‘कृति ओर’ (65-66) के ‘पूर्वकथन’ पर आशीष कुमार सिंह की टिप्पणी





विजेन्द्र जी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे 'कृति ओर' पत्रिका में अपने पूर्वकथन के लिए भी जाने जाते हैं। इसमें वे अपने बेबाक विचार तत्कालीन समाज राजनीति और साहित्य के मद्देनजर रखते हैं। 'कृति ओर' का अधिकांश पाठक वर्ग इसकी प्रतीक्षा 'पूर्व कथन' के लिए करता है। इसी 'पूर्व कथन' पर हमारे युवा साथी आशीष ने पहली बार के लिए एक टिप्पणी लिखी है जिसे हम आप सब के लिए प्रस्तुत कर रहे है।
 

साथ न होना। छूटेगा उर का सोना.....।
(मध्यवर्गीय कवि नुमा जीव बनाम ‘प्रगतिशीलता’ का तमगा)


आशीष कुमार सिंह


    ‘कृति ओर’ (65-66) हमारे सामने हैं। इस अंक का ‘पूर्वकथन’ काबिले गौर है। इसमें विजेन्द्र जी ने प्रगतिशील आन्दोलन की संघर्षशील परम्परा का पुनर्स्मरण कराया है। इसे पढ़ते हुए हमारे सामने आज के तमाम ‘प्रगतिशील’ बिजूके अनायास कदम-ब-कदम दीखने लगते हैं। मध्यवर्गीय धुंध का प्रसरण करते इन कवि-कहानीकारों की नकली एवं उधारी बौद्धिकता साहित्य जगत के व्यापक हिस्से पर छाई है। ऐसे में निराला-मुक्तिबोध सदृश कवि व्यक्तित्वों की अटूट जनपक्षधरता का स्मरण समयाचीन है। साथ ही ‘मौकापरस्त सड़क छाप’ मध्यमवर्गीय बौद्धिक जमात की खोज-खबर लेना भी जरूरी है।

