भरत प्रसाद की लम्बी कविता


भरत प्रसाद
कट्टरतावाद आज अपने नए रंग-रूप में हमारे सामने है उसकी चाहतें आज भी अपना वर्चस्व कायम करने की ही हैंइराक हो या फिर अफगानिस्तान, कोई भी देश या समाज उसकी हवस का शिकार बन सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में न केवल वह देश बर्बाद होता है बल्कि वहाँ का जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। धर्म के नाम पर ये कट्टरवादी तत्व जो फरेब रचते हैं वह लोगों को मायावी सपने दिखाता है। ऐसे सपने जो अन्ततः विनाशक साबित होते हैं खतरनाक सपनों के इन मायावी शिल्पकारों की पड़ताल करते हुए युवा कवि भरत प्रसाद ने एक लम्बी कविता 'बन्धक देश' लिखी है जो आप सबके लिए प्रस्तुत है।  
      
भरत प्रसाद की लम्बी कविता

बंधक देश
(अपने ही देश में दर -बदर हुई ईराक की जनता को समर्पित)

तौल दिया है खुद को

गिरवी रख दिया है, उसने शरीर को  
बेंच डाली है आत्मा, मजहब के हाथों
तौल दिया है खुद को, खुदा के आगे
जी कर भी वह अपने लिए नहीं जीता
मर कर भी कभी अपने लिए नहीं मरता
सिर ले लेता है, खुदा के नाम पर
सिर दे भी देता है, खुदा के नाम पर
आत्मा क्या है- सैलाब है,
मचलते उन्माद का,
मस्तक क्या है - मोर्चा है
उजाले के खिलाफ युद्ध का।
अन्धा अनुगामी वह ख़ूनी खयालातों का
भीषण गुलाम है, अपने जज्बातों का

खतरनाक सपनों का मायावी शिल्पकार
दहशत का पुतला है, अमन का सौदागर,
इंसानियत की खुशबू को
रत्ती भर जाना नहीं,
अपनत्व की महक को
ठीक से पहचाना नहीं

आकाश को देखा अन्धकार की तरह
धरती को जाना युद्धभूमि की तरह
खाली - खाली खोखला
भटक रहा दिशाशून्य
जलता और जलाता हुआ
अपनी ही ज्वाला में
यहाँ, वहां, जहाँ -तहां
न जाने कहाँ कहाँ?
नाच रहा, भाग रहा अपनी ही सनक में।
कुचल कर मार ही डाला
सीधे -सच्चे एहसास
चुन -चुन कर रौंद डाला
जीती -जागती वेदना
नहीं बची एक भी पावन अनुभूति
भाप बन कर उड़ ही गया इंसानी स्वभाव
ह्रदय की तरह, हृदय धड़कता ही नहीं
मचलने की तरह, दिल मचलता ही नहीं
आँखें अब किसी के लिए नहीं रोतीं
इच्छाओं में नाचती है सर्वनाश की भूख
सपनों में जलती हैं, अनगिनत चिंताएँ  
बेदर्द इतना कि मुर्दा भी फेल है
भूल चुका है वह, आंसुओं की भाषा
भूल गया है, गूंगे की पुकार
खो दिया है उसने, विलाप सुन कर सिहर जाना
खो चुका वह, आदमी के काम आना
रत्ती भर शेष नहीं, पश्चात्ताप का भाव
रेशा - रेशा उड़ चुका है, निर्माण का स्वभाव
अंधी है बेतरह, भीतर वाली आँख
मानस में घहराती केवल सियाह रात।
धंसा और धंसता हुआ
खून भरे दल-दल में
फंसता और फंसाता हुआ
भीषण मायाजाल में
जहरीले खेलों का अव्वल ख़िलाड़ी है।
आग, आग, आग
केवल आग का पुतला वह
खो चुका यकीन है
अपने ही लोगों से
अंग-अंग दहक़ रही
प्रतिशोध की चिंगारी
एक - एक कदम इसके बम से भी घातक हैं
एक - एक सोच इसकी
भूकंप से विनाशक है।
इसमें अब शेष कहाँ?
विचारों की सुगंध
रत्ती भर बाकी कहाँ?
दिल का अस्तित्व
उजाले से मानो सौ जनम की दुश्मनी हो।
फोड़ डालीं आँखें ही, अपने विवेक की
भीतर ही रौंद डाला, अपना ईमान
खा ही डाला आखिरकार 
इंसान होने का अर्थ।
तनी हुई नजरें, बन्दूक से भी घातक हैं
कारनामों का मायाजाल, अमावस्या से भयावह है
कौन सी प्रजाति पैदा हो चुकी है पृथ्वी पर
जिसका दुस्साहस,
सारी दुनिया पर भारी है।


