पंकज पराशर




हमारे समय के कुछ युवा आलोचकों ने समकालीन कहानी पर बेहतर काम किया है। युवा आलोचकों में पंकज पराशर एक ऐसा ही नाम है जिन्होंने शिद्दत से इस काम को शुरू किया है। इसी क्रम में पंकज ने हमारे समय की चर्चित कहानीकार अल्पना मिश्र की कहानी 'स्याही में सुरखाब के पंख' पर यह विस्तृत पड़ताल की है. पिछली पोस्ट में आपने अल्पना के उपन्यास अंश पढ़े। इस पोस्ट में  पहली बार पर पढ़िए पंकज पराशर का आलेख 'पितृसत्ता, स्त्री और समकालीन जीवन यथार्थ      
पितृसत्ता, स्त्री और समकालीन जीवन-यथार्थ
(संदर्भः अल्पना मिश्र की कहानी स्याही में सुर्खाब के पंख)


समकालीन कहानी पर यदि हिंदी आलोचना की गुरु-गंभीर और पारंपरिक भाषा में (जिसे उपहास में प्रायः प्राध्यापकीय आलोचना कहा जाता है और संयोग से यह लेखक भी प्राध्यापक नामक जीव ही है) बात शुरू की जाए, तो कुछ इस तरह शुरू कर सकते हैं-बीसवीं सदी के अंतिम दशक के उत्तरार्द्ध से हिंदी कहानी में जिन कथाकारों का प्रवेश होता है, उन्होंने उदारीकरण के बाद पैदा हुए नए जीवन-यथार्थ की संशिलष्टता को न केवल पूरी गहराई और संवेदनशीलता से पकड़ा, बल्कि हिंदी कहानी में नई कथा-भाषा की रचना भी संभव की। बीसवीं सदी के अंतिम दशक के पूर्वार्द्ध में अर्थव्यवस्था की पारंपरिक व्यवस्था को तिलांजलि, नई-नई तकनीकों के आमद और मुक्त बाजारवादी व्यवस्था ने अचानक शहरी और कस्बाई भारतीय मध्यवर्ग के जीवन और मानस दोनों को कंपायमान कर दिया। परिवर्तन की गति पहले के मुकाबले अधिक हो गई। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ही नहीं, नैतिक और मानवीय मूल्यों की कसौटी और दृष्टि में भी परिवर्तन आया। यही वह दौर है जब हिंदी में दलित और स्त्री-विमर्श की शुरुआत होती है। जिसके बाद साहित्य के प्रतिमान और सौंदर्यबोध दोनों में बदलाव आने लगते हैं। नये जीवन-यथार्थ और संघर्ष की जैसी प्रामाणिक और ठोस अभिव्यक्ति उस दौर से शुरू हुई, वैसी पहले की रचनाओं में कम मिलती है। स्त्री और दलित-विमर्श की शुरुआत के साथ ही स्वानुभूति और सहानुभूति की कसौटी पर रचना के यथार्थ की प्रामाणिकता और अनुभूति की शुद्धता दोनों की आलोचनात्मक जांच-परख शुरू हुई। 
       

स्वानुभूति और सहानुभूति के मुद्दे को लेकर हिंदी आलोचना में थोड़ी तल्ख चर्चाएं भी हुई हैं, मगर यह बात अपनी जगह आज भी बदस्तूर कायम है कि दलितों के जीवन-यथार्थ और जीवन-संघर्ष की जैसी प्रामाणिक अभिव्यक्ति दलित कथाकारों के यहां मिलती है, वैसी ग़ैर दलित कथाकारों के यहां नहीं मिलती। क्योंकि मानवीय उदारता और साहित्यिक संवेदनशीलता के बावजूद वर्ण-व्यवस्था से संचालित समाज में हाशिये के दर्द को मुख्यधारा के लोग उस रूप में नहीं समझ सकते, जिसे उन्होंने सिर्फ बाहर से देखा है। लोहे का स्वाद लोहार नहीं, वह घोड़ा जानता है जिसके मुंह में लगाम है। बाढ़ग्रस्त गांव का जैसा चित्रण फणीश्वरनाथ रेणु ने ऋणजल-धनजल में किया है, वैसा प्रामाणिक चित्रण बाढ़ग्रस्त गांवों का हवाई सर्वेक्षण करके कोई शायद नहीं लिख सकता। वह उस संवेदना को पकड़ ही नहीं सकता कि नाव पर मेरा कुत्ता नहीं जाएगा, तो मैं भी नहीं जाऊंगा। मुसीबत में घनिष्ठतम सगे-संबंधियों और सहयोगियों तक का साथ छोड़ देने वाले आत्मकेंद्रित शहरी मानस में यह बात आ ही नहीं सकती कि मनुष्य तो मनुष्य, मुसीबत में ग्रामीण लोग पशु-पक्षियों तक का साथ नहीं छोड़ते हैं।


वेश्याओं के जीवन को केंद्र में रखकर लिखे गए उपन्यास मुर्दाघर में बंबई (अब मुंबई) के जीवन-संघर्ष, पुलिसिया तंत्र, पितृसत्तात्मक मानसिकता और स्थानीय भाषा को उपन्यासकार जगदंबा प्रसाद दीक्षित ने अच्छी तरह पकड़ा है। पर जब हम देह-व्यापार में धकेली गई महिला नलिनी जमीला की मलयालम में लिखित एक सैक्स वर्कर की आत्मकथा पढ़ते हैं, तो जगदंबा प्रसाद दीक्षित की वेश्याओं के साथ तमाम सहानुभूति के बावजदू वह फांक साफ दीख जाती है, जो नलिनी जमीला की स्वानुभूति में सहज ही दृष्टिगत होती है।[1] इसी प्रकार दलितों को हरिजन कहकर दलितोत्थान की बात महात्मा गांधी ने भी थी, लेकिन दलितों के यथार्थ और संघर्ष की जैसी पहचान बाबासाहब अंबेडकर को थी, वह गांधीजी की दृष्टि से सर्वथा भिन्न थी। क्योंकि दलितों के जीवन को महात्मा गांधी बाहर से देख-समझ रहे थे, जबकि बाबासाहब अंबेडकर दलितों के दारुण जीवन-यथार्थ को न केवल अंदर से जानते थे, बल्कि वह उनका भोगा हुआ यथार्थ था। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक से लेकर बिल्कुल आज लिखी गई कहानियों में मोहक भाषा, आकर्षक शैली और सुगठित शिल्प के बावजूद सहानुभूति और स्वानुभूति की फांक साफ नज़र आती है-दलित और स्त्री-विमर्श दोनों नजरिये से। दलित जीवन से अनभिज्ञता के कारण गैर दलित कथाकार उनके जीवन-यथार्थ को ठीक से नहीं जानते, पर स्त्रियों के साथ पले-बढ़े और प्रेम (?) के बावजूद क्या वे स्त्री जीवन के यथार्थ से उसी तरह परिचित हैं, जिससे सहज ही महिला कथाकार  परिचित हैं? कहना न होगा कि अनुभूति की शुद्धता के सामने यहीं शिल्प-सिद्धता की दरार दिखाई देने लगती है, जिसे कहन और गढ़न की कुशलता से बहुत अधिक पाटा नहीं जा सकता।