    जिन दिनों मुल्क में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का दौर दौरा था, मुल्क के कोने-कोने से उठने वाली तमाम आवाजें एक दूसरे की हमराही बन रही थीं। जिनका घुल-मिल स्वर एक समवेत स्वर में ढल कर, जयनाद में, गान में निःसृत हो रहा था। अवाम की आत्मिक ऊर्जा में पर्यवसित होते ये गान मुल्क के हजारों-हजार हृदयों को तरंगित-संवेदित कर रहे थे। आम-अवाम मुक्ति की चाहत में छटपटा रहा था। समूचे मुल्क में यत्र-तत्र-सर्वत्र सफल-असफल प्रतिरोध संघर्षों का क्रम जारी रहा। लहरों के मानिन्द जनउफान का यह क्रम कभी धीमा तो कभी तेज होता बस कि ठहरा नहीं। उतार-चढ़ाव भरे तमाम दौरों के बहुविध रंग-रूपों से, नेतृत्वकारी बुर्जुआ वर्ग की कमजोरियों और क्षमताओं का गहन रिश्ता है। फलतः औपनिवेशिक कोख में पला-बढ़ा यहाँ का बौद्धिक वर्ग जो खास ऐतिहासिक वजहों से आन्दोलनों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा मिलता है, वह अपने ऊर्जावान विगत अतीत का वाजिब ध्वजवाहक नहीं बन सका। उसका जन्मांकित चिन्ह ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करता था जो उसे खण्डित, पराभूत, परमुखापेक्षी, नायकत्व ही प्रदान कर सकता था। वर्तमान से असंतुष्ट व अतीत से विछिन्न कौम पराजय बोध से ग्रस्त नजर आती थी। यह एक तरफ अपने अतीत को तमाम कमियों का भण्डार मानती, दूसरी तरफ वैदेशिक ज्ञान आभा से आतंकित होने के हद तक अभिभूत। यह उसी में ज्ञान का सर्वोत्तम रूप महसूस करता। वहीं एक धारा बिछुड़े अतीत में अपने गौरवशाली क्षणों की खोज-बीन करती हुई अपने पराजय बोध का सामना करती मिलती है। अतीतग्रस्तता व अतीतान्धविरोध का सम्मिलित स्वर जो दोनों रूपों में अपने जमीन से कटे होने के चलते अपने ‘आत्म’ व ‘स्व’ की तलाश ही करते लगते हैं। अपने होने की वजह साबित करने की हरचन्द कोशिश। तथैव हम पाते हैं कि विविध लय व रंगमयी विरोधाभासी व्यक्तित्व हमारे आजादी की लड़ाई का नेतृत्वकारी तबका बनता है। वह चाहे सामाजिक-राजनीतिक ऐरिना में उपस्थित बौद्धिक वर्ग हो या साहित्यिक सांस्कृतिक क्षेत्र में रचनारत कवियों-कलाकारों की आबादी। यहाँ एक सिरे पर स्वामी दयानन्द सरस्वती हैं तो दूसरे पर राजाराममोहन राय। जमीन एक हैं लेकिन दृष्टि और समस्याओं के निदान की दिशा दोनों में अलहिदा है। उग्र राष्ट्रवादी तिलक अपनी ओजमयी आभा के बावजूद अपनी मजबूत दावेदारी पेश करने के लिए अतीत के रणांगन से वीरत्वपूर्ण कृत्यों वाले नायकों का आह्वान करने को विवश हैं। दूसरी ओर गोपाल कृष्ण गोखले हैं जो ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ के रंग में रंगे हुए राजनीतिक रंग मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। शनैः-शनैः भारतीय पूंजीपति वर्ग ज्यों-ज्यों अपना आधार विस्तारित करता है। तदनुरूप उसके चरित्र में परिवर्तन होता चलता है। कालान्तर में समझौता-दबाव-समझौता के रूप में उभरी अलहदा अभिव्यक्तियां एक दूसरे में समाहित होती नज़र आने लगती है। भारतीय मध्य वर्ग की सम्पूर्णतम विकास यात्रा व उतार-चढ़ाव का प्रतिबिम्बन करती कांग्रेस मिलती हैं तो हमें उसके प्रतिनिधि नायक महात्मा गाँधी भी मिलते हैं। जिनमें तिलक की उग्रता, पुनरुत्थानवादी दृष्टि एवं गोखले की धारा एक साथ घुलमिल जाती है। जय-पराजय भरी विगत अतीत का सिंहावलोकन व सम्यक् समाहार आज हमारी फौरी जरूरत है, क्योंकि अतीत का सर्वथा नकार या अनालोचनात्मक स्वीकार दोनों घातक हैं। आज पुनरुत्थान व विपर्यय के घटाटोप से जूझने के लिए भविष्योन्मुखी तार्किक दृष्टि नितान्त जरूरी उपकरण है। साहित्याकाश में अपने डैने पसारे ठण्डी कुत्सित निगाहों से घूरते मध्यवर्गीय कविनुमा जीवों के किंकियांध से निबटने की जरूरत है। यह तभी सम्भव है जब हमारे पास अपनी सम्यक् इतिहास दृष्टि हो व आज के जीवित सवालों से जूझने का माद्दा हो। मूल सवाल पर आने के पहले की यह लम्बी प्रस्तावना इसी योजना का एक हिस्सा है।

    दोस्तों, जिस प्रकार भारतीय राजनीति का विस्तृत वितान बहुरंगी विचार-व्यवहार से पुष्पित-पल्लवित मिलता है  वैसा ही हिन्दी का लेखक जमात कहीं उग्र तो कहीं समर्पणवादी मानसिकता से लैस मिलता है। भारतेन्दु का लेखन हो या मैथिलीशरण गुप्त का। वह कहीं ‘भारत दुर्दशा’ देख कर विलाप करता मिलता है, तो कहीं राजभक्ति में कसीदे पढ़ता नजर आता है। ये राष्ट्रकवि का गौरव वरण करने के साथ ‘हिन्दू पुनरुत्थानवादी’ दिशाबोध से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता। यही इनकी विवशता है, यही इनकी त्रासदी भी। हिन्दी साहित्य के कई एक विद्वतजनों ने अंग्रेजों की भक्ति साधना में लीन कवित्व रचते कवियों और उनके राष्ट्रीय मुक्ति की आकांक्षा से संवलित रचनाकर्म पर पर्याप्त रोशनी डाली है। तथैव इस पहलू पर विस्तार से, विधिवत् विचार करने की जरूरत है जिससे राष्ट्रीय नवजागरण व तत्कालीन साहित्य के अन्तर्सम्बन्धों की जांच पड़ताल की जा सके।

