विष्णु प्रभाकर की डायरी

विष्णु प्रभाकर

पत्रकारिता का पेशा अपने आप में बड़ा चुनौतीपूर्ण होने के बावजूद युवाओं को कैरियर के रूप में अपनी तरफ अधिकाधिक आकर्षित करता रहा है। लेकिन यहाँ के अंदरखाने की हकीकत बहुत ही त्रासदीपूर्ण है। जब युवा इस हकीकत से रु-ब-रु होता है तो उसका मोह-भंग हो जाता है। दुर्भाग्यवश आज मीडिया उस पालतू तोते की बोलने लगा है जो धीरे-धीरे अपनी असली आवाज भी भूल जाता है। विष्णु प्रभाकर युवा रचनाकार हैं। उन्होंने अपनी डायरी के पन्नों में एक युवा के पत्रकारिता प्रेम और उसके मोह-भंग की स्थिति को चित्रित करने का सफल प्रयास किया है यह कहानी केवल विष्णु प्रभाकर ही नहीं देश के अन्य युवाओं की भी कहानी है। तो आइए आज पढ़ते हैं विष्णु प्रभाकर की डायरी का यह पन्ना।
   

डायरी के पन्ने से
 
  
विष्णु प्रभाकर


खबर मिलते ही मैंने जाने की तैयारी शुरू कर दी। पहले से इसका इंतजार था। लेकिन खुश होने जैसा कुछ था नहीं चार महीने तक अखबारों के दफ्तरों के चक्कर लगाते लगाते थक चुका था तब जा कर ये नौकरी मिली थी। और नौकरी भी मिली तो शहर से अस्सी किलोमीटर दूर। लेकिन क्या करता बेरोजगारी के इस आलम में कुछ तो करना ही था। जब घर से निकला तब पता चला कि बाबू जी ठीक कहते थे "इस जमाने में नौकरी का मिलना भगवान के मिलने जैसा है"।

शहर में रहना अब कठिन हो रहा था महंगाई भी तो उम्र के साथ बढ़ती चली आ रही है। शहर भेजा गया था कि अधिकारी बन कर लौटूँगा। और मेरा मन था कि तनिक भी इस पढ़ाई में लगता नहीं था। विश्वविद्यालय के दिनों से ही पत्रकारिता काफी अच्छा लगने लगा था। मै तय कर लिया था कि मुझे पत्रकार ही बनना है। जब विश्वविद्यालय में पत्रकारों को घूमते देखता था उनसे जाकर पूछता कि किस अखबार के लिए काम करते हैं। देखता किस तरह से न्यूज़ लिख रहे हैं। ग्रैजुएशन के बाद ही इसके लिए प्रयास शुरू किया था। पत्रकारिता पढ़ा नहीं था। बाद में पत्रकारिता में डिप्लोमा भी किया। कुछ कुछ अखबारों में लिख कर भेजता पर छपता नहीं। प्रयास करता रहा। बहुत बार कई मसलों पर लिखने की कोशिश करता रहा। एक दिन "शिक्षा के निजीकरण" पर एक लेख लिखा और एक नामी अखबार में भेज दिया। लिखने में कई दिन लग गये था। चार दिन बीत गये। रोज अखबार देखता कि मेरा लेख आया है कि नहीं। पाँचवें दिन मैंने संपादक को फोन किया और कहा "मै एक लेख भेजा था। आपने पढ़ा?"

"
कौन सा लेख?" उधर से आवाज आयी।
"
शिक्षा के निजीकरण पर मेरा लेख था। चार दिन पहले भेजा था।"
"
क्या नाम है आपका??
"
शशिकांत"
"
आज आपका लेख जा रहा है।"

मैंने शुक्रिया कहा और फोन कट कर दिया। रात भर मुझे सुबह का इंतजार रहा। सुबह सात बजे मै अखबार लेने चौराहे पहुँच गया जहाँ अखबार वाले अपने सायकिलों पर अखबार लिये खड़ा होते। मै अखबार लिया और पहले आँठवाँ पेज खोला। देखा मेरा लेख छपा था। मुझे बहुत खुशी हुई। दिन भर अखबार अपने साथ लिये घुमता रहा। जो भी अपना परिचित मिलता उसे अखबार दिखाता।