समकालीन हिंदी कहानी में जिन युवा कथाकारों ने अपनी रचनाओं से ध्यान आकृष्ट किया है और एक मुकम्मल पहचान बनाई है, उनमें से कुछ कथाकारों ने बीसवीं सदी के अंतिम दशक में लिखना शुरू किया था, तो कुछ कथाकारों ने इस शताब्दी के पहले दशक की शुरुआत से। सामाजिक स्तर पर इन कथाकारों का अयोध्या-विवाद के कारण हुए सांप्रदायिक उभार, मंडल कमीशन के बाद बने जातिगत समीकरण और नव साम्राज्यवाद के नये रूपों से सामना हुआ। मुक्त बाजारवादी व्यवस्था के पैरोकारों की ट्रिकिल डाउन थियरी से भारतीय ग्रामीण यथार्थ में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया। एक तरफ धन के पहाड़ की ऊंचाई बढ़ती चली गई, तो दूसरी तरफ किसानों की आत्महत्याएं, मजदूरों का पलायन और भुखमरी/कुपोषण के शिकार मनुष्यों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। धन-पहाड़ों से कोई झरना, कोई सोता नहीं फूटा, जिसका लाभ हाशिये के लोगों को होता। हिंदी कहानी से मुसलमान ही नहीं, गांव के जीवन-यथार्थ की समझ और उपस्थिति दोनों कम होती जा रही है। यह अनायास नहीं है कि हिंदी फिल्मों और धारावाहिकों के साथ ही समकालीन हिंदी कहानी में शाइनिंग इंडिया की चमक में फीलगुड करने वाले किरदार अधिक नजर आते हैं। यह भी भारतीय समाज का एक यथार्थ है, लेकिन इस सच के आवरण में बड़े और अप्रिय सच से किनाराकशी करना नैतिकता और सामाजिक दायित्वबोध ही नहीं, साहित्यिक ईमानदारी के भी विपरीत है। मगर व्यवहारिकता और समझदारी को सफलता का मूलमंत्र मान लेने के बाद ईमानदारी को भला कौन महत्व देता है! ये सब मूल्य अब पुराने हुए। 


पिछले दो दशकों की कहानियों को देखें तो पुरुष और महिला कथाकारों की स्त्री अलग-अलग दिखती है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलावों के बाद आए परिवर्तनों ने स्त्री के जीवन-यथार्थ को किस प्रकार प्रभाववित किया है-इसकी समझ के मामले में जो फांक नजर आती है, वह शायद इसलिए भी कि दोनों के सच अलग-अलग हैं। क्योंकि शिल्प-सिद्ध भाषा में सहानुभूति का सच अनगढ़ शिल्प और अटपटी भाषा के बावजूद स्वानुभूति के सच के समक्ष प्रभावहीन हो जाता है। इतिहास गवाह है कि प्रगतिशीलता, संवेदनशीलता और बाकी अन्य तमाम शीलताओं के बाद भी पुरुष स्त्री-जीवन को ठीक से नहीं समझ पाता। तमाम बंधनों और पाखंडों पर चोट करने के बावजूद कबीर स्त्री को कितना समझ पाए? स्त्री-जीवन के दारुण यथार्थ को मीराँबाई ने जिस तरह देखा, उस तरह मीराँ के समकालीन पुरुष-संतगण तमाम संतत्व के बावजूद देख पाए? यहां तक कि छायावाद में भी अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी के द्रष्टा प्रसाद हों, श्याम तन के तत्काल बाद भर बंधा यौवनको लक्षित करने वाले निराला हों या स्त्रियों को सखी, सहचरि, प्राणका दर्जा देने वाले पंत हों-क्या वे महादेवी वर्मा की तरह स्त्रियों के पराधीनता के यथार्थ और इतिहास को समझ पाए?


पिछले दो दशक में दलित कथाकारों ने अपने भयावह जीवन-यथार्थ को स्वानुभूति की प्रामाणिकता के साथ लिखकर द्रष्टा और भोक्ता के अंतर को बेहतर ढंग से दिखाया। लेकिन दलित लेखिका कौशल्या वैसंत्री ने दोहरा अभिशाप में सामाजिक और पारिवारिक दोनों मोर्चे पर जीवन और अस्मिता के लिए संघर्षरत दलित स्त्रियों के जिस जीवन-यथार्थ को अभिव्यक्त किया, उस तरह कोई पुरुष दलित लेखक देख/लिख पाए? दलित लेखक शायद इसलिए भी कौशल्या वैसंत्री की तरह स्त्री-मन की पीड़ा को नहीं देख/लिख पाए कि पुरुषों ने वर्ण-व्यवस्था की क्रूरताओं को तो झेला था, लेकिन पितृसत्ता की क्रूरताओं और दमन से उनका कभी कोई साबका नहीं पड़ा। इसे एक स्त्री ही जान सकती है कि पितृसत्ता की बेड़ियों ने कहां-कहां और किस तरह अपनी जकड़बंदियों में स्त्रियों को बांध रखा है।