    यदा-कदा, समुन्दर की सतह पर प्रवाहमान शान्त जल धाराओं से समुन्दर के अन्तस्तल में हहराती पीड़ामयी हिलकोरों का अंदाजा नहीं लगता। वैसा ही राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष में उफनाती-हहराती दबी-कुचली गरीब आवाजें हिलकोंरे मार रही थीं। यह महज ब्रितानी हुकूमत से नहीं वरन् हर प्रकार की दासता से मुक्ति की कामना कर रही थी। इसीलिए इस आबादी का आक्रोश ज्यादा तीखा व वास्तविक वीरत्व का स्वर लिए हुए मिलता है। वह चाहे सन् सत्तावनी क्रान्ति में बढ़-चढ़कर भागीदारी करने वाले किसानों-मजदूरों के बेटे हों या कांधे पर बंदूक ढोते बागी सिपाही हों। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम की लम्बी संघर्ष यात्रा में यही वह जीवन्त धारा है जो हारने के बाद भी पस्तहिम्मत नहीं हुई। वह चाहे क्रमवार चलने वाली तमाम आदिवासियों के ‘ऊलगुलान’ हों, सन्यासी विद्रोह हो या मजदूरों की लड़ाई। जो कमोवेश लगातार तमाम रूपों में जारी रही। जिसने आगे चलकर सड़े-गले मूल्य-मान्यताओं को धता बताते हुए विदेशी हुकूमत को उखाड़ फेंकने वाली उग्र परम्परा भंजक विद्रोही पीढ़ी को पैदा किया, जिनमें राधामोहन गोकुल जी, विष्णु पराड़कर, भगत सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी व राहुल सांकृत्यायन आदि का नाम अग्रगण्य है। जनसंघर्षों की यह वो तापमयी श्रृंखला है जो आज भी हमें गौरवान्वित और आन्तरिक आवेग से आपूरित करती है। जिन दिनों ब्रितानी हुकूमत के विरुद्ध जन-मन की आवाज कविता-कहानी, गीत व नारों में ढल रही थी। आत्मिक ऊर्जा से लबरेज तमाम सृजनधर्मीजनों की एक ही मंशा थी कि यह कुहासा छंटे, ‘सुब्हे आजादी’, हमें जल्दी नसीब हो। गुलामी की बेडि़याँ टूटे। चूंकि गुलामी दोतरफा थी, एक देशी, एक विदेशी। और गुलामी के विरुद्ध जंग भी दोतरफा थी। देश का उत्पादक वर्ग, मेहनतकश वर्ग, जमींदारों की खातिर बेगार भाटते हुए, आए दिन महसूल वसूलते कारिंदों की मार से कराह रहा था। लूट-खसूट कर ऐश्वर्य की मीनारें खड़ी करते, धन पशुओं के खिलाफ नफरत खदबदा रही थी। तभी तो ‘तोड़ती पत्थर’ की मज़दूरिन इस व्यवस्था के प्रतीक ‘अट्टालिका प्राकार’ को ध्वस्त करने का जज़्बा पाले ‘गुर हथौड़ा हाथ’ ले ‘बार-बार प्रहार’ कर रही थी। सामाजिक विषमता के शिकार ‘हीरा डोम’ की अन्तर्वेदना को अन्दर तक महसूस करनेवाले कवियों में अग्रणी महाप्राण निराला ने जाति-पांत, छुआ-छूत का दंश झेलती आबादी का आह्वान किया। समाज की क्रूर विडम्बनापूर्ण जीवन को कथा-कविता का विषय बनाया। उन्होंने यूँ ही नहीं कहा होगा-

    जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ, आओ।
    आज अमीरों की हवेली,
    होगी गरीबों की पाठशाला।
    धोबी, पासी, चमार, तेली
    खोलेंगे अंधेरे का ताला।।


समाज में विषैले वृक्ष के रूप में आच्छादित वर्ण-दंभ को निराला ने अपनी तीखी कटु-उक्तियों का निशाना बनाया। ‘गर्म पकौड़ी व‘ मैं बम्हन का लड़का’ एक तरफ है तो दूसरी तरफ देवी, विधवा, कुकुरमुत्ता आदि रचनाएं हैं जो यथास्थितिवादी समाज व्यवस्था की जड़े उतकने का काम कर रही थी। जाहिर है कि तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक लड़ाई का नेतृत्वकारी तबके का चरित्र दो-रंगा था। निराला जैसे जनता के कवि की नजरों में ‘दो रंगे’ चरित्र वाले कागजी लीडरान खटक रहे थे, वह चाहे ‘मास्को डायलाग्स’ के ‘श्रीयुत गिडवानी जी’ हों या ‘कांग्रेसी बचुआ’। जो गाँधी टोपी धारे आम जनसभा में जमींदारों-साहूकारों का बगलगीर बना दिखता है। किसान-मजदूर आन्दोलनों के प्रति गाँधी, नेहरू व पटेलों का उपेक्षा भाव छुपाए नहीं छुप रहा था। ‘सोये हुए शेरों’ को जगाने से इनकी रूह काँपती थी क्योंकि ये ‘शेर’ आगे तक की यात्रा करते जो इनके लिए, जिनकी नुमाइन्दगी ये नेतागण करते थे उनके हित सुरक्षित न रख पाते। बाबा रामचन्दर दास, स्वामी सहजानन्द सरस्वती सदृश अन्यान्य तमाम किसान नेताओं को तथाकथित बड़े ‘लीडरों’ ने किन-किन मौकों पर धचका दिया, यानि ‘सहयोग’ का वायदा तो किया, सहयोग नहीं किया, यह जग जाहिर है तभी शायद निराला ‘काले-काले बादल आए, न आए वीर जवाहरलाल’ कहने को मजबूर हुए थे।