रोज अपना ही छपा देखता, कई बार पढ़ता और अपने लिखे में खुद ही कमियां निकालता।

हरेक बार पढ़ने के ऐसा बाद लगता यहाँ ये लिखता तो और अच्छा लगता। कुछ दिनों बाद मुझे घर जाना था लेकिन जब से ये लेख छपा था बचे दिन लम्बे लगने लगे थे। लगता था कब जल्दी से वो दिन आये और मैं घर चला जाऊँ। आखिरकार वो दिन आया। घर जाता था तो कुछ न कुछ यहीं छूट जाता था। कई बार बहन ने किताब लाने को कहा था। मेरी आदत से वो वाक़िफ़ थी इसलिए आने से पहले वो फोन कर याद दिलाया करती बावजूद इसके मैं किताबें भूल जाता। ऐसा बहुतों बार हो चुका था इसलिए अखबार को मैंने पहले ही बैग में रख लिया था कि कहीं भूल ना जाऊँ। घर गया तो साथ अखबार को भी ले गया ये सोच कर कि बाबू जी को दिखाऊँगा तो खुश होगें। घर पहुँच कर सबसे पहले मैंने बाबू जी को अखबार दिखाया। बाबू जी ने देख कर कहा "ठीक है लेकिन इससे कहाँ काम चलने वाला है।"


मै बहुत दुखी हुआ क्योंकि जो मै सोचा था ठीक उसका उल्टा हुआ। मै सोचा था कि बाबू जी खुश हो कर और लिखते रहने के लिये कहेंगे पर बाबू जी सामान्य बने रहे। मै वापस शहर आ गया और बेमन से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता रहा और अखबारों के दफ्तरों में घुमता रहा। आखिरकार ये नौकरी मिली। दो दिन बाद ही ज्वाइन करना था। कपड़े, बिस्तर लिया और चल दिया। पता करते-करते सुबह दस बजे तक अखबार के क्षेत्रीय दफ्तर पहुँच गया। वहाँ से बस इतना बताया गया कि कितने गाँवों को मुझे कवर करना है। दफ्तर से ही एक दूसरे अखबार के पत्रकार का मोबाइल नंबर मिला। मैने उसको फोन किया और मिलने को कहा। आधे घंटे बाद वो आ गया। मै बताया कि मै भी पत्रकार हूँ और अभी आज ही आया हूँ। बातचीत से पता चला कि पिछले सात सालों से वो इस क्षेत्र की न्यूज़ रिपोर्टिंग कर रहा है। नाम था शिवेन्द्र मोहन। उसी ने कहा " कहाँ कमरा ढूंढोंगे चलो मेरे ही साथ रहना। अकेले मै भी ऊब जाता हूँ। दो लोग रहेंगे तो अच्छा ही रहेगा। काम भी एक ही करना है। अलग अखबार भी है तो और अच्छा है।"

मै भी कहाँ जाता कहाँ रहता। ये सुन कर मै भी खुश हो गया मानो इंतजार हो इसका। उसके पास स्कूटर थी। हम स्कूटर पर बैठे और उसके कमरे की ओर चल दिये।

कच्ची सड़कें थीं। खेतों के बीच रास्ता बनाया गया था। गनीमत थी कि गर्मी का दिन था। दूर-दूर पर कुछ घर दिखाई देते मिट्टी के। कहीं कहीं झोपड़ियाँ। गाँव भी दूर-दूर थे। रास्ते में एक गाँव के पास बहुत लोग जमा थे।
मैने उससे पूछा " यहाँ क्या हो रहा है?"

शिवेन्द्र ने कहा "जान जाओगे। सालों से चल रहा है। ये इलाके का सबसे बड़ा गाँव हैं कचरा।"

मै सोचा कोई प्रोग्राम होगा। लेकिन दूसरी तरफ ये भी सोच रहा था कि कौन सा प्रोग्राम सालों तक चलता है। शिवेन्द्र के जबाब को सुन कर इसके बारे में मै पूछना मुनासिब नहीं समझा। बीच बीच में वो खुद बस्तियों और गाँवों का नाम बताते चल रहा था। इस तरह हम पहुँच गये। एक छोटा सा कमरा था। सामने  पतली कच्ची सड़क और तीनों तरफ पेड़। कमरे की खिड़कियों से सिर्फ खेत ही खेत दिखाई देता था। आबादी फैली हुई थी। कमरे में एक तरफ खाना बनाने का सामान था दूसरी तरफ एक चारपाई लगी थी। कमेरे में  अंधेरा तो नहीं था पर गर्मी बहुत थी। एक टेबल फैन था पर चल नहीं रहा था।

मैने शिवेन्द्र से पूछा," बिजली नहीं है क्या?"