बीसवीं सदी के अंतिम दशक से हिंदी कहानी में अपनी पहचान बनाने वाली युवा कथाकार अल्पना मिश्र की कहानी स्याही में सुर्खाब के पंख में पितृसत्ता की क्रूरताओं और कुलीनता की हिंसा की नृशंसता को लक्षित किया जा सकता है। पूर्वजन्म के पाप-पुण्य को ध्यान में रखकर विधाता मनुष्य का भाल लिखते हों या नहीं, इसे परम आस्तिकजन भी आज ठीक-ठीक नहीं बता सकते। मगर सदियों से स्त्रियों को अपनी ऑक्टोपसी जकड़ में जिस पितृसत्ता ने मजबूती से जकड़ रखा है, वह अवश्य स्त्रियों के जीवन-मरण, घृणा-प्रेम, पाप-पुण्य और उदय-अस्त को तय करता है। सुप्रसिद्ध कथाकार यशपाल ने अपने उपन्यास दिव्या में बेहद मार्मिकता से दिखाया है कि दिव्या के जीवन की हर सांस को कैसे समाज और परिवार के अलग-अलग पुरुष तय करते हैं। स्त्रियों की कुलीनता और अकुलीनता का पैमाना पितृसत्ता की सुविधा और सत्ता से निर्मित होता है, जिसमें कई सदियां गुजर जाने के बाद भी बेहद कम रद्दोबदल मुमकिन हो सका है। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि अल्पना मिश्र सुर्खाब के पंख को स्याही में डुबोकर धर्म-ज्ञान और साहित्य लिखने वाली सभ्यता की उस क्रूरता और असभ्यता को अनावृत्त करती हैं, जो आज भी उसी तरह स्त्रियों की जीवन-कथा लिख रही है। पितृसत्ता की परतों को जाने बगैर प्रत्यक्ष सत्ता के व्यवहारों का विश्लेषण भी ठीक-ठीक संभव नहीं है।


अल्पना मिश्र की इस कहानी में मुख्य कथा के बीच कुछ उपकथाएं आती हैं-कुछ वैसे ही जैसे फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम की मुख्य कथा के बीच महुवा घटवारिन की छोटी-सी उपकथा। छोट-छोटे उपशीर्षकों के प्रयोग से वे इस कहानी में और अधिक अर्थवत्ता भर देती हैं। सोनपती बहन जी और उनकी चारों लड़कियों की मुख्य-कथा के बीच में वैशाली सारस्वत और निरुपमा दी की छोटी-छोटी उपकथाएं हैं। जिनमें से हर कथा की स्त्री का भाग्य दमन और शोषण की स्याही से पितृसत्ता ने लिखा है। इस संदर्भ में याद आया कि युवा कहानीकार पंकज सुबीर ने महुवा घटवारिन की उस छोटी-सी उपकथा को अपनी कल्पना शक्ति से अद्भुत विस्तार देकर एक नई मार्मिक कहानी की रचना संभव की है। कहानी की नैरेटर द्रष्टा और भोक्ता के साथ कई जगह अपने घर-परिवार और अपनी मां के साथ होती बहसों का जिक्र भी करती है।


नैरेटर के माध्यम से यह भी पता चलता है कि इस कथा-उपकथा से अलग जो दुनिया है उसमें एक तरफ जहां पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है, वहीं दूसरी तरफ उन लड़कियों से सहानुभूति भी है। जिन घरों से लड़कियां नहीं भागती हैं, उन घरों में यह भय पलता रहता है कि भागी हुई लड़कियों के प्रति उनके घर की लड़कियों के मन में जो सहानुभूति है वह कहीं विद्रोह में न रुपांतरित हो जाए। नैरेटर सोनपती बहन जी का जिक्र आते ही तत्काल उन्हें एक जरूरी पाठ इसलिए बताती हैं कि सोनपती बहन जी लड़कियों को पितृसत्ता के टैंक में अच्छी तरह बंद करके रखना जानती हैं। सोनपती बहन जी के व्यवहार की सामाजिक स्वीकार्यता का आलम यह है कि इसके बाकी घरों में उनकी तारीफ होती है और अपनी लड़कियों को अनुशासित रखने में उनकी मिसाल दी जाती है,वे लड़कियों को कितनी अच्छी तरह नियंत्रित करती थीं, यह आदर्श मेरी मां पर छाया रहता था। वह हमें डांटते-डपटते याद दिलाती रहती थीं कि अगर हम बातों से नहीं माने तो उन्हें लातों का इस्तेमाल सोनपती बहनजी की तरह करना पड़ जायेगा। वे यह भी याद दिलाती रहतीं कि वह कितनी महान हैं, क्योंकि वे सोनपती बहनजी की तरह छाते को छड़ी में नहीं बदलतीं। यह भी कि वे सोनपती बहनजी से एक दर्जा आगे तक पढ़ी हैं, इसलिए हमें आदर्श लड़की बना देने के मामले में भी वे एक दर्जा पीछे नहीं होना चाहती थीं। घरों में बात-बात पर सोनपती बहन जी की मिसाल उन्हें जरूरी पाठ बना देती है-जिसका नैरेटर बार-बार जिक्र करती हैं।
  

कहानी की शुरुआत बेहद दिलचस्प तरीके से नैरेटर करती हैं, सोनपती बहनजी को भूला नहीं जा सकता था। वे शिक्षा के सबसे जरूरी पाठ की तरह याद रखने के लिए थीं। वे बहुत पहले निकली थीं नौकरी करने, जब औरतें किन्हीं मजबूरियों में निकलती थीं। वे भी मजबूरी में निकली थीं, ऐसी जनश्रुति थी। सोनपती बहन जी में ऐसा क्या है कि उन्हें शिक्षा के सबसे जरूरी पाठ की तरह याद किया जाए? इस सवाल का जवाब नैरेटर को देने की जरूरत ही नहीं पड़ती, कहानी अपने-आप दे देती है। सोनपती बहिन जी ही नहीं, अल्पना जिस क्षेत्र की कहानी बयान करती हैं, आम तौर पर उस क्षेत्र की औरतें किन्हीं मजबूरियों में ही नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकलती हैं।[2] पर सोनपती बहन जी जिन मजबूरियों के कारण नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकलती हैं, वह देखिए, उनके पति की मृत्यु के बाद चार लड़कियों की जिम्मेदारी और रिश्तेदारों की हृदयहीनता ने उन्हें नौकरी करने के लिए प्रेरित किया था। यह आम भारतीय जीवन का सच जैसा था और इसी रूप में स्वीकृत सच की तरह भी था। यानी पति की मृत्यु न हुई होती और सिर पर चार लड़कियों की जिम्मेदारी न होती तो ऐसा कोई सामाजिक उत्प्रेरक तत्व न था, जिसके कारण सोनपती बहन जी नौकरी के लिए घर से बाहर निकलतीं।  


