम मेरे लिए कोई उफनती नदी
या कोई तूफान



आज इतने बरसों बाद जब मैं देखती हूँ तुम्हारे प्यार को
यह की मेरे बिन तुम्हारा जीवन अधूरा  है तुम्हारे लिए
की तुम्हारे बिन मेरा जीवन बे अर्थ
तब लगता है की अच्छा ही है
जो तुम्हारे प्यार में नहीं था कोई उद्वेग
की तुम आज भी वहीँ हो
जहाँ थे तुम कई बरसों पहले
जब मिले थे हम एक दूजे से
मैं जानती हूँ जीवन का कोई उद्वेग, कोई हलचल
तुम्हे डिगा नहीं सकती मुझे चाहने से



तुम मुझमें और मैं तुम में उतने ही हैं
जितना बाकी है समुद्र में नमक
जितना बाकी है सृष्टि में जीवन



एक सवाल



आज जब पंखे से टंगी है उसकी लाश
और घर भर में शोर है मातम का
अचानक कई सवाल उठ खड़े हुए हैं



मोहल्ले के लोग कहते हैं की उसका चक्कर था
किसी लड़के के साथ और
उसका वह प्रेमी मिलने आता था
रोज शाम अँधेरा ढले
कुछ ने तो उन्हें देखा था पुरानी ईमारत के
नितांत सन्नाटे में होठों से होठ सटाए
शादी के दिन पूरे साज सृंगार के बाद भी
कुछ को दिख गयी थी उसके चेहरे कि उदासी
बिदाई से ठीक पहले जब वह अपने कमरे से सहेज रही थी
अपने सपने अपने ख्वाब और अपनी जरूरत का सामान
देखा था पड़ोस कि चाची ने दीवार फांद कर आते
उसके आशिक को, और फिर
कमरे का दरवाजा कुछ देर बंद रह गया था.



आज जब टंगी है पंखे से उसकी लाश
मान बाप कि आँखे शर्म से झुक गयी हैं
वे भूल गए हैं रोना और छिप जाना चाहते हैं
घर के किसी कोने में
ताकि न पहुँच सके कोई भी शोर इस समाज का
लेकिन कोने की तलाश करते माँ बाप
नहीं मिलाना चाहते आँख एक दूसरे से
की कहीं खुल न जाये वह राज, जो
कह गयी थी बेटी शर्म से आँख गड़ा कर जमीन में
की शादी के ५ महीने बाद आज भी है
वह अनछुई, और बेवस भी
और यह की हूक उठती है उसकी देह में



आज जब खामोश है उसकी जुबान, उसकी आँखे
और उसकी देह भी
उसकी खामोशी हमसे सवाल कर रही है

***     ***      ***      ***     ***       ***


टिप्पणियाँ

  1. Neel Kamal कवि को बधाई । आपको भी । एक बात - "जामुन का पेड़" कविता आलोचना में भी पढ़ चुका हूँ : इसमें जामुन के पेड़ पर झूला झूलना , वह भी पेंग मार कर , क्षमा चाहूँगा इस संवेदना पर मुझे शक है । ..
    Subodh Shukla कुल रचनाओं में 'लडकी' एक मुकम्मल कविता है. बाकी में कविता किश्तों में है. नौस्टैल्जिया बड़ी बारीकी की मांग रखता है यदि उसे कविता में एक मूल्य की तरह देखा जाय. इसमें स्मृति के रास्ते भूत में और संवेदना के बहाने भावुकता में खो जाने के खतरे हैं.

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  2. ज्योति तुम्हारी कविताएं लगातार पढ रही हूं। तुम्हारी कविताओं का भावनात्मक पक्ष तो बहुत ही बढिया है। रहना ऐसे ही .......वाली कविता तो बहुत ही अच्छी है। बधाई।

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  3. 'पिता के जाने पर' उल्लेखनीय कविता है. पिता के न होने के क्या मायने हैं, संतानों के लिए और संतानों की मां के लिए, इसी में निहित हैं उनके होने के मायने. लंबे समय तक कुरेदते रहने कि सामर्थ्य वाली कविता है यह. बधाई, ज्योति और संतोष चतुर्वेदी-दोनों को. चूंकि पिता के न होने का अहसास बार-बार कौंधता है, मुझे लगता है इसका शीर्षक होना चाहिए था :'पिता के चले जाने पर'. कविता का कथ्य वही रहता, पर व्यंजना गहरा जाती.