"
बिजली का कोई भरोसा नहीं यहाँ। एक दिन में सब कुछ जान जाओगे यहाँ क्या है क्या नहीं। सब्र करो थोड़ा।"

शिवेन्द्र ने बैग से बिस्कुट निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया। मै दो बिस्कुट ले कर बाक़ी उसको दे दिया। वो नींबू की चाय बनाया। दोनों   चाय पीए।
"
अच्छा चलो चलते हैं।" उसने कहा
"
कहाँ?"
"
मुझे रिपोर्टिंग करने जाना है।"

उसे रिपोर्टिंग करने जाना था। मुझे भी इलाका देखना था। मुझे कल से अपने काम पर भी लगना था। हम दोनों स्कूटर पर बैठे और चल दिये। फिर वही गाँव और उतने ही जमा लोग। लेकिन इस बार शिवेन्द्र से नहीं पूछा। स्कूटर एक मैदान में जा कर रूकी। वहाँ पहुँच कर मुझे पता चला कि किसी नेता की रैली होने वाली है। पूरे दिन वहीं रहे।

शिवेन्द्र ने कहा, "चलो तुम को कमरे पर छोड़ देता हूँ। मै दफ्तर न्यूज़ दे कर आ रहा हूँ। मुझे वापस आने में दो घण्टे लग जायेंगे।"
शिवेन्द्र मुझे कमरे पर छोड़ने के लिये आ रहा था। रास्ते में वो गाँव फिर आया। दरअसल गाँव रास्ते में ही पड़ता था।
मैने शिवेन्द्र से कहा," मुझे यही छोड़ दो। आते वक्त यहीं से ले लेना। अकेले वहाँ जाकर क्या करूँगा।"

मुझे छोड़ कर शिवेन्द्र दफ्तर चला गया। मै वहाँ जमा लोगों की तरफ बढ़ा। पास पहुंचा और एक नौजवान से पूछा, "क्या हो रहा है?"
बिना बोले वो एक पर्चा मेरी तरफ बढ़ा दिया। मै पर्चा लिया और पढ़ना शुरू किया। कुछ माँग उस पर्चे में लिखी गयी थी। फिर थोड़ा आगे बढ़ा और एक दूसरे नौजवान से पूछा।


वो कहने लगा, " पिछले चार सालों से यहाँ धरना चल रहा है। जी. पी. समूह का थर्मल पॅावर प्लांट बन रहा है। जमीन लेने से पहले जी. पी. ने कहा था कि दस लाख रूपये हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा मिलेगा। प्रदेश सरकार ने ये ही तय कराया था लेकिन बाद में तीन लाख रूपये प्रति हेक्टेयर ही मिला। कुछ लोग ले लिये जिनकी कम जमीन थी। और लोग जमीन देने से मना कर दिये फिर भी जमीन पर कब्जा करके प्लांट का काम शुरू है। ये तीन हजार लोग हैं। रोज दस बजे तक घर का काम निपटा कर यहाँ आ जाते हैं और शाम को पांच बजे जाते हैं। यही चार सालों से चल रहा है। पिछली सरकार में ये हुआ था और अब इस सरकार का भी तीन साल बीत गया। केन्द्र की भी सरकार बदल चुकी है।"

वहीं एक कोने में छोटी चाय की गुमटी थी। महिलायें भी हंसिया, कुदाल लिये बैठी थीं। वहाँ चाय पीते वहाँ चल रहे गीतों को सुनता रहा। बारी बारी से लोग आते और मरते दम तक लड़ने का आह्वान करते। महिलायें भी अपने हाथ उठा कर मरते दम तक लड़ते रहने के लिये अपनी सहमति व्यक्त करतीं। शिवेन्द्र दो घंटे बाद आने वाला था पर एक घण्टे से पहले ही आ गया।

कमरे की ओर जाते वक़्त मैंने शिवेन्द्र से कहा, " यहाँ जो धरना चल रहा है इसकी रिपोर्टिंग तुम ही किये होगे?"
उसने कहा, "हाँ किया तो था पर छपा नहीं था।"
"
क्यों?"
"
खबर हमारे मुताबिक थोड़े छपती है। सम्पादक की मर्जी।"
बात करते कमरे पर पहुँच गये। शिवेन्द्र भी बेमन से जबाब देता रहा। मुझे एहसास हो रहा था कि वो जबाब नहीं देना चाह रहा है सो मै चुप हो गया।