सोनपती बहन जी हों या उस समाज की कोई भी बहन जी, वे बिना किसी मजबूरी के इसलिए घर से बाहर नहीं निकलती हैं कि समाज की जड़ता, सामंती मानसिकता और पितृसत्ता पग-पग पर उनकी राहों में अवरोध उत्पन्न करती है। अपने पास हरदम माचिस रखने वाली सोनपती बहन जी जिस क्षेत्र और जिस दौर की पैदावार हैं, उस दौर में लड़कियों के जीवन-यथार्थ और संघर्ष की एक झलक देखिए, जहां लड़कियां शिक्षा के उजाले से दूर अंधेरे कोने में खड़ी अपने से छोटे बच्चों की नाक पोंछ रही थीं,  टट्टी धो रही थीं, बरतन मांज रही थीं, रोटी थाप रही थीं। कहीं कहीं घास काटने गई थीं, कहीं गोबर पाथ रही थीं। ऐसे में उन्होंने समझाया कि शिक्षा के उजाले से कैसे घास और गोबर की गंहाती दुनिया से निकल कर बल्ब की धवल रोशनी में आया जा सकता है? सोनपती, जो आगे चल कर बहन जी बनीं, स्कूल नहीं जाना चाहती थीं। मजबूरी की यह शिक्षा उन्हें बहन जी तो बना देती है, लेकिन पितृसत्ता से अनुकूलित मानसिकता शिक्षित होने के बाद भी उन्हें पितृसत्ता के प्रतिनिधि में रूपांतरित कर देती है।


सोनपती बहन जी का चरित्र-चित्रण लेखिका ने जिस खिलंदड़े अंदाज़ में किया है, उससे पता चलता है कि पितृसत्ता की इस प्रतिनिधि स्त्री-चरित्र के प्रति उनकी कोई सहानुभूति नहीं है। शायद इसलिए कि अपनी चारों लड़कियों सहित स्कूल की लड़कियों को जिस हृदयहीनता से वह प्रताड़ित करती हैं और अंत में जिस लोमहर्षक तरीके से उनकी चारों लड़कियों की मौत होती है, उसके कारण नैरेटर का यह भाव स्वाभाविक है। लेकिन इस प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर जब आगे बढ़ें, तो पता चलता है कि सोनपती बहन जी खुद पितृसत्ता की मानसिक कंडीशनिंग की शिकार एक मोहरा-भर हैं। किसी व्यक्ति के व्यवहार की पड़ताल करते समय उसके पालन-पोषण की पृष्ठभूमि और उसकी सोच की निर्मिति की जब हम पड़ताल करते हैं, तब उसके व्यवहार और गुनाह की असलियत कुछ अलग रूप में ही सामने आती है। बहरहाल, सोनपती बहन जी के बारे में कुछ सूचनाएं देखते चलें, 


‘‘वे अक्सर नीले सफेद प्रिंट की साड़ी पहनतीं। हाथ में एक छोटा झोला होता, जिसमें उनका बटुआ खूब अंदर धंसा कर रखा रहता। उसी में एक माचिस की डिबिया पन्नी में लपेट कर धरी होती। गाहे-बगाहे काम आ जाने की उम्मीद इस डिबिया में छिपी होती।’’


‘‘एक लम्बा काला छाता रहता, जो कई वक्तों पर कई तरह से काम आता। मक्खी भगाने, पंखा झलने, रास्ता बनाने, रास्ता दिखाने, मेज थपथपाने, किसी विद्यार्थी को प्वाइंट करने, ठेले वाले को बुलाने, चपरासी को डांटने आदि आदि से लेकर दुर्वासा की छड़ी के रूप तक यह छाता डटा रहता। इस तरह हाथ का छाता अपने से कुछ गज आगे बढ़ातीं, कंधे पर झोला टांगे, बाजार हाट निपटाती, ग्वाले से दूध लिए सोनपती बहन जी घर पहुंचतीं।’’ और इस तरह सोनपती बहिन जी जब घर पहुंचती हैं तो घर में हिलती-डुलती लड़कियां उन्हें देखते ही सावधान की मुद्रा में खड़ी हो जातीं। रात में सोते समय सोनपती को लोहे की कढ़ाई में औंटा हुआ दूध पीने को मिलता है। पितृसत्ता के प्रतिनिधि उत्तर भारत के किसी पुरुष को याद करें, तो सोनपती बहन जी विशुद्ध रूप से उसका महिला संस्करण नजर आती हैं। पितृसत्ता की पारंपरिक व्यवस्था को याद करें तो घर के कमाऊ पुरुष के घर लौटते ही बाकी तमाम सदस्य एक अघोषित अनुशासन से अनुशासित होने लगते हैं और भोजन में सुस्वादु भोजन की अधिकता और परोसने की मुलामियत प्रायः उन्हीं तक सीमित होकर रह जाती है। इसलिए हमने शुरू में उल्लेख किया है कि सोनपती की मानसिकता की निर्मिति को बेहद ध्यान से देखने की जरूरत है।


घर से निकलने के बाद बाहरी दुनिया में स्त्रियों को पितृसत्ता के साथ-साथ व्यवस्था के अवरोधकों से भी दो-चार होना पड़ता है। जो सोनपती बहन जी बचपन में स्कूल नहीं जाना चाहती थीं और नौकरी में भी मजबूरियों के कारण ही आई थीं, उनका व्यवस्था के दाव-पेंच से किसी भी रूप में कभी साबका नहीं पड़ा था। इसलिए वे सीधी, सरल भाषा तो समझती हैं, लेकिन व्यवस्था के व्यंगार्थऔर अन्यार्थ नहीं समझ पाती हैं। कामयाबी की भाषा में शामिल चढ़ावा, सुविधा शुल्क, पान-पत्ते के लिए, डाली जैसे शब्दों से अपरिचय के कारण बेसिक शिक्षा अधिकारी के अन्यार्थ का अर्थ वे यह समझती हैं कि उनकी कर्मठता पर शक किया जा रहा है। यही नहीं, दोबारा जब दूसरे तरीके से उन्हें कहा जाता है, बहनजी, चपरासी का तो ख्याल रखा करिए। बेचारा इसी नौकरी के भरोसे है। कुछ खिला-पिला दिया करिए। तो भी वे इस वाक्य के सही अर्थ तक पहुंचने में सफल नहीं हो पाती हैं और द्विवेदीयुगीन कवि गुरुभक्त सिंह भक्त की नायिका की तरह पहला कबूतर कैसे उड़ा, इसे बताने के लिए बाकी बचे एक कबूतर को भी उड़ाकर पहले कबूतर के उड़ने का उदाहरण देती हैं। बेसिक शिक्षा अधिकारी के अन्यार्थ को समझने की जगह वे अभिधा में इसे लेती हैं और उन्हें लगता है कि चपरासी भूखा है। सो सोनपती बहन जी ने तुरंत अपने झोले के अंदर से टिफिन निकाला और चपरासी को दे दिया। चपरासी ने हाथ में पकड़ा टिफिन साहब की मेज पर पटक कर रखा और बाहर चला गया। बाद में पीछा करती हुई व्यंग्यार्थ भरी भाषा वे समझती हैं, औरतों को लेकर की गई उपहास और मखौल वाली टिप्पणियों को भी समझ जाती हैं।