    निराला का रचना जगत काफी मोड़ो घुमाओ और उतार-चढ़ाव से विन्यस्त है, वैसा ही उनका औदात्यपूर्ण उत्तमता व पराभूत खण्डित व्यक्तित्व है। निराला के अन्तरविरोधी व्यक्तित्व के आइने में आजादी की लड़ाई का वर्ग चरित्र व उसके उन्नति-अवनति रूपों को परखा जा सकता है। यहाँ हम निराला के दूसरे तमाम पहलुओं पर चर्चा करने का लोभ संवरण करते हुए प्रमुखतम पहलू पर ध्यान केन्द्रित कराना चाहेंगे। मुझे कभी-कभी लगता है कि निराला का गद्य व पद्य उस संघर्षमयी वेला का अन्यतम उदाहरण है। इसमें उनके चिंतन की गहरायी व व्यवहारिक कार्य भारों को अमली जामा पहनाने के लिए जो उत्कट आकांक्षा दिखती है वह काबिलेगौर है। निराला का काव्य संग्रह ‘नये पत्ते’ और संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘कुल्लीभाट’ एक साथ रखकर पढ़ा जाय तो उस जमाने की जो तस्वीर उभरती है वह बहुत कुछ बयां कर देती है। यहाँ निम्नतम कोटि के व्यक्ति के व्यक्तित्वान्तरण की जो तस्वीर उभरती है वह तो है ही उससे भी बड़ी बात है तमाम सामाजिक अवरोधों से जूझते एक नये मनुष्य का जन्म। जिसकी आकांक्षा आत्ममुक्ति में नहीं अपने आस-पास की दबी-कुचली आबादी के साथ एकाकार होकर उनमें उजास भरने में है। उसी प्रकार ‘नये पत्ते’, अनागत कल के जिन दुर्निवार बन्धनों को तोड़ना है उनका आगाज करता है। यहीं क्या ऐसा नहीं लगता है कि कुछ एक मायने में दलित मुक्ति की समझौताहीन चेतना जो निराला में परिलक्षित होती है उसके बरक्स प्रेमचन्द थोड़ा कम गहरे में उतरते मिलते हैं? यहाँ सवाल तुलना का नहीं, न ही किसी छोटाई-बड़ाई को साबित करने से है-यह बात महज दीठि की उजास के तौर पर कही जा रही है। बावजूद इसके कि- ‘‘..............प्रेमचन्द का समग्र साहित्य ही मुक्ति संग्राम की मूलचेतना को बहुत बड़े फलक पर प्रतिबिंबित करता है।’’ (पूर्व कथन, कृति ओर-65-66) सामंती शक्तियों का अनमनीय विरोध और साम्राज्यवादी हुकुमत के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति का प्रखरतम स्वर हमें निराला, प्रेमचन्द, गणेशशंकर विद्यार्थी, राधामोहन गोकुल जी व राहुल सांकृत्यायन सरीखे तमाम रचनाकारों में देखने को मिलता है। इन सभी वरेण्य रचनाकारों का लेखन अपने समय व समाज की मांग से अनुपूरित है, इनका लेखन महज कर्मभर नहीं वरन् जीवन जीने का ढंग-ढर्रा भी है जो कृतसंकल्प होकर बामकसद रणक्षेत्र में उतरते दिखते हैं।