दरवाजा खोलते शिवेन्द्र ने कहा, " पत्रकारिता पढ़ा था कि अच्छा पत्रकार बनूंगा। पत्रकार नहीं दलाल बन कर रह गया हूँ। साला तरस आता है अपने पर। यहाँ से कुछ और जाता है और छप कर आता कुछ और है।"
ऐसा मालूम हो रहा था वो बहुत गुस्से में हो। उसके चेहरे को देख कर साफ समझ आ रहा था कि वो नहीं उसका गुस्सा बोल रहा है।
"
क्यों?" ऐसा कैसे हो सकता है मै सोच कर बोला।

"
सात सालों से इस इलाके में हूँ। जब से ये आंदोलन शुरू हुआ तब से देख रहा हूँ। कोई भी अखबार हो इसे छापता नहीं। और खबर छपती भी है तो हेडिंग होती है - "गाँव वालों ने पुलिस को मारा" तो "प्लांट के खिलाफ गाँव वालों का हिंसक प्रदर्शन"। साला लाठियाँ पुलिस वाले तोड़ते हैं और बदनाम गाँव वाले होते हैं। जी. पी. समूह अखबारों को विज्ञापन, पुलिस वालों को हफ्ता दे देता है। बस ये लोग उसका काम करते हैं। साला बीच में फंसे हैं हम जैसे लोग जो नेताओं के पीछे पीछे घूमते रहते हैं मानो पत्रकार न होकर उनके चमचे हों।"

"
सम्पादक से शिकायत नहीं की?"
"
शिकायत कर के थक चुका हूँ। नौकरी जाते जाते बची है। ये भी चली गयी तो क्या करेंगे। उम्र भी नहीं रही कि क्लर्की भी कर पायें।"
ये सब सुन कर मेरा दिमाग ही खराब होने लगा था। मै सोच कर आया था कि कुछ अच्छा किया तो बाद में बाबू जी भी शायद खुश हो जायें। इसी बातचीत में अंधेरा हो गया।

शिवेन्द्र उठा और खाना बनाना शुरू किया तो मै भी उसकी सहायता करने साथ बैठ गया। खाना बनाते बारह बज गया। थाली एक ही थी। मुझे थाली में खाना दे कर शिवेन्द्र कड़ाही में ही खाने लगा। फिर मेरे बहुत कहने पर वो मेरी थाली में खाया। खाना खा कर हम दोनों सोये।

चारपाई तो एक ही थी इसलिए दोनों लोग चारपाई को हटा कर बिस्तर जमीन पर ही डाल दिये थे। अगले दिन से मुझे रिपोर्टिंग पर लगना था। सुबह-सुबह दफ्तर से फोन आया विधायक क्षेत्र घूमने वाला है। बस उसी के पीछे रहना है।
मै जल्दी-जल्दी तैयार होने लगा।
शिवेन्द्र से मैने पूछा, "तुम्हें किधर जाना है?"
"
जहाँ तुम जा रहे हो।"
"
लेकिन.....?"

"
लेकिन क्या मुझे पता है मुझे कहाँ की खबर रिपोर्ट करनी है और अखबार को क्या चाहिए।"

हम दोनों रिपोर्ट के लिए निकले। सुबह से शाम तक पीछे-पीछे घूमते रहे। बीच में बस हमने दो चाय पी। अगले दिन सुबह खबर को शहर की न्यूज़ में प्रमुखता से छापा गया। यही एक महीने तक चलता रहा। नेताओं के भ्रमण की खबरें हम रिपोर्ट करते रहे। एक महीने की तनख्वाह मिली साढ़े पाँच हजार। शिवेन्द्र को नौ हजार। तीन हजार रूपये रख कर बाक़ी पैसे वो अपने घर भेज दिया। पता चला उसकी चार साल की बेटी भी है। रहने वाला था मध्य प्रदेश का। माँ बाप का अकेला बेटा था। ये शिवेन्द्र ने मुझे बैंक में बताया। आते वक्त पता चला कि गाँव वाले प्लांट में चल रहे काम को रोकने वाले हैं। ये खबर रास्ते में एक नौजवान राजीव से मिली। राजीव विश्वविद्यालय से ही ग्रैजुएशन किया था और इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था। पुलिस उस पर कुल तेरह केस लगायी थी।