बाहरी दुनिया और व्यवस्था के दाव-पेंच को जानने के बाद उत्पन्न अवसाद के कारण उनके व्यवहार में क्या-क्या तब्दीलियां आती हैं, इसे देखने के बाद सोनपती बहन जी के मानस को और अच्छी तरह समझा जा सकता है। लड़कियां इस थकान और परेशानी से बेखबर होतीं। घर में हिलती हुई डोलती फिरतीं। तब सोनपती बहनजी को छाते को छड़ी में बदलना पड़ता। लड़कियां अनुशासित थीं। तुरत-फुरत लाइन लगा कर खड़ी हो जातीं। सोनपती बहनजी सट्ट-सट्ट पीटती जातीं और बताती जातीं कि किसे क्या क्या नहीं आता है? किसी को दाल में नमक ठीक से डालने नहीं आता था, कोई उनके घर आने पर तुरंत पानी ले कर नहीं आया था, कोई अब तक चाय ठीक नहीं बना पाता था, किसी से आलू एकदम वैसा नहीं कटता था, जैसा कटना चाहिए था। इस तरह बहुत कमियां थीं, जिनकी सजा एक दिन तय थी। सोनपती बहन जी के इस व्यवहार से पीड़ित उनकी लड़कियों इस बात से पूरी तरह बेखबर हैं कि उनकी मां का यह व्यवहार किस अपमान और आहत दर्प से संचालित है। इसलिए यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से से इस स्थिति की व्याख्या नहीं करने पर स्थिति एक होते हुए लड़कियों और पाठकों की दृष्टि में सोनपती बहन जी बेहद क्रूर और संवेदनहीन नजर आती हैं। जबकि व्यवस्था की शिकार सोनपती घर से बाहर स्कूल और ऑफिस की दुनिया में स्वयं लड़कियों वाली स्थिति में जीने को विवश हैं। स्त्रियों के प्रति समाज की मानसिकता, नौकरी की मजबूरी और बाहर की दुनिया से लड़ न पाने के कारण उपजे आक्रोश के कारण पैदा हुई कुंठाओं का विस्फोट कहीं और होता है।


लेखिका ने कहानी की शुरुआत में उपशीर्षक दिया है- सोनपती बहन जी माचिस लिए रहती हैं। कहानी की शुरुआत में इस उपशीर्षक से पाठकों के मन में जिज्ञासा और आश्चर्य दोनों एक साथ पैदा होता है कि सोनपती बहन जी आखिर माचिस क्यों लिए रहती हैं? पितृसत्ता की प्रताड़ना के तमाम तौर-तरीके और कुलीनता की हिंसा की क्रूरता भी इस सवाल के जवाब में अंतर्निहित है। माचिस लिए रहने की वजह देख लीजिए, सोनपती बहन जी की लड़कियां किसी लड़के को खिड़की से देख रही थीं, कि उनकी लड़कियां खिलखिला कर बड़ी जोर से हँसी थीं, कि बड़ी लड़की का दुपट्टा किसी बड़े बुजुर्ग के सामने खिसक कर नीचे गिर गया था...ऐसे ही किसी घोर अपराध पर सोनपती बहनजी ने अपने झोले से माचिस की डिबिया निकाली थी और लड़कियों के पैरों पर छुआ-छुआ कर उसका महत्व असंदिग्ध किया था। ऐसा नहीं है कि माचिस साथ में लिए रहने और वक्तन-बेवक्तन उसका महत्व असंदिग्ध करते रहने का सोनपती बहन जी यह कोई व्यक्तिगत आइडिया हो, वे जिस समाज और पितृसत्ता की एक प्रतिनिधि के रूप में यह कार्य करती हैं, उस समाज का यह एक स्वीकार्य और आम सच है। वैशाली सारस्वत उसी रोज भाग गयी थीं। भागने के बाद वे चड्ढा हो गयी थीं। नगर के, घर के घर अपनी लड़कियों को ले कर सतर्क हो उठे थे। कोई लड़का कहीं था, जिसके साथ भागने की संभावना छिपी हुई थी। कई और तरह के लोग इस संभावना का लाभ अपनी अपनी तरह उठा लेना चाहते थे। लोग इससे और भी डर रहे थे। क्या पता मेरी मां भी अब अपने झोले में माचिस की डिबिया रखें! अपनी मां को लेकर नैरेटर का यह भय उस समाज की तमाम लड़कियों का सामूहिक भय है।


हमने शुरू में इस बात का जिक्र किया था कि इस मुख्य कथा में कुछ उपकथाएं हैं, जिसके कारण मुख्य कथा की मार्मिकता और अधिक उभरकर सामने आती है। सोनपती बहन जी की माचिस-कथा के साथ जिस वैशाली सारस्वत की उपकथा का मुख्य कथा में प्रवेश होता है, उस वैशाली सारस्वत के पिता सुनयनधीर सारस्वत के व्यक्तित्व, कार्य-शैली और पैथालॉजी सेंटर का खाका जिस भाषा और अंदाज में लेखिका अल्पना मिश्र खींचती हैं, वह अद्भुत है। उनके पास भाषा का विशाल रेंज है, जिसके अनेक स्तर हैं और भाषा को बरतने का जो उनका व्यक्तिगत कौशल है, उसके कारण वह समकालीन महिला कथाकारों में अलग से रेखांकित की जा सकती हैं। उनकी भाषा इस्पात की तरह ठोस, लेकिन लचीली है, जिसके कारण चरित्र और कथा-संदर्भ बदलते ही उनकी भाषा बदल जाती हैं और कमाल यह कि कथा-प्रवाह में कोई अवरोध पैदा नहीं होता। तो यहां यह देखते चलें कि पैथालॉजी सेंटर वाले डॉक्टर सुनयनधीर सारस्वत को अल्पना किस दिलचस्प अंदाज में कहानी में प्रवेश कराती हैं, उनके निकलने के पहले खुशबू का झोंका आता। इंतजार करता आदमी बिना उन्हें देखे ही उठ कर खड़ा हो जाता। डॉक्टर सारस्वत आ कर दरवाजा खोलते, अपने टेबल, जिस पर शीशे का कवच उन्होंने लगा रखा था, उसके पीछे की कुर्सी पर बैठ जाते। बिना उनके बोले ही बारामदे का उठ कर खड़ा हुआ आदमी अंदर चला आता और आ कर उनके पास रखे स्टील के स्टूल पर बैठते हुए माचिस की डिबिया या शीशी, जो भी वह ले कर बैठने को था, बैठने की क्रिया के बीच में ही डॉक्टर साहब की तरफ बढ़ा देता।
 

