आरसी चौहान





आरसी चौहान का जन्म 08 मार्च1979 को उ0 प्र0 के बलिया जिले के एक गाँव  चरौवॉं में हुआ.  भूगोल एवं हिन्दी साहित्य में परास्नातक करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता में पी0 जी0 डिप्लोमा किया. इनकी कविताए देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.  इनकी कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी इलाहाबाद, गोरखपुर एवं नजीबाबाद से समय समय पर होता रहा है. 


 इसके अतिरिक्त इन्होने उत्तराखण्ड के विद्यालयी पाठ्य पुस्तकों की कक्षा-सातवीं एवं आठवीं के सामाजिक विज्ञान में लेखन कार्य  साथ ही ड्राप आउट बच्चों के लिए ब्रिज कोर्स का लेखन व संपादन भी किया है.


 'पुरवाई' पत्रिका का संपादन

'आधुनिकता' आज का सबसे विवादास्पद 'टर्म' है. प्रगतिशील मूल्यों को प्रायः पुरातनता का विरोधी समझ लिया जाता है. एक कवि यहीं पर विशिष्ट दिखाई पड़ने लगता है जब वह अपने अतीत में पैठ कर मानवीय मूल्यों को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़ देता है. लेकिन यह जोड़ने का काम वही कवि बखूबी कर पाते हैं जिनका उस अतीत से सीधा जुडाव होता है. आरसी चौहान एक युवतम कवि हैं. भोजपुरी मिट्टी के कवि, जो अपनी परम्पराओं से घनिष्ट रूप से घुले-मिले है. 'घुमरी परैया' इस क्षेत्र का एक ऐसा ही खेल है जिसे बड़े लोग बच्चों को पकड़ कर खेलाते हैं. कवि इस घुमरी परैया को कुम्हार के चाक और पृथ्वी से जोड़ कर इसे आधुनिक सन्दर्भ देने की कोशिश करता है. आज के दौर में यह खेल भी लुप्त प्राय होता जा रहा है. साथ ही खत्म होती जा रही है वे अनुभूतियाँ जो बालसुलभ मन में तमाम सवाल जगाती थी.



'नथुनिया फुआ' भी नास्टेल्जिया वाली कविता ही है जिसमे लरझू के 'नथुनिया फुआ' बन कर गोंडउ नाच में नाचने का वर्णन है. 'गोंडउ नाच' पूर्वी उत्तर प्रदेश की गोंड जनजाति का सामूहिक नृत्य है जिसमे पुरुष नर्तक स्त्री वेश में गाते हुए नाचता है. अपने नृत्य और गायन से वह सामाजिक विडंबनाओं पर करारा प्रहार करता है. जो सामान्य परिस्थितियों में वह करने को सोच भी नहीं सकता. यहाँ पर आरसी निर्धनता के इस बेबाकपन और निश्छलता को बारीकी से उभारते हैं जो गंवार होने के बावजूद हुक्मरानों के आगे नहीं झुकता.  

सम्प्रति: प्रवक्ता-भूगोल, राजकीय इण्टर कालेज गौमुख, टिहरी गढवाल, उत्तराखण्ड 249121 


स्थाई संपर्क- चरौवॉं, बलिया, (उ0 प्र0) 221718




मोबाइल- 09452228335





घुमरीपरैया



(पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक लोकप्रिय खेल जो अब लुप्त हो चला है)