हत्यारे सपनों का कुशल शिल्पकार है

हिंसा के उत्सव, पागल नृत्यकार वह
हत्यारे सपनों का कुशल शिल्पकार है
पल -पल वह गढ़ता है, ख़ूनी ख्यालात
मस्तक में नाच रहे बारूदी जज्बात
सीमा से बाहर है, इसे समझ पाना
बुद्धि से परे है, इसे बूझ जाना
पृथ्वी पर श्मशानी तांडव का सूत्रधार
एक सनक एक जिद्द, ह्रदय पर सवार है
इसीलिए बार-बार
कर रहा प्रहार है
पलट देगा प्रगति
और उलट देगा संस्कृति
सभ्यता की धारा को मोड़ देगा पीछे
हजारों साल पीछे, हमें खींच कर ले जाएगा
खड़े-खड़े प्रलय भरी आँखों के बूते वह
झुक कर दो हाथों पर
चलना सिखाएगा।
उछल रही मचल रही
मन में आशंका क्यों?
चारों ओर गूंज रही, अमानव की आहट
जिसकी पदचाप में मृत्यु का तनाव है
जिसके अंदाज में, मिटाने का भाव है।
सावधान विश्व!
यह मानव की नस्ल नहीं
इसकी करतूत तो दानव से बढ़ कर है
क्रूर कारनामों का ऐसा है सूत्रधार
जिसकी मिसालें इतिहास पर भारी हैं
उन्मादी सांचे में,
ढला हुआ बुरी तरह
मजहब की म्यान में सोती तलवार है
सहना आघात इसका
छटपटा कर मर जाना
और क्या विकल्प है, जनता के सामने?
और अभी कितने बरस
और अभी कितनी बार
मासूम चेहरों की होलिका जलेगी?
सत्ता और शासन के ख़ूनी शतरंज में
कितनी और माओं की
अस्मत लुटेगी?
प्रश्न - प्रश्न और प्रश्न
दहक रहे चारों ओर
कौन है सिद्धार्थ, जो इस आग को बुझाएगा?
दिशा - दिशा नाचती
इस विप्लव की आंधी में
कहाँ है वह रास्ता?
जो हार चुके आदमी को
उसके घर तक ले जाएगा -
देखो अपने चारों ओर
नजरें घुमाओ जरा
पड़ चुका अकाल है, सीधे साफ़ उत्तर का।
 