वैशाली इन्हीं डॉक्टर सारस्वत की लड़की थी जो, सगाई की अंगूठी पहने-पहने चली गयी थीं। और उनके घर में एक उनका लड़का था। जिसकी अपनी कोई व्यक्तिगत नहीं पहचान थी और न उसके व्यक्तित्व को देखकर इसकी कोई संभावना ही नज़र आती थी। डॉक्टर सारस्वत का लड़का है, इसी से सब उसे पहचानते थे। लेखिका ने सोनपती बहन जी के घर और उनके व्यवहार के संदर्भ में अनेक बार जनश्रुति शब्द का इस्तेमाल किया है। शायद इसलिए कि नैरेटर कई चीजों की द्रष्टा होने के बावजूद अपने सच के साथ-साथ उस समाज का सच भी बेहद कुशलता से गूंथती जाती हैं। डॉक्टर सारस्वत के लड़के के संदर्भ में भी वे जनश्रुति का शब्द को किस रोचक तरीके से लाती हैं, देखिए, जनश्रुति इस मामले में यह थी कि वह हमारी सीनियर निरूपमा दी को प्रेमपत्र भेजता है। रोज। स्कूल के इसी पते पर। तेल-फुलेल लगाकर पैथालॉजी सेंटर में प्रवेश करने वाले सुनयनधीर सारस्वत (ख़ुदा जाने सुनयन के नयन सुनयन थे भी कि नहीं) की भागी हुई लड़की वैशाली तो चड्ढा बनकर भाग जाती हैं। अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने का साहस उसमें है, जिसके कारण वह भाग जाती है, लेकिन लड़के के मामले में बड़ा व्यंग्यार्थ यह है कि सूरज कुमार अपने प्रकाश का इस्तेमाल खुद को प्रकाशित करने में भी नहीं कर पाता।


इस कहानी में एक तरफ सोनपती बहन जी की लड़कियां हैं, जो मां के व्याकरण से जरा भी हटने पर माचिस से दग्ध होती हैं, निरुपमा दी हैं जो निरुपमा से ख़राब और बुरी लड़की की उपमा बन जाती हैं। दूसरी तरफ वैशाली जैसी लड़की है, जो अपने आगत भविष्य के लिए भाग सकती हैं! सचमुच की भागी लड़कियों से उन लड़कियों की संख्या बड़ी है, जो भागती है अपनी डायरी में, अपने रतजगे में। जो समाज लड़कियों को दग्ध करने की मानसिकता पैदा करता है, भाग जाने की सूरत में तरह-तरह की जनश्रुतियों को गढ़ता है, प्रेम को व्यभिचार में तब्दील कर देने में एक प्रकार का खल-सुख पाता है, वही समाज शक्ति की उपासना का वार्षिक, अर्द्ध-वार्षिक स्वांग भी करता है! इस पितृसत्तात्मक समाज में ग्रामीण और कस्बाई मानसिकता के कारण मां-बाप सिर्फ इसीलिए लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजने से नहीं डरते कि लड़की किसी के साथ भाग सकती है, बल्कि उनके मन में डर इस बात को लेकर भी होता है कि इस शक्ति-उपासक समाज का आंतरिक सच भयावह है। कॉलेज आती-जाती लड़कियों को प्रतिदिन लगभग वैतरणी को पार करना पड़ता है, गोरकी पतरकी रे, मारे गुलेलवा जियरा उड़ि उड़ि जाय...कोई न कोई, कहीं न कहीं से यही गाता और उसकी कंठ ध्वनि से निकला यह गीत लड़कियों के कान से जरूर टकराता। और कई मनचले उनके पीछे मद्धिम स्वर में यह भी कहते-चमक रहा है तेज तुम्हारा बन कर लाल सूर्य मंडलया फिर सजनी हमहूं राजकुमारया फिर इक नजर तेरी मेरे मसीहा काफी है उम्र भर के लिए...। जिस समाज में लड़कियां पराई अमानत मानी जाती हैं, उस समाज में ऐसे माहौल में भला कौन मां-बाप अमानत में ख़यानत और अपनी पगड़ी से बेपरवाह रहने की सोच सकता है?


अल्पना मिश्र के भीतर करुणा ही नहीं, सामाजिक विद्रूपता, हास्य-व्यंग्य और सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब का है। लोगों की उथलेपन, काइयांपन के अलावा जब वे गऊ-सी लड़कियों को सर्कसिया घोड़े में तब्दील कर देने के आकांक्षी मां-बाप की हरकतों का वर्णन करती हैं, तो उनके भीतर का खिलंदड़ापन देखते ही बनता है। मसलन, लड़की ने सा...रे...ग...म.... बजा कर दिखाया। कोई भी गीत चलता, वह सा....रे....ग...म...बजाती रहती। इस हास्य में करुणा का गजब पुट है कि बेचारी निरीह लड़की आधुनिक और होशियार दिखने की होड़ में कैसे हास्यास्पद होती चली जाती है। एक और प्रसंग देखें, सोनपती बहन जी को छोड़ कर न्यौता लिखने वाले आदमी के पास अपना अपना न्यौता लिखवाने दौड़े। जो लोग पहले ही अपना न्यौता सोनपती बहन जी को सौंप चुके थे, वे भी कॉपी में अपना नाम लिखवाने दौड़े। लिखवा देना एक पक्का सबूत था। लोग दिए न्यौते का सबूत रखना चाहते थे। ताकि सनद रहे! पुरबिया लोग जिस तरह लहककर खाने पर टूटते हैं और खाते समय जिस परमानंद में डूबते-उतराते हैं, उसका वर्णन तो और भी दिलचस्प है। कोहड़े की सब्जी क्या सिझा-सिझा कर बनाया है, खटाई डाल कर। खाना इतना स्वादिष्ट की अंगुलियां चाटते रह जाओ। साग कितना बढ़िया बना है। कोई कोफ्ते पर फिदा है। रायता अलग बड़ा स्वादिष्ट है।
 