    आजादी के बाद निराला की परम्परा के वाहक के रूप में नागार्जुन, त्रिलोचन, शील व केदारनाथ अग्रवाल का नाम अग्रगण्य है। वहीं गजानन माधव मुक्तिबोध भारतीय जन के स्वप्न भंग यथार्थ व मध्यमवर्गीय जमात के ऊहा-पोह को व्यंजित करने वाले प्रखरतम रचनाकार के रूप में सामने आते हैं। निराला व मुक्तिबोध में प्रत्यक्षतः गर कोई एक बात कामन मिलती है तो वह है अपने समय की नब्ज पर गहरी पकड़, अपने जन पर अविचल आस्था। इसी में इनकी समूची रचना शक्ति निहित है। इन दोनों में ऊपरी तौर पर शिल्प, कला, भाषा में वह निरन्तरता भी नहीं दिखती जैसी सटीक निरन्तरता अन्य जनकवियों व निराला में देखने को मिलती है। यहाँ एक बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि- आखिर क्यों और किन मूलभूत जरूरतों के चलते निराला और मुक्तिबोध दोनों का गद्य-केवल इन्हीं दोनों का गद्य-कई बार कविता में विचार को अमली जामा न पहना पाने का या कविता में अपनी बात अधूरी रह जाने का बायस बनता है। काव्य व गद्य इनके यहाँ एक-दूसरे का पूरक बनकर प्रस्तुत रहते हैं। विचार का तनाव अपने तमाम तन्तुओं के सुलझने व असुलझने के रूप में बरकरार रह जाता है। तनी हुई रस्सी सा यह वैचारिक तनाव हीं ‘अभी न होगा मेरा अंत’ के रूप में है तो कहीं ‘मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं’, के रूप में ध्वनित होता है। ‘मैंने मैं शैली अपनायी’ से ‘आत्मसंभवा’ परम अभिव्यक्ति की तलाश क्या अपने समय के मूलवजूद की तलाश है? अपने काल का द्वन्द्व है या व्यक्ति और समाज के द्वन्द्व की धनीभूत अभिव्यक्ति है? कदाचित यह अपने समय का द्वन्द्व ही है जो बारम्बार अपने वस्तु तथ्य के साथ प्रकट होता है। काव्य और गद्य के बीच की यह आवाजाही इन कविद्वय में बराबर दिखती है। जहाँ सतत आत्मसंघर्ष है। ‘कोशिश करो, कोशिश करो/ जमीन में धंसकर, मनुष्य बनने की कोशिश करो।’ अपने आपको बार-बार वक्त की तुला पर जोखने की ऐसी कोशिशें अन्यत्र कम ही मिलती हैं। इसीलिए हमें ये (मुक्तिबोध व निराला)- ‘‘. . . अन्तर्वस्तु के स्तर पर ही नहीं वरन् काव्य भाषा के स्तर पर भी परम्परा के जिस गहन संवेग और ज्ञानात्मकता से सम्बद्ध कवि हैं वैसा सभी युगों में विरल है।’’ (जीवन सिंह, कृति ओर-51) अपने जन के प्रति यह समर्पण और अपनी चेतना का सर्वोत्तम ‘नये मनुष्य’ बनाने की प्रतिज्ञा उनके कविकर्म का उद्घोष बनकर प्रकट होता है-

हमारे पास
तुम्हारे पास
सिर्फ
एक चीज़ है
बुद्धि का बल्लम है
हृदय की तगारी है
बनाने के लिए भवन
आत्मा के, मनुष्य के नये-नये---

सम्भवतः इसी कारण अपने समय के सवालों से जूझना और फिर-फिर जूझना इनकी पहचान बन जाती है। इनके गहरे भाव-बोध और ‘पार्टनर आपकी पालिटिक्स क्या है?’ का निर्णायक सवाल इन्हें सामान्य से विशेष बना देता है। क्योंकि जो व्यक्ति जितना ही जन-मन के सुख-दुःख से एकाकार होगा उतने ही स्पष्ट भंगिमा में औरों के दोगलेपन व किन्तु-परन्तु भरी दृष्टि को प्रश्नांकित करने वाले नैतिक स्वर से लैस होगा। इन कवियों ने अपनी स्पष्टपक्षधरता की कीमत अलगाव, बहिष्कार आदि तमाम तोहमतों के तौर पर चुकाई। लगातार विरोध। फिर भी अनथक अग्रसर। ‘धिक-धिक जीवन जो सदा पाता ही आया विरोध’। और जहाँ तक मुक्तिबोध के अन्र्तद्वन्द्व को समझने का सवाल है उस पर अति संक्षेप में यही कहना उचित होगा कि उनके रचना जगत में मध्यवर्गीय मानस की पीड़ा और वैषम्य को टटोलने की जरूरत है। बारम्बार जिन यथास्थितियों, विद्रुपताओं की चर्चा वे अपनी कविता में करते हैं वह ‘जन-संग-ऊष्मा से लैस’ हृदय में चल रहे द्वन्द्ध को अभिव्यक्त करती मिलती है। स्वयं के मध्यवर्गीय मानस से टकराने के साथ ही ‘सफलता की गिलौरियां’ खाते हुए सत्तातुर कैरियर बाज जमात को तरेरते हुए कहते हैं कि ‘जो तुम्हारे लिए अन्न है, हमारे लिए विष है’। ‘सफलता’ के ‘चक्करदार’ जीने पर चढ़ने की कीमत कितनी भयावह, कितनी यंत्रणादायी है, यह वही जान सकता है जो मनुष्य बने रहना चाहता है। दो पायों, मानुष जाति के मध्यवर्गीय बेरीढ़ ‘उदरम्भरि’ जीव को धिक्कारते हुए कवि विजेन्द्र की प्रस्तुत काव्य पंक्तियां गौरतलब हैं-