देश की हरियाली को लकवा मार गया है

समूचे आकाश को खा गयी है धूल
अन्धकार निगल गया है दिशाओं को
क्षितिज का कोना-कोना
काली धुंध के चंगुल में फंसा हुआ
आतंक की माया इस कदर
कि देश की हरियाली को लकवा मार गया है।
विकलांग होने लगे हैं, धरती के बीज
बंजर हो चली है, मिट्टी की कोख
इतनी उदास सुबहें कभी नहीं रहीं
हवाओं की आत्मा से, रहस्यमय आह झरती है
इस देश में आते ही
सूरज भटक जाता है
कहीं किसी कोने से कांपते हुए उठता है
न जाने किस ओर औंधे मुंह गिरता है
यहाँ पानी से गायब होने लगा है पानीपन
वे खोने लगे हैं, प्यास बुझाने का स्वभाव
यहाँ खून के आगे, उनका स्तर भी कम होने लगा है
फिजाओं में सनसनी का पहरा है
वर्षों -बरस की तरह बीतते हैं दिन
काट खाती है बर्फीली शांति
मौत कदम -कदम पर नृत्य करती है
गर्दनें उड़ा कर यहाँ पेट भरने वालों ने
भूख की परिभाषा ही बदल दी है
बावजूद इसके, बेमौत मरने वाली जनता को
अन्न की ही भूख लगती है
जीने की चाहत यदि रत्ती भर बाकी है
तो चुपचाप गुलाम बन जाओ
न पूछना कोई सवाल, न टालना इनका हुक्म
खैर मनाओ कि जानवर नहीं ठहरे
वरना धड़ अलग करने से पहले
यहाँ पूछा भी नहीं जाता
कि तुम्हें खुदा मंजूर है या ....?
यहाँ हथियारों के अतिरिक्त
किसी का शासन नहीं चलता
बंदूकों के अलावा
किसी की आवाज नहीं उठती
गोला - बारूद के सिवा
किसी का सिक्का नहीं चलता
इस देश में,
पक्षियों ने उड़ना बंद कर दिया है
उनके सांस लेने लायक अब आकाश ही कहाँ बचा?
क्षण-क्षण पास आती हुई
मौत के भय से भूख तो गायब है
मगर दम पर दम
अन्न - अन्न पुकारती
बच्चों की आँखों का क्या करें?
भूख से बिलबिला कर
पानी-पानी मांगते उनके विलाप का क्या करें?
रोम-रोम से उठती
भूख-प्यास की आग ने
इनकी मासूमियत को अँधा कर दिया है
पशु -पंछी की तरह कहीं भी
पानी पीने का दृश्य चारों ओर
बूचड़खाने में तब्दील हो चुका है
पूरा देश
आत्मा चीत्कार उठती है, इसकी सीमाओं में
समुद्र की तरह मथती है
माटी के प्रति दीवानगी को
मारना ही होगा,
दबाना ही होगा, वतन के प्रति धधकती आग
नस-नस में निरंतर
यह जो स्वदेश बहता है
त्यागना ही होगा अपना स्वभाव
रोम-रोम में मचलते
सारी माताओं का ऋण, मिल कर भी
मातृभूमि की बराबरी नहीं कर सकते
अपनी धरती से जुदा होने की हूक
हड्डियों में खून जमा देती है
चाहत कुछ इस कदर
कि अपने आकाश से
आँखें मिलाने की हिम्मत ही नहीं बची
बिछुड़ने से पहले
नदियों, तालाबों, दरख्तों, पगडंडियों से
और भी न जाने किस-किस से
बच्चों की तरह लिपट कर
रोने को जी.....।
लो! छोड़ती हूँ अपना वतन
भागती हूँ अपनी जमीन से
नहीं मांगूगी अपने लिए दया
प्राण की भीख मांगने के लिए
झुके मेरी गर्दन, तो काट लेना उसे
बस, बक्स दो फसलों की हरियाली
दाग़ मत लगाना देश के दामन में
उसके अस्तित्व पर आघात मत करना
जरा भी कहीं भी, किसी कोने से
यदि रत्ती भर आदमी हो, तो
जरा सोचना,
अपने अंधेपन के अंजाम के बारे में।
तुम्हारी गोली से मरने वालों की आँखों में
कभी देखा है अपना चेहरा?
कभी पढ़ी है खून में डूबे हुए
आंसुओं की नफरत?
कभी सुना है मृत्यु के पहले
दहकते हुए दिल का धिक्कार?
कभी जाना है- गोली खा कर शरीर का छटपटाना?
यदि नहीं,
तो मुझे तुम्हारे जिन्दा होने पर संदेह है।
कभी आईने में देखना अपना चेहरा
आँखों में आँखें डाल कर
पूछना अपने आपसे,
मासूम बच्चों को जिन्दा गाड़ देने वालों को
क्या कहा जाता है?
गुलाम बन कर पैदा हुई औरत को
गुलाम बनाने वाला
इतिहास में क्या स्थान पाता है?
पशुओं की तरह कतार में खड़े करके
अनगिनत सैनिकों को भून देने वाला
आदमी कैसे हो सकता है?
धर्म के नाम पर
ग़ैर मजहब के बन्दों से
सियासत का खेल खेलने वालों के लिए
सटीक शब्द ही नहीं बना
नस-नस के भीतर से आज न जाने क्यों
धर्म के खिलाफ बगावत उठने लगी है।
नफरत, नफरत, नफरत
मगर पास आओ, मेरे पास आओ
जी भर कर पहचान तो लूं -वतन के हत्यारों को
मिलाओ मुझसे निगाहें
ताकि बता सकूँ औरत होने का अर्थ
उतर सकूँ अपने अंदाज में, तुम्हारे भीतर
धंस जाऊं, समा जाऊं, फ़ैल जाऊं
तुम्हारी हड्डी-दर-हड्डी  में
तुम्हारे खिलाफ कैसे मैं क्या करूँ?
कि लाखों घावों से मुक्त हो कर
उठ खड़ा हो मेरा देश।
सत्ता की सनक में
बच्चों-बूढ़ों को लूट- मार कर
जूतों का गुलाम बनाया
हम चुप रहीं
हमारे ही साथ, हजारों विधवाओं को
अपनी हवश का शिकार बनाया
हम चुप रहीं
दासों की तरह जंजीरों में बांध कर
हमारी मां-बहनों को
भरे बाजार बेंच डाला
फिर भी हम चुप रहीं
मगर सावधान!
बेटिओं की आबरू को लूट कर
नृत्य करने वाले
हमारे मरते दम तक
अपने-अपने प्राण बचाने के लिए
अपने खुदा से दुआ करना।
हटाओ, हटाओ ये पर्दा
बोझ बन चुका है मेरे चेहरे पर
दम घुटता है इसके भीतर
यह सैकड़ों गुना दुखदायी है
जेलखाने से,
तुम्हारी खींच दी गयी सीमाओं में
छटपटा कर मर जाना हमें बर्दाश्त नहीं
टूक-टूक कर देना है
तुम्हारी बनायी हुई हदें
हम औरतें अमन की बेटियां हैं
हथियारों की टंकार से घृणा है हमें
खोना नहीं चाहतीं धैर्य का स्वभाव
ताकत के नशे में पागल हो कर
हमारा कभी इम्तहान मत लेने
औरत तभी तक औरत है
जब तक वह सीमायें नहीं तोड़ती
वरना वह तो बाढ़ की लहर है
सुलगती हुई मशाल
हथियार की धार में छिपी हुई चिंगारी
प्रेम की तरंग में सोयी हुई बिजली
मानव-सृष्टि की प्रस्तावना
औरत तो अपने आप में
मनुष्यता के शिखर की
गुमशुदा नींव है
सांस-दर-सांस
लड़ाई से नफरत करते हुए भी
लड़ेंगे हम
उठाएंगे हथियार,
ठीक तुम्हारी तरह
अपनी कठोरता के आगे
इस्पात को भी फेल कर देंगी
कद-काठी से औरत होकर भी
तुम्हारे सर्वव्यापी भय के सामने
हम घुटनों के बल झुकेंगी नहीं
तनी हुई रीढ़ के बल खड़ी होंगी।
सूफियों, दरवेशों की धरती
थर्राने लगती है आजकल
नदियों की शरीर से खून बहता है
रात के सन्नाटे में
सांय-सांय सिसकती हैं दिशाएं
पठार, पहाड़, मैदान
अपनों को खो-खो कर
मातम मनाते हैं।
पराये देश के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों का
क्या था इस देश से रिश्ता?
जिसने गूंगी जनता की छटपटाती
आत्मा को बुलंद करने के लिए
अपनी साँसें ही कुर्बान कर दीं
खुद से पूछना कभी
अपने देश का कौन होता है?
वह जो उसके आंसुओं को जीता है,
या फिर वह
जो उसका खून पीता है?
न्याय की चाहत में
गिरे हुए खून की एक-एक बूँद अमर है
वह उगा देती है, भविष्य के रक्तबीज
खड़ा कर देती है
प्रतिरोध के लिए झूमती हुई फसलें
देश के लिए
देश की मिट्टी में मिला हुआ लहू
यूँ व्यर्थ नहीं जाता।