हालांकि कॉलेज आते-जाते वक्त फब्तियां कसने और छेड़छाड़ करने वाल लड़कों के प्रति निरुपमा सख्ती भी दिखाती है, मगर उन लड़कों पर इसका कोई ख़ास असर नहीं होता। एक दिन निरुपमा को जब लड़के छेड़ रहे थे, तभी उस नामुराद वक्त में निरूपमा दी का बड़ा भाई उधर से गुजरा। उसने दौड़ कर एक लड़के को खींचा। किसी की कॉलर पकड़ी, किसी को थप्पड़ मारा। लड़के भी बेल्ट, जूता, बैग...जो मिला लेकर युद्ध में उतर गए। निरूपमा दी को थोड़ा-सा मौका मिला, तो वे अपना तोड़ कर गिरा दिया गया रैकेट लेकर भाई की तरफ से भांजने लगीं। तभी उनमें से किसी लड़के ने सड़क पर पड़ा ईंटे का अद्धा उठाकर निरूपमा दी के भाई पर उछाल दिया। अद्धा उछल कर उसके कपाल के बीचों-बीच लगा। निरूपमा दी का भाई बिना चक्कर खाये एकदम धड़ाम से नीचे गिर गया। कहानी में इसके बाद समाज का जो चेहरा सामने आता है, उससे स्त्रियों के प्रति समाज, कानून-व्यवस्था और पितृसत्ता के दृष्टिकोण की क्रूरता, भयावहता और सामंती तौर-तरीकों को भी स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है।


16 दिसंबर, 2012 की रात देश की राजधानी दिल्ली में अपराधियों ने एक लड़की के साथ बलात्कार करके उसके दोस्त सहित उसे सुनसान सड़क पर फेंक दिया, मगर पुलिस और कोर्ट-कचहरी के डर से बुरी तरह घायल और निर्वस्त्र युवक-युवती की मदद किसी राहगीर ने नहीं की। यही सच इस कहानी में भी सामने आता है जब निरुपमा के भाई लड़कों की मारपीट से घायल होते हैं। उन्होंने चिल्ला कर कहा-कोई अस्पताल ले चलो रे! ऐ, हटो हटो, जाओ सामने वाली दुकान से पुलिस को बुलाओ! मुझे पुलिस के चक्कर में न फंसाओ! एक तो समाज में आत्मकेंद्रित लोगों की बढ़ती हुई संख्या, ऊपर से घायल की मदद करने के बाद सहायता करने वाले व्यक्ति से पुलिस का सवाल-जवाब-ऐसी बाधा है जिसके कारण लोग मदद करने से डरते हैं। पुलिस में जब इस घटना की रिपोर्ट दर्ज़ होती है, तो पुलिस के काम करने का अपना ही अंदाज़ है, हवलदार ने सारे मनचले लड़कों को पकड़ कर थाने में पीटने का अभियान चला दिया। पुलिस की गाड़ी, पुलिस की ट्रक धड़धड़ाते हुए सड़कों पर घूमने लगी। जिसकी भी मोटरसाइकिल दुकानों के आगे खड़ी मिली, लाद ली गयी, स्कूटर उठा ली गयी। लाठी भांजते पुलिस वाले पान की दुकानों, एस.टी.डी. बूथों, मोबाइल फोन की दुकानों पर से लड़कों को उठा-उठा कर ट्रक में ठूंसा जाने लगा। इसी क्रम में अद्धा फेंक कर मारने वाले लड़के भी पकड़े गए। वे बड़े इत्मीनान से पान की दुकान पर खड़े पान मसाला चबा रहे थे और किसी ब्लू फिल्म की कहानी पर बहस छेड़े थे।
 

इन मनचले लड़कों को पुलिस पकड़कर जब ले जाती है, तो नगरपालिका के चेयरमैन ठाकुर बलवान सिंह, निरुपमा या उनके घायल भाई के प्रति कुछ नहीं कहते। इसके उलट वे उन मनचले लड़कों को पकड़ने वाली पुलिस के रवैये के प्रति उग्र हो जाते हैं और उल्टे पुलिस को ही सबक सिखाते हैं, जीप से सबसे आखिर में ठाकुर बलवान सिंह उतरे। उतर कर खड़े हो गए। तब नाटक शुरू हुआ। हथियार बंद लोग कूद-कूद कर, उछल-उछल कर हवलदार को तरह तरह से पीटने लगे। जब हवलदार जमीन पर पूरा चित्त गिर कर तड़पने लगा, तब चेयरमैन ठाकुर बलवान सिंह ने अपनी तोंद पर हाथ फेर कर अपनी बेल्ट उतारी और हँस कर कहा, हमारे लल्ला को छूने चले थे। तेरा क्या बिगाड़ रहा था बे? चलो, अब हम तोहें नाटक का रिहर्सल करा देते हैं।इसके बाद सटासट आठ दस बेल्ट मारा और मुड़ कर गाड़ी में आ कर बैठते हुए चिल्लाए, उठाओ साले को। थाने छोड़ आओ। बोल देना सबेरे चार बजे से पहले नगर छोड़ के चला जावे। दिन में इसका मुंह न दिखाई पड़े। इस कार्रवाई के बाद पुलिस के मनोबल और आत्मविश्वास की स्थिति क्या हो सकती है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 


सरकारी अस्पताल की सुविधाहीनता और संवेदनहीनता से परेशान निरुपमा को जब अपने प्रेमी सूरज कुमार की कायरता का पता चलता है, तो वह टूट जाती है। कस्बाई माहौल में पली-बढ़ी, भावुकता और रुमानी दुनिया में जीनेवाली निरुपमा सूरज कुमार को ख़ून से ख़त लिखती है और सूरज कुमार से यह इसरार करती है कि महीने भर के भीतर हम लोग यहां से भाग चलें। मगर यह पत्र लड़के के पिता के हाथ लग जाता है, जिसे कुपित डॉक्टर सारस्वत सार्वजनिक दर्शन के लिए अपने गेट पर बाकायदा चिपकवा देते हैं। उधर इस कार्रवाई और सूरज कुमार की बेवफाई से बेख़बर निरुपमा अपने किसी फोन का जवाब न देने वाले प्रेमी से सीधे मुखामुखम के लिए पहुंच जाती है, तो प्रेमी सूरज कुमार, जिसकी बहन वैशाली सारस्वत किसी चड्ढा लड़के के साथ घर से भाग चुकी है, निरुपमा को टका-सा जवाब देता है, मैं अब माता पिता को और मुसीबत में नहीं डाल सकता। इसका जो भी अर्थ लगाना है, लगाओ। नौटंकी जा कर कहीं और करो जाओ, यहां से!