 मैं कई बार
अपने इंसान होने पर
शक करता हूँ
कई बार
बेवजह पेट के बल रेंगता हूँ
मैं कौन से वर्ग समूह का नुमायंदा हूं।

    यहाँ चचा गालिब अनायास स्मरण में आ जाते हैं। जब वे ‘इंसा’ बने रहने की मुश्किलातों को बयां करते नज़र आते हैं। थोड़ी-थोड़ी सहूलियतों व सुविधाओं को सहेजने के लिए ‘ईमान बेचते फिरते’ लिक्खाड़ो की खोज खबर लेते हुए ‘एक साहित्यिक की डायरी’ के निम्न दो उद्धहरण बेहद मौजू हैं- ”अगर मैं उन्नति के उस जीने पर चढ़ने के लिए ठेलमठेल करने लगूँ तो शायद मैं भी सफल हो सकता हूँ। लेकिन ऐसी सफलता किस काम की जिसे प्राप्त करने के लिए आदमी को आत्म गौरव खोना पड़ें, चतुरता के नाम पर बदमाशी करने पड़े, शालीनता के नाम पर बिल्कुल एकदम सफेद, झूठी खुशामदी बातें करनी पड़ें। जिन व्यक्तियों को क्षण भर टालरेट (सहन) नहीं कर सकते, उनके दरबार का सदस्य बनना पड़े। हाँ, जो लोग यह सब कर लेते हैं, वे अपनी यशोपताकाएँ फहराते हुए घर में लौटते हैं और कितने आत्मविश्वास से बात करते हैं। मानो उन्हीं का राज्य है। बहुरूपिया शायद पुराना हो गया। लेकिन उनकी कला इनदिनों अत्यन्त परिष्कृत होकर भभक उठी है।” और ऊपर और ऊपर जाने की ठेलमठेल में जो लगे हैं उनकी स्थिति पर मुक्तिबोध कहते हैं कि - "उन्नति की तिमंजिल इमारत में घूम कर ऊपर तक जाने के लिए सिर्फ़ एक ही जीना है, वह भी चक्करदार। उस पर बहुत भीड़ है। बड़ी ठेलमठेल है। लेखक कहता है मैं उसके साथ रहूँगा, उसके साथ नहीं। लेकिन परिस्थिति ने उसको यह विकल्प दिया ही कहाँ है? वह परिस्थिति से जबरदस्ती यह विकल्प लेना चाहता है। इसका परिणाम यह होता है कि ठेलमठेल करती हुई भीड़ के नीचे वह कुचला जाता है या उस इमारत से बाहर उसको एकदम जाना पड़ता है; या वह ठेल दिया जाता है और साधारणतः ऐसे लोग अपनी वर्ग श्रेणी से गिरे हुए होते हैं। वर्ग-श्रेणी से गिरे हुए मनः स्थिति हमेशा खराब रहती हैं ..............।"

    इस प्रकार ‘पूनो की चाँदनी’ में विचरण करते, करने को आतुर मध्यवर्गीय रचनाकर्मियों की मुक्तिबोध तिक्त-कटु आलोचना करते हैं। साथ स्वयं की वर्गीय कमजोरियों से सतत संघर्ष भी करते हैं। कभी-कभी यह आत्मसंघर्ष हमें निराला के द्वन्द्व का विकसित रूप लगता है-‘साथ न होना। गाँठ खुलेगी, छूटेगा उर का सोना। साथ न होना।’ इसे उन लोगों-जिनने जनता का पक्ष चुना है- को ताकीद करता बयान भी कह सकते हैं।