खुद ही उसने बताया, " मैं जिला बदर कर दिया गया हूँ लेकिन छिप कर कभी इस गाँव कभी उस गाँव में रहता हूँ। पुलिस को जब पता चलता है तो गाँव वाले आगे आ जाते हैं। आज चार गाँव के लोग इकट्ठा होने वाले हैं और हम इस प्लांट को बनने नहीं देंगे। जी. पी. समूह के ऐसे ही तीन प्लांट और बन रहे हैं वहाँ भी काम शुरू है। समूह ने उचित मुआवजा नहीं दिया न ही इसका एनवायरमेंटल क्लीयरेंस है। वहाँ भी आंदोलन चल रहा है। वहाँ के नेताओं से बात हुई है। हम संगठित होकर एक्शन लेने जा रहे हैं। सरकारें हमारे लिये एक ही जैसी हैं। इस सरकार ने तो जमीन हड़पने का कानून ही बना दिया है। अब जमीन हड़पना और आसान हो गया है पूंजीपतियों के लिये। आखिरी रास्ता यही बचा है हमारे पास कि ज्यादा से ज्यादा गाँव वालों को इकट्ठा करें और प्लांट का काम ही रोक दिया जाए।"

जब हमने बताया कि हम पत्रकार हैं तो वो हमे ऐसे देखा जैसे हम अपराधी हों। वो अपने साथ के लोगों को चलने का इशारा किया और चला गया।

सारे कागजात राजीव इकट्ठा कर लिया था और हाईकोर्ट में भी गया था लेकिन पुलिस का पलड़ा भारी हो गया तो जिला बदर कर दिया गया था। लोग उसे अपना नेता मानते थे। उसको बचाने के लिए अपनी जान तक देने को तैयार थे। गाँव के वृद्ध निवासी ने बताया "अगर राजू भी अधिकारी बनल चाहत त बन जाइत लेकिन पढ़ाई छोड़ कर आ गइल हमन लोगन के खातिर। त उहे न असली नेता बा हमन क। हमन के का पता कोरट कचहरी क हिसाब। गाँवे क परधान त मिल गइल बा जी० पी० से। अब राजू जबन कहिहन तवन हमन कइल जाई। मरे के परी मरल जाई। मारे के परी त मरबो कइल जाई।"

मैने शिवेन्द्र से कहा, " इसको आज मैं कवर करूँगा।"
"
ठीक है करो पर कोई फायदा नहीं।"

बहरहाल हम कमरे पर आ गये। शिवेन्द्र शाम को चार बजे मुझे गाँव में छोड़ दिया जहाँ लोग जमा हो रहे थे। पुलिस को भी ये बात पता चल गयी थी सो पुलिस भी इकट्ठा होने लगी थी। आधे घण्टे के भीतर चार गाँव के लोग इकट्ठा हो गये। पुलिस भी आ गयी थी। लोग प्लांट की तरफ बढ़ रहे थे। पुलिस भी उनको रोकने की कोशिश कर रही थी लेकिन लोग इतने ज्यादा थे कि पुलिस नाकामयाब होती रही। बीच में राजीव भी था। पुलिस वाले भी उसे देख रहे थे। गाँव वाले प्लांट की दीवारों को गिराने लगे जो अभी नयी-नयी बनी थी। पुलिस के हवाई फायरिंग का गाँव वालों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंततः पुलिस ने गोली चलाई। भगदड़ मच गयी लोग भागने लगे। तभी एक पुलिस वाले ने निशाना बना कर एक गोली चलाई। सब लोग भाग गये। अंत में एक लाश जमीन पर गिरी पड़ी रही। वो राजीव था।

राजीव को पुलिस ने टारगेट करके मार दिया। पुलिस को पता था कि राजीव आंदोलन की जान है। उसको मार देने से आंदोलन ही खत्म हो जायेगा।
मै रिपोर्ट बनाया और दफ्तर में जा कर दिया। लेकिन अगले दिन जो खबर छपी - "मुठभेड़ में मारा गया गैंगेस्टर राजीव"। फोटो भी मेरी वाली नहीं थी। कब राजीव के हाथों में बन्दूक आ गयी थी पता नहीं चला। वारदात के समय मैं था लेकिन उसके हाथ में बन्दूक नहीं थी। मैने तुरंत दफ्तर फोन किया और सच्चाई बतायी।
उधर से बस इतना जबाव मिला "तुम अपना काम करते हो।"