भाई की हालत, परिवार की स्थिति और खुद के साथ हुए छलावों से निरुपमा बिल्कुल हताश हो जाती है। लेकिन उनके साथ पितृसत्ता की दरिंदगी यहीं नहीं रुकती। आखिर उसी के कारण उन मनचले लड़कों की पुलिस के हाथों पिटाई हुई थी। सो सूरज कुमार के यहां से लौटते हुए रास्ते में वही मनचले लड़के दोबारा सरेराह उसका दुपट्टा खींचते हैं, कपड़े फाड़ डालते हैं और उन लड़कों में से एक ठाकुर बलवान सिंह का लड़का उसकी मांग में सिंदूर डाल देता है। उसके बाद हिंस्र पशु की तरह निरुपमा को चींथने लगते हैं, मांग में सिंदूर डालने का का उत्सव शुरू हो गया। लड़के हाथ, पैर, नाक, मुंह छू-छू कर देखने लगे। उनका दुपट्टा किसी ने खींच कर दो टुकड़े कर दिए, फिर दो लोगों ने उसे अपने अपने सिर पर बांध लिया। जब कपड़े फट गए। कुर्ते के अंदर से ब्रा झांकने लगी। फिर ब्रा के अंदर से शरीर झांकने लगा। सलवार का नाड़ा खींच लिया गया।


यह इस कहानी की उपकथा है, जिसमें निरुपमा की मुखरता और साहसिकता की हिकमत की यह परिणति होती है। वैशाली घर से भागने को विवश होती है। लेकिन मुख्य कथा की सोनपती बहन जी, जिन्हें जरूरी पाठ की तरह याद रखने की जरूरत है, उनकी बेटियां बचपन से सामूहिक रूप से दग्ध होकर बड़ी होते हुए एक दिन पूरी तरह दग्ध होकर जीवन का किस्सा ही तमाम करने का कदम उठा लेती है। कौमार्य-प्रिय पितृसत्ता को शीघ्रातिशीघ्र पराई अमानत सौंपने को बेचैन सोनपती बहन जी की लड़कियां जिस पारिवारिक और सामाजिक माहौल में बड़ी होती हैं, उसमें एक स्त्री का पूरा जीवन अर्थहीन है। शायद इन वजहों से भी सोनपती बहन जी की लड़कियों को अपने जीवन का कोई अर्थ नहीं नजर आता और परिणति सामूहिक दाह तक पहुंच जाती है।


उपकथाओं की नदियां आगे चलकर जब मुख्यधारा में मिलती है, तो कथांत पाठकों को गहरी बेचैनी और स्त्री-अश्रु के वर्तमान और इतिहास के समुद्र में डूबो देती है। सोनपती बहन जी की लड़कियां आत्मदाह को प्रेरित होती हैं, पर निरुपमा और वैशाली जैसी लड़कियां जीना चाहती हैं-कहीं भी। निरुपमा भी भागती है, लेकिन स्टेशन की तरफ अकेले-यथार्थ में। इस विंदु पर आकर लेखिका अल्पना मिश्र ने फैंटेसी का इस्तेमाल करके कथांत को बेहद मार्मिक बना दिया है। जिसमें यथार्थ और स्वप्न एक-दूसरे में मिलकर यथार्थ की दारुणता को और बढ़ा देते हैं। सचमुच की भागी निरुपमा के यथार्थ में दर्जनों वे लड़कियां शामिल हो जाती हैं, जो भागी हैं अपने स्वप्न, अपनी डायरी, अपनी कुंठा और अपनी असफलताओं में। पितृसत्ता और समाज की हिंसा के सामने खड़े होने की हिम्मत करने वाला निरुपमा का भाई एक आम भाई और आम पुरुष से उस वक्त ख़ास पुरुष में रूपांतरित हो जाता है, जब कथांत की फैंटेसी में निरुपमा और निरुपमा जैसी अन्य लड़कियों के रक्षक और सच्चे सहायक के रूप में एकमात्र वही दिखाई देता है।


कई लेखिकाओं में स्त्री-विमर्शवादी उत्साह का अतिरेक इतना होता है कि उनकी कहानियों में तमाम पुरुष पितृसत्ता के संरक्षक ही नजर आते हैं। जबकि अल्पना मिश्र की कहानियों में तमाम पुरुषों के बीच ऐसे पुरुष भी हैं, जो वाकई स्त्री के सच्चे सहायक और सच्चे मित्र साबित होते हैं। वे पुरुषवादी मानसिकता के विरोध में तो हैं, लेकिन तमाम पुरुषों को स्त्रियों का दुश्मन मान लेने वाली मानसिकता से असहमत भी-जिस सच को सीधे न बोलकर भी वह अपनी रचना में अनुस्यूत सत्य के रूप में कह जाती हैं।
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[1] नलिनी जमीला एक पूर्व सैक्स वर्कर होने के साथ-साथ एक बेटी, पत्नी, मां, व्यावसायिक महिला और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। राजपाल एंड संस से हाल ही में हिंदी में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'एक सैक्स वर्कर की आत्मकथा'  के मलयालम में अब तक छह संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।
[2] अल्पना मिश्र के दूसरे कहानी-संग्रह क़ब्र भी क़ैद औ ज़ंजीरें भी की पहली कहानी ग़ैरहाज़िरी में हाज़िर की नायिका जिन स्थितियों में नौकरी के लिए घर से निकली है और अपने पीछे की पारिवारिक स्थितियों को याद करके जिस तरह नौकरी करती है-वह बेहद हौलनाक है। 


सम्पर्क-
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग,

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,

अलीगढ़-202002 (उ.प्र.),
फोन- 096342 82886

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