    आज के कठिन और बेहद ठण्डे दौर में जब प्रगति पर ठहराव की शक्तियां हावी हैं.  पूंजी के बूटों तले श्रम कुचला जा रहा है। मुक्तिकामी संघर्ष की लौ थोड़ी मद्धिम पड़ी है। ऐसे में ही ‘ज्ञान भिन्न, कुछ क्रिया भिन्न’ की मानसिकता से ग्रस्त तमाम मध्यवर्गीय-निम्न मध्यवर्गीय पिद्दी पहलवान साहित्य-समाज के मुख्य ध्वजवाहक बन बैठे है। ये ‘प्रगतिशील’ अपने कर्म-व्यवहार में इतने ओछे हैं कि इनमें विगत काल की जाज्वल्यमान प्रगतिकामी परम्परा की छाया भी नज़र नहीं आती। अखबार की कतरनों में नाम तलाशते, किसिम-किसिम की गोटियाँ भिड़ाते, गोष्ठी दर गोष्ठी मुखौटे बदलते इन लिक्खाड़ों की स्थिति देखकर महज हँसा ही जा सकता है। यह साहित्य समाज के रथ पर सवार बहरूपिया है बौद्धिक तौर पर बौना है, कर्म व्यवहार में विदूषक है। जो भाँति-भाँति का बाना धारण कर अपनी अर्थवत्ता साबित करने में मुब्तिला है। नयी पीढ़ी को अपने चौक-चमत्कार से दिग्भ्रमित ही कर सकता , रोशनी नहीं दे सकता क्योंकि इसके दिये का तेल चुका गया है।

    ऐसे चुनौती पूर्ण समय में जनजीवन की हालात को बदलाव की दिशा में मोड़ने को कटिबद्ध सृजनकर्मियों का दायित्व बढ़ जाता है। नयी वस्तुगत सच्चाइयों को उभारने के साथ-साथ तमाम उग आई खर-पतवार की साफ-सफाई जरूरी है। गुजरे अतीत पर निगाह डालते हैं तो हम पाते हैं कि ”लेखकों ने मुक्तिसंग्राम में संघर्षरत अपने तत्काल पूर्व के लेखकों द्वारा बनाई गई संघर्षधर्मी परम्परा को विकसित किया। उसे धारदार बनाया। सही दिशा दी। अग्रगामी साहित्य की प्रक्रिया को सुनिश्चित कर और आगे बढ़ाया।“ (विजेन्द्र) उस दौर के जीवन-रस के भरपूर रचनाकार ‘सुर्ख सबेरा’ लाने की जद्दोजहद में , ‘नए गगन में, नया सूर्य’ उगाने की आशा में आहलादित मिलते हैं। यहाँ नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, शील आदि बहुविधि रूप में जन-आलोड़न-विलोड़न में गोता लगाते अपनी कविता की धार को पैनाने में लगे रहे। इनसे इतर ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ से खाद-पानी ग्रहण करती जन-जीवन से दूर आत्ममुग्ध कवि जमात के झण्डाबरदार सामने आते हैं। कदम-दर-कदम नफासत तलाशते फूँ-फाँ करते इन मध्यवर्गीय कवियों की मुक्तिबोध ने अच्छी खोज-खबर ली है। जरा सोंचे कि रघुवीर सहाय जैसों की मध्यवर्गीय पिनपिनाहट और धूमिल के महज नकारवादी बयानों का कोई न कोई तो आत्मगत-वस्तुगत कारण होगा? इनकी वर्गीय कमजोरियों व सीमाओं की इन्दराजी करने के बजाय नयी कविता के सुविज्ञ आलोचक इनसे ही  ‘नयी कविता का प्रतिमान’ गढ़ने का काम लेने लगे। आखिर क्यों? अभिजात्यपूर्ण सादगी की इस रूपवादी व्याख्या में सब ‘अहो रूपम, अहो धन्यम’ ही है इसके अलावा ‘कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं’। साहित्य में प्रगतिशीलता का बाना ओढ़े यह दृष्टि बुर्जुआ दृष्टि है, सर्वहारा दृष्टि नहीं। जो प्रतिगामी विचार का वाहक बनती है। जबकि ”हर जाति के सांस्कृतिक रूप के समानांतर उसका एक संघर्षधर्मी रूप भी होता है। पर बुर्जुआ अपने हित के लिए उसके मनोरंजक रूप को सामने लाता है। संघर्षधर्मी रूप को नहीं। प्रगतिशीलता या जनवाद बिना ‘लोक’ के क्रियाहीन और निष्प्राण होंगे।“ (विजेन्द्र) वस्तुतः गर कोई रचनाकार अपने दौर की वास्तविकताओं का सामना करने से झिझकता है, वास्तविक इतिहास निर्मात्री शक्तियों को स्वीकारने की बजाय तमाम किन्तुओं-परन्तुओं का धूम्रावरण खड़ा करता है, ऐसी कोई भी रचना कितने ही सुन्दर शिल्प के कलेवर में प्रस्तुत की जाये हमारे किस काम की!