भविष्य का प्रातःकाल.........  
                                                               
हम तो क्या, हमारा बच्चा-बच्चा
हमारी आने वाली पीढ़ियाँ
नस्लें-दर-नस्लें
दीवार बन कर खड़ी होंगी
तुम्हारी हुकूमत के खिलाफ-
अमन की हिफाजत में।
तुम्हारे वश का नहीं होगा
मशालों का रुख मोड़ पाना
निगाहें थक जायेंगी
चट्टानों की गिनती करते-करते
आज अन्धकार की बेला है
चला लो मनमाना क़ानून
लगा लो बाजी,
भविष्य का प्रातःकाल हमारा होगा।
जमींदोज होगी इसी मिट्टी में
तुम्हारी भी पहचान
मिट ही जाएगा एक दिन
तुम्हारा वजूद
विलुप्त होता है - कभी न कभी
आकाश छूता ज्वार
याद रखना
तुम्हारी संतानों की नजरें
तुम्हारा नाम लेते ही
शर्म से झुक जाएँगी
तुम्हें भी पता है कि
बार-बार चुभते हुए कांटे का हश्र
क्या होता है?
घात लगा कर काटने वाले सांप के साथ
कैसा व्यवहार होता है?
रोड़ा बन कर अड़ा हुआ पत्थर
कहाँ फेंका जाता है?
और आँख में पड़ा हुआ कीड़ा........
याद रखना, एक न एक दिन
मेरे देश के चमन में
आजादी की फसल लहलहाएगी
जंगल की तरह उठ खड़े होंगे
उम्मीदों के दरख़्त
मेरी धरती की छाती
बेदाग होकर रहेगी
किसी भी दूधिया आँखों में
दहशत का नामोनिशान नहीं होगा
धरती को चूम लेने के लिए
झुके ही रहेंगे नौजवानों के मस्तक
खुली रहेंगी बाहें
सरहदों को गले लगाने के लिए।
आज मेरे देश की गुलामी
रगों में बहता हुआ शीशा है
वज्र बन कर टूटा हुआ दुर्भाग्य
कलेजे के आर-पार कोई तीर
मेरा देश
मेरे ज़िगर का टुकड़ा है
और मैं उसकी धूल
मेरे जीवन से कई गुना बढ़ कर है मेरा देश
वह तो मेरी आत्मा की खुशबू है
सपने में भी
इस देश को गुलाम बनाने की सोचना
अपने ही हाथों अपनी जड़ खोदना है।

(दिसंबर - २०१४)


सम्पर्क-
मोबाईल- 09863076138
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

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