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  4. रोज़मर्रा के जीवन से संवेदना के स्फुट को अपनी लेखिनी से बखूबी पेश करने की ताकत आपके लिए कुदरत की दें हैं | अपनी संवेदना और आंतर दृष्टिकोण को संभालकर रखें... पंकज त्रिवेदी

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  5. jyoti chavala ki kavitayen hamesha se mujhe achhi lagati aayi hain. pichali kavitaon ki tarah ye shadar kavitayen hain. jyoti ki kavita0n main jeewan poori halchal ke sath upsthit rahata hai.kavi ka pax saf dikhata hai.

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  6. अपने आस-पास के परिवेश से विषय उठाये हैं ,इन कविताओं के लिए ! अच्छी कवितायेँ !

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  7. ज्योति जी की कविताएं पसंद आयी....बधाई.. पिता वाली कविता बहुत मार्मिक है....हा. ....जामुन वाली कविता पर नीलकमल जी ने एक सवाल उठाया है.....यह कुछ हद तक सही है....जामुन का पेड़ बहुत कमजोर माना जाता है , इतना कि कभी कभी अपने आप ही इसकी शाखाये टूट का गिर जाती है ..गाव में लोग यह भी कहते है कि दोपहर या रात में इस पेड़ के नीचे नहीं बैठना या सोना चाहिए.....जबकि झूला सामान्यतया उन पेड़ो पर लगाया जाता है , जिनकी डालिया मजबूत होती है, जामुन जैसे कमजोर पेड़ पर नहीं ..ज्योति जी अपनी कविता में यह भी कहती है कि उन्हें यह विश्वास रहता है कि जामुन का यह पेड़ उन्हें गिरने नहीं देगा...मेरे ख्याल से जामुन के पेड़ पर इतना विश्वास नहीं किया जा सकता ....हा... तकनीकी रूप से यह नहीं कहा जा सकता की जामुन के पेड़ पर झूला नहीं लगाया जा सकता है...उसकी शाखाए नीम और आम जैसी ही होती है , सो उस पर झूला तो लगाया ही जा सकता है.....यह बात अलग है गावो में ऐसा करने से मना किया जाता है और लोग उस पर झूला लगाते भी नहीं....अब यदि किसी को उसी पेड़ ने झूलने का सुख दिया है तो भला नसीहतो और कहावतो को वह क्यों कर मानेगा....सो, ज्योति जी ऐसा कहने के लिए स्वतंत्र है लेकिन यह बात सवालो के दायरे में तो आएगी ही....

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  8. ज्योति चावला की कवितायें समय का दर्पण हैं |संतोष जी आभार अच्छी कविताओं से रूबरू कराने के लिए |

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  9. संवेदना से भरी सुंदर कविताएं, जिन्हें एकाधिक बार पढ़ने का मन करता है। बधाई हो ज्योति जी!

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  10. आपकी कवितायेँ लाजवाब हैं, अच्छी कविता के लिए बधाई.

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  11. इस समकालीन युवा कवयित्री को पहली बार वागर्थ में 2007 के कविता विशेषांक से जाना। फिर इनकी विभिन्न रचनाओं से रूबरू हुआ। आज पहली बार ब्लाग में देखकर बहुत खुशी हुई। ’पिता के जाने पर’ नामक कविता अंतर्मन को छु गई।
    ‘जामुन का पेड़’ कविता पर कुछ कहना नहीं चाहता । मेरे गांव के कई लोगांे को जामुन के पेड़ों ने विकलांग बना दिया है । कवयित्री का जामुन के पेडों पर झूला झूलना तलवार की धार पर चलने से कम नहीं है। दुर्लभ रचना। भाई्र संतोष जी एवं ज्योति जी को ढेर सारी बधाईयां।
    सम्प्रति-प्रवक्ता-भूगोल,राजकीय इण्टर कालेज,गौमुख,टिहरी गढवाल,उत्तराखण्ड

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  12. "पिता के जाने पर" सुंदर कविता है। बधाई।

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