एक खेल जिसके नाम से
फैलती थी सनसनी शरीर में
और खेलने से होता
गुदगुदी सा चक्कर



जी हां
यही न खेल था घुमरी परैया
कहां गये वे खेलाने वाले घुमरी परैया
और वे खेलने वाले बच्चे
जो
अघाते नहीं थे घंटों दोनों
यूं ही दो दिलों को जोड़ने की
नयी तरकीब तो नहीं थी घुमरी परैया
या कोई स्वप्न
जिसमें उतरते थे घुमरी परैया के खिलाड़ी
और शुरू होता था घुमरी परैया का खेल
जिसमें बाहें पकड़कर
खेलाते थे बड़े-बुजुर्ग
और बच्चे कि ऐसे
चहचहाते चिड़ियों के माफिक
फरफराते उनके कपड़े
पंखों से बेजोड़
कभी.कभी
चीखते थे जोर.जोर
उई----- माँ----
कैसे घूम रही है धरती
कुम्हार के
चाक.सी
और सम्भवतः
शुरू हुई होगी
यहीं से
पृथ्वी घूमने की कहानी



लेकिन
अब कहां ओझल हो गया घुमरी परैया
जैसे ओझल हो गया है
रेडियो से झुमरी तलैया



और अब ये कि
हमारे खेलों को नहीं चाहिए विज्ञापन
न होर्डिगों की चकाचौंध
अब नहीं खेलाता कोई किसी को
घुमरी परैया
न आता है किसी को चक्कर ।





नथुनिया फुआ





ठेठ भोजपुरी की बुनावट में
संवाद करता
घड़रोज की तरह कूदता
पूरे पृथ्वी को मंच बना
गोंडऊ नाच का नायक-
“नथुनिया फुआ”
कब लरझू भाई से
नथुनिया फुआ बना
हमें भी मालूम नहीं भाई
हां, वह अपने अकाट्य तर्कों के  
चाकू से चीड़ फाड़कर
कब उतरा हमारे मन में
हुडके के थाप और
भभकते ढीबरी के लय-ताल पर
कि पूछो मत रे भाई


उसने नहीं छोड़ा अपने गीतों में
किसी सेठ-साहूकार
राजा-परजा का काला अध्याय
जो डूबे रहे मांस के बाजार में आकंठ
और ओढे रहे आडंबर का
झक्क सफेद लिबास
माना कि उसने नहीं दी प्रस्तुति
थियेटर में कभी
न रहा कभी पुरस्कारों की
फेहरिस्त में शामिल
चाहता तो जुगाड़ लगाकर
बिता सकता था
बाल बच्चों सहित
राज प्रसादों में अपनी जिंदगी के
आखिरी दिन
पर ठहरा वह निपट गंवार
गंवार नहीं तो और क्या कहूं उसको
लेकिन वाह रे नथुनिया फुआ
जब तक रहे तुम जीवित
कभी झुके नहीं हुक्मरानों के आगे
और भरते रहे सांस
गोंडऊ नाच के फेफडों में अनवरत
जबकि.....
आज तुम्हारे देखे नाच के कई दर्शक
ऊँचे ओहदे पर पहुंचने के बाद झुका लेते हैं सिर
और हो
जाते शर्मशार ..................।


टिप्पणियाँ

  1. 'घुमरी परैया' का नोस्टाल्जिया 'झूमरी तलैया' के साथ मिलकर सुपरिचित चीज़ों के लुप्त होते चले जाने को रेखांकित करता है, तो 'नथुनिया फुआ'का न रहना जैसे लोक-गौरव के प्रतीक-चिह्नों के अनुपस्थित हो जाने से उत्पन्न व्यथा को शब्द देता है. एक दम नया है कवि, यह बात विषय-चयन को देख कर काफी प्रसन्न कर देनेवाली है. बधाई दी ही जानी चाहिए कवि को.