     दरअसल जब हम अपने समय की चुनौतियों से दो-चार होते हैं, तो सामाजिक अन्तरविरोधों व वर्गीय टकराहटों के मूल मन्तव्यों को खंगालने की कोशिश करते हुए हमें अपने अन्दर भी झांकना पड़ता है, आत्मिक जगत की हलचल हमें उद्धेलित करती है। यह उद्वेलन परस्पर हितों की टकराहटों के समाज की प्रतिच्छाया या प्रतिध्वनि होती है जिसकी अनुगंूज साहित्य में प्रवहमान होती है। चूंकि हर रचनाकार किसी न किसी वर्ग की छाप लिए होता है। उसकी वर्गदृष्टि व्यापक सामाजिक बदलाव की ओर क्रियारत भविष्योन्मुखी शक्तियों के पक्ष में है या निहित संकुचित वर्गीय क्रोड में आबद्ध। यही वह द्वन्द्व है जो लेखन में अपना अक्स छोड़ता है। यहीं वह अपना पक्ष तय करता है जाने या अनजाने हम जानते है कि जिन साहित्यकजनों का पेण्डुलम सतत दोलायमान है, ढुलमुलयकीनी है वे ही अधिकांशतः कला, रूप और शाश्वत साहित्य का राग अलापते पाये जाते है। जिन्हे कला-शिल्प व शब्द के गंुजलक में न इधर न उधर होने का भ्रम रचते ‘सचमुच’ का ‘सच’ कहने का आनन्द प्राप्त करते पाया जा सकता है। ‘तटस्थ’ दृष्टा’। ऐसे तमाम जीवधारी ‘प्रगतिशीलों’ की जमात में ‘काँख भी दबी रहे, मुट्ठी भी तनी रहे’ की भंगिमा बनाए मिल सकते हैं। ये आत्म स्वीकार व समर्पणवादी जिरह करते-करते, जो है नहीं, उसके लिए रोते-झींकते हैं। इन कवियों में हम केदार नाथ सिंह, असद जैदी, अनामिका और संजय चतुर्वेदी जैसों को नामांकित करें तो कोई गुनाह नहीं है। पलायन जीवी, इन कवियों और उनके मुरीद आलोचकों की वर्ग-दृष्टि का विश्लेषण किया जाना चाहिए। क्योंकि आज इन ‘प्रगतिशीलों’ के हाथों में दिशाबोधक जलती मशाल नहीं धुंवाती लुकाठी है जो हमारी निगाहों में महज धुंध ही भरती है। प्रगतिशील साहित्य की विकासमान परम्परा का वह हिस्सा जो क्षरित-विघटित होते-होते सड़े बीमार विचारों का प्रसारक बन गया है। उनका संगी-साथी बनना आत्मघाती है। तथैव ”प्रगतिशील जनवादी महान गौरवशाली संघर्षशील परम्परा को पुनः व्यापक तथा असरदार बनाने के लिए हमें ‘प्रगतिशील पुनर्जागरण’ की बेहद जरूरत है। ............ हमें अपनी संघर्षशील जनता की अपराजेय शक्ति पर भरोसा करने के लिए उससे एकात्म होना जरूरी है।” (विजेन्द्र)


 परिचय-

आशीष कुमार सिंह

30 जुलाई 1977 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म।
हिन्दी साहित्य से एम.ए. करने के बाद सामाजिक-राजनीतिक  बदलाव की मुहिम में अपनी भा
गीदारी शुरू की।
मूलतः सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता की भूमिका का निर्वहन करते हुए छिट-पुट साहित्यिक लेखन। ‘जनचेतना’ से संबद्ध।




सम्पर्कः

आशीष कुमार सिंह
ई-2/653, सेक्टर-एफ
जानकीपुरम, लखनऊ-226021

मो0नं0- 08739015727  
ईमेलः singhk.ashish@yahoo.com


टिप्पणियाँ

  1. "कृति ओर" एक समृध्द और निष्पक्ष पत्रिका है। विलक्षण काव्य प्रतिभा के धनी लोकोन्मुखी परम्परा के कवि विजेन्द्र साहित्य की मुख्यधारा में शामिल हैं। " कृति ओर" पत्रिका के सम्पादन के ज़रिए सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए भी हैं।
    आपकी टिप्प्णी बहुत सटीक है।
    शाहनाज़ इमरानी

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