मै समझ गया था। अब मेरे सामने दो ही विकल्प थे या तो ये सब देखता रहूँ या फिर यहाँ से बिस्तर बाँध कर चलता बनूँ। मैने आज शिवेन्द्र से कहा "यार हमसे नहीं होगी ऐसी पत्रकारिता।"
"
अभी असल वाली तो देखे नहीं।"
"
देख लिया इतने दिन में ही।"
"
अभी कहाँ देखे मै बताता हूँ।"
"
क्या?" मै शिवेन्द्र से कुछ जानना चाहा।

"
हम तीन लोगों ने एक साथ पत्रकारिता के लिए दाखिला लिया था। मेरे साथ मेरे दो दोस्त नारायण और वसीम थे। पढ़ाई के बाद तीनों ने अलग-अलग अखबार ज्वाइन किया था कि तीन अखबारों में सच्ची रिपोर्टिंग करेंगे। जज्बा था। दूर से लगता था कि बड़ा साफ और अच्छा काम है। रूतबा भी है। लेकिन क्या मिला। वसीम छत्तीसगढ़ में मारा गया वो भी पुलिस के हाथों। मरते वक्त उसके हाथों में कलम की जगह हथियार पकड़ा दिया गया था। खबरें छपीं कि वो नक्सली था। क्यों कि उसकी कलम सरकार को बेनकाब कर रही थी।

नारायण को व्यवस्था ने बदल दिया और आज अखबार का उप सम्पादक है। कई शहरों में मकान बना लिया है। सफेदफोशों से घिरा रहता है। ले दे कर अकेला बचा हूँ मैं। अब तुम बताओ मुझे क्या करना चाहिए। अखबार तो खुद का है नहीं और न ही उतना पैसा है कि खुद का अखबार निकाला जा सके और मै नरायण बन नहीं सकता।"
"
मै तो इसमें अभी नया हूँ। मै क्या बताऊँ?"

"
हकीकत तो ये है कि तुम यहाँ रह नहीं पाओगे। मैने तो आदत डाल ली है। जिम्मेदारियों ने मुझे रोक रखा है। तुम अभी नये हो अच्छा होगा कि तुम चले जाओ।"

फिर भी मैं रूका रहा। तीन महीने बाद मै वापस होने का फैसला किया। बिना दफ्तर में बताये मै चला आया। आते वक्त शिवेन्द्र ने कहा था "चलो अच्छे से पढ़ाई करना। तुम्हारी जरूरत पड़ेगी।"
"
बस याद करना हाजिर रहूँगा।"

दोनों लोग भावुक हो गये थे। उसको अकेला छोड़ कर मुझे भी नहीं आने का मन नहीं कर रहा था। घुल मिल गये थे मानो वर्षों की यारी हो। चार महीने बेमन पढ़ाई करता रहा और किसी तरह डी. एम. आफिस में क्लर्क बना। किसी तरह बाबू जी को समझाया कि साथ साथ पढ़ाई भी कर रहा हूँ। यहीं दो साल रहा। इन दो सालों में शिवेन्द्र से मेरी सिर्फ सात आठ बार बात हुई होगी वो भी शुरू के कुछ महीनों में। यहीं दफ्तर में बैठा था तभी शिवेन्द्र ने फोन कर कहा "अब तुम्हारी जरूरत आ पड़ी है। गाँव वालों की ही मदद से एक खुद की मासिक पत्रिका मैने पिछले महीने शुरू की है। एक अंक निकला है। पुलिस ने गाँव वालों को सरकार के खिलाफ भड़काने का केस मेरे ऊपर लगाया है। जल्दी आ जाओ। राजीव का भाई और उसके और साथियों ने यहाँ मोर्चा संभाल लिया है।"

डायरी के आगे के पन्ने सादे हैं। आगे क्या हुआ होगा कल्पना करना मुश्किल है। डायरी में ना तो फोन नंबर है ना ही किसी का नाम। ये फटी डायरी मुझे इस कमरे में मिली है जहाँ मै आज ही आया हूँ। पत्रकारिता में दाखिला ले लिया हूँ। डायरी को पढ़ने के बाद लग रहा है कहीं गलती तो नहीं कर रहा हूँ। सोच रहा हूँ ये वास्तव में किसी की खूद के बारे में लिखी हुई है या कहानी है जानने के लिये कमरे में पड़े फटी डायरियों और किताबों को देखना शुरू किया तो कुछ कागजात मिले। कागजातों को देखा तो पता चला भूमि अधिग्रहण के संबंधित कागजात हैं तो कुछ दो साल पुरानी पत्रिकाएं।




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