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  2. उत्पादन के तरीकों तथा तकनीक में परिवर्तन आने के साथ-साथ हमारे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। इसको रोका नहीं जा सकता है और रोकने की आवष्यकता भी नहीं है। इस परिवर्तन के दौरान अनेक अंधविष्वास-रूढ़ियाँ समाप्त होती हैं जो स्वागत योग्य हैं पर कुछ ऐसे परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होते हैं जिनका होना न आवष्यक होता है और न ही हितकर । ऐसे परिवर्तनों से हम कुछ पाते नहीं हैं बल्कि जो अतीत में पाया है उसे खोते मात्र हैं। दरअसल पुरानी चीजों के खत्म होने का मतलब केवल चीज विषेष का खत्म होना नहीं होता है। खत्म होती हैं उनके साथ उन्हें बनाने की प्रक्रिया -एक कला /एक पद्धति जिसके बनने में लगे होंगे हजारों-हजार वर्ष ,ज्ञान या कौषल की एक परम्परा , एक सभ्यता का इतिहास खत्म हो जाता है उसके साथ । एक संस्कृति समाप्त हो जाती है। यह एक श्रृंखला का टूटना है। अनेक मूल्यों का खो जाना भी है ऐसे मूल्यों का जो मानवता के हित में होते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर पुरानी चीज या विचार बेकार नहीं होता है। अतीत या परम्परा में बहुत कुछ ऐसा भी होता है जिसका आगे जाना मनुष्यता के हित में होता है। जो एकरसता को स्थापित होने से रोकता है। विविधता को बनाए रखता हैं। विविधता का भी अपना सौंदर्य होता है। पुराने दिनों को याद करना अच्छाई को याद करना भी होता है।यह वर्तमान के अभावों से पैदा होता है। अतीत की स्मृतियाँ वर्तमान में परिवर्तन की आकांक्षा से भरी भविष्य का खाका प्रस्तुत करती हैं।अतीत वर्तमान को नापने का मीटर भी होता है। पर इसका आषय यह कतई नहीं है कि हर पुराने के बारे में यही बात लागू होती है। हमें कबीर से सीखना होगा जहाँ वे कहते हैं-सार-सार को गहे रहे थोथा देय उड़ाय। हमें पुराने को हिकारत से भी नहीं देखना है और न ही उससे चिपकना ।
    आरसी चैहान की कविताओं को हम इसी कसौटी में रखकर देख सकते हैं। ‘घुमरी परैया’ खेल का लुप्त होना केवल मात्र इस खेल का लुप्त होना नहीं है बल्कि सामूहिकता का नष्ट हो जाना है जिसमें न केवल बच्चे बच्चों के बीच होते हैं बल्कि बड़े-बुजुर्ग भी वहाँ उपस्थित होते हैं। यह उपस्थित होना केवल उपस्थित होना मात्र नहीं है बल्कि एक अंतःक्रिया का बहाना भी है। यह बच्चों के लिए उस अवसर का समाप्त हो जाना है जिसमें उन्हंे उछलने-कूदने ,चहचहाने ,खिलखिलाने का मौका मिलता है जो आज बस्ते के बढ़ते बोझ ने उनसे छीन लिया है। इस तरह इस कविता की चिंता बहुत आगे तक जाती है। कुछ इसी तरह का संबंध ’नथुनिया फुआ ‘ से भी जुड़ता है। यह एक लोकगीत-नृत्य का लुप्त होना नहीं है।यह उस सांस्कृतिक विविधता का लुप्त होना है जो इस एकरस होती दुनिया के खिलाफ खड़ी होती है। कौन नहीं जानता एकरसता किस के हित में है । एकरसता कहीं न कहीं एकध्रुवीय दुनिया को मजबूती प्रदान करती है। लोक का यह रूप कहीं न कहीं सत्ता के प्रतिकार का एक माध्यम रहा जिसमें गायक नहीं छोड़ता है सेठ-साहूकार और राजा-प्रजा के किसी काले अध्याय को बखानने से। कभी उसका हुक्मरानों केे सामने न झुकना कितना बड़ा मूल्य है । यह कविता प्रकारांतर से उस मूल्य के पक्ष में खड़ी होती है। कुल मिलाकर आरसी चैहान का यह स्वर बहुत प्यारा है। आषा की जानी चाहिए इसमें आगे और अधिक निखार और द्वंद्वात्मकता आएगी। कविताएं उन कारणों की ओर और गहराई से संकेत करेंगी जो सामूहिकता ,प्रतिरोध जैसे मूल्यों को समाप्त करने के लिए जिम्मेदार हैं। यह कवि भविष्य के प्रति आष्वस्त करता है। बधाई और षुभकामनाएं।

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  3. कविताएँ प्रभावित करती हैं. हालाँकि महेश भाई और मोहन जी ने बहुत विस्तार में बात कही है, लेकिन उससे सहमत होते हुए भी मैं पहले कुछ और कविताएँ पढ़ना चाहूँगा. ग्रामीण प्रतीकों के सहारे विगत को नास्टेल्जिक तरीके से याद करती इन कविताओं में मुझे कुछ खटक सा रहा है. इस तरह के प्रतीकों पर पहले भी बहुत सारी कविताएँ लिखी गयी हैं. मैं देखना चाहता हूँ कि कवि इन स्मृतियों से आगे जाकर इस नव साम्राज्यवादी समय में चीजों को कितनी स्पष्टता से देख पाता है और इसका प्रतिसंसार रचने के लिए कितना श्रम कर पाता है. हाँ संभावना खूब दिखाई देती है सो उम्मीद बढ़ गयी है.

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  4. वैसे तो मेरे कई पसंदीदा रचनाकार हैं जिसमें से एक कवि आरसी चौहान भी हैं। इनकी रचनाओं ने हमें बहुत गहरे तक प्रभावित किया है। इनकी अधिकांश रचनाएं ग्रामीण परिवेश से जुडी हुई हैं जो आजकल साहित्य में अनुपस्थित है। और यही इनकी कविताओं का प्राण है। जहां तक नथुनिया फुआ के हुड़के के थाप की बात है तो आज भी उत्तराखण्ड की वादियों में हुड़के की थाप को विभिन्न अवसरों पर आसानी से सुना जा सकता है । कवि ने अपनी स्मृति के आधार पर विस्मृति होती चीजों को नवीन परिवेश से जोड़ने का अद्भुत प्रयास किया है । कवि को बहुत बहुत बधाई साथ ही संपादक महोदय को भी ।
    जब्बार हुसैन श्रीनगर उत्तराखण्ड

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  5. बेहतरीन कविताएं पढवाने के लिये कवि व संपादक दोनों को बहुत बहुत बधाई।

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  6. गंवार नहीं तो और क्या कहूं उसको
    लेकिन वाह रे नथुनिया फुआ जब तक रहे तुम जीवित कभी झुके नहीं हुक्मरानों के आगे और भरते रहे सांस गोंडऊ नाच के फेफडों में अनवरत

    सार्थक कविता.. .. कवि को हार्दिक बधाई..

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  7. भाई आरसी चौहान जी की कविताएँ लगभग पिछले एक दशक से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित और प्रशंसित हो रही हैं !...... वे स्मृतियों की संवेदनाओं से सराबोर हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा कवि हैं !

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  8. ..... हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा कवि भाई आरसी चौहान जी की -- स्मृतियों की संवेदनाओं से सराबोर कविताएँ !

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  9. हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा कवि आरसी चौहान की स्मृतियों की संवेदनाओं से सराबोर कविताएँ !

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  10. .....अतीत को याद करते हुए वर्तमान की दुखती रगों पर हाथ रखती और वर्तमान को खोने से बचाने को चिंतातुर सशक्त कवितायें हैं . सभी कवितायेँ सहज व गंभीर हैं .संवेदना के तंतुओं को झकझोरती हैं कवितायें .

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  11. Vishal
    सुंदर कवितायेँ ………….. बधाई

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  12. वास्तव मे कवि की प्रस्तुति और कथ्य अद्भुत है.....

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  13. लाजबाव रचनाएं ..किसी एक कविता को कोट करना कठिन है ...इन्हें फिर से पढूंगा एक बार ..बहुत शानदार . बधाई .
    -नित्यांनद गायेन

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