प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा का आलेख ‘राहुल : जो भागा नहीं दुनिया को बदलने में लगा रहा’।

राहुल सांकृत्यायन


एक व्यक्ति कितने आयामों वाला हो सकता है इसे समझने के लिए हमें राहुल सांकृत्यायन के पास जाना पड़ेगा। एक सचमुच का क्रान्तिकारी व्यक्तित्व जिसने अपने जीवन में ही असंभव को संभव कर दिखाया। एक ऐसा व्यक्ति जो लेखन के लिए आजीवन प्रतिबद्ध रहा। राहुल के इस विविध आयामी या कह लें हरफनमौला व्यक्तित्व पर एक नजर डाली है प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा का आलेख ‘राहुल : जो भागा नहीं दुनिया को बदलने में लगा रहा’। 
     

राहुल : जो भागा नहीं दुनिया को बदलने में लगा रहा

लाल बहादुर वर्मा 

मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा जिसे मैं आज जानता हूँ - एक ऐसा मनुष्य जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीवन मात्र के प्रति दुर्भावना से युक्त है जिसका दृष्टिकोण विश्वव्यापी है, जो पूर्णरूप से सुस्थिर और शांत है, जिसके दृष्टिकोण आपसे आप दौड़ पड़ते हैं, जो अगर कहे कि ‘मेरे पीछे आओ’ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा जैसा वह गौतम या ईसा मसीह के पीछे चलता था। यह लिखा है राहुल के अभिन्न मित्र पटना के विख्यात वकील और इतिहासकार के. पी. जायसवाल ने। दोस्तों को दोस्त में बड़प्पन दिख सकता है पर पैगम्बर नहीं। पर राहुल का बड़प्पन भी ‘बड़ा’ था। कभी किसी के प्रति दुर्भावना न रखना, किसी से भी आहत न होना, न ही आहत करना, यह तो संता है। हिन्दी के सबसे सफल समीक्षक राम विलास शर्मा उनके पीछे ही पड़ गए थे पर राहुल ने उनके विरुद्ध एक भी शब्द न कहा न लिखा।

हिन्दी दुनिया की भाषाओं को कौन कहे स्वयं भारत की भाषाओं के बीच कम विकसित मानी जाती है पर भारतीय ही नहीं दुनिया की शायद ही किसी भाषा में कोई राहुल सांकृत्यायन जैसा लेखक होगा। किसी एक लेखक ने किसी एक भाषा को विविध रूप से इतना नहीं समृद्ध किया होगा जितना अकेले राहुल ने हिन्दी को। ऐसे बहुरूपी विभूति का साक्षात्कार आत्म-साक्षात्कार साबित हो सकता है, क्योंकि उसे जानते हुए हम अपने को जान सकते हैं, संवार सकते हैं जैसे उसने अपने को अपने बूते संवारा था।

राहुल एक विकासमान व्यक्तित्व, एक व्यापक संस्था और एक जन समर्थक आंदोलन जैसा है। वह भारत के नव जागरण का प्रतीक लगता है तमाम सीमाओं और संभावनाओं के साथ।

राहुल भारत के नव जागरण के प्रतीक लगते हैं।

अंग्रेजी के प्रख्यात लेखक डॉ. जानसन ने एक बार दूसरे प्रसिद्ध लेखक गोल्ड स्मिथ के बारे में कहा था : ऐसा कुछ भी नहीं जिस पर गोल्ड स्मिथ ने न लिखा हो और वह स्वर्णिम ने हो। इस कथन में अतिरेक है पर यह बात राहुल के बारे में कही जाय तो अतिशयोक्ति की मात्रा कम हो जाएगी। उनके लिखे 10 उपन्यास, 4 कहानी संग्रह, 8 नाटक, 17 जीवनियां, 5  भागों में मेरी जीवन यात्रा’, 24 यात्रा वृतान्त, 9 निबंध संग्रह, 8 राजनीति संबंधी पुस्तकें, 1 विज्ञान, 1 समाज शास्त्र, 3 दर्शन, 1 लोक साहित्य के इतिहास पर ग्रन्थ प्रकाशित है। इसके अलावा तिब्बती पर 5 संस्कृत पर 5 तथा शब्दकोश पर 2 पुस्तकें लिखीं हैं। उन्होंने 20 ग्रन्थ सम्पादित किए तथा 11 ग्रन्थों के अनुवाद किए। कितनी ही रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं । और न जाने कितनी रचनाएं अभी तक अप्रकाशित हैं। केवल संख्या की दृष्टि से इतने ग्रन्थ लिखने वाला व्यक्ति असाधारण होगा और फिर ये ग्रन्थ अगर गुणवत्ता में भी महान हों-पथ प्रदर्शक हों, तो फिर क्या कहने।

राहुल शैव थे, शाक्त थे, वैष्णव थे, कर्मकांडी थे। आर्य समाजी थे, बौद्ध थे और अन्ततः कम्युनिस्ट थे।

राहुल यायावर थे, साहित्यकार थे, इतिहासकार थे, असाधारण अध्येता थे, पुरातत्वेता थे, भाषाविद् थे, किसान नेता थे और भी बहुत कुछ, सब एक साथ, परन्तु सब से बढ़ कर एक बेहतरीन इन्सान थे।

सबसे बड़ी बात यह है कि राहुल एक सामाजिक परिवर्तन के सिपाही और सिपहसालार थे- आजीवन युद्धरत, व्यक्तिगत जीवन तथा सामाजिक जीवन में विचारों तथा कार्य व्यापार में।

आत्मशक्ति व्यक्ति के विकास की कितनी अनन्त सम्भावनाएं खोल सकती है राहुल इसके अनन्य प्रमाण थे। वस्तुगत स्थितियां शायद ही कभी उनके अनुकूल रही हों पर आत्मगत शक्ति की मानो उनके हाथ में लगाम हो- जिधर चाहा मोड़ दिया। व्यक्ति के विकास में जिन संस्थाओं-संगठनों की भूमिका होती है उनमें कम्यूनिस्ट पार्टी जैसा समग्र और सर्वव्यापी, साथ ही अत्यन्त संवेदनशील और सहानुभूति की सम्भावनाओं से सम्पन्न दृष्टिकोण और किसी का नहीं होना चाहिए। राहुल की घर-परिवार-मठ-मंदिर ने तो कोई खास मदद नहीं की, कम्यूनिस्ट पार्टी ने भी नहीं की-उल्टे समस्याएं ही पैदा कीं। इस सबके बावजूद उनकी गाड़ी आगे ही बढ़ती गयी। जब तक शारीरिक और मानसिक शक्ति ने साथ दिया उन्होंने सामाजिक सम्पृक्ति नहीं छोड़ी- विकास मार्ग पर तिल-तिल या ताड़-ताड़ आगे ही बढ़ते रहे। 



यायावर : प्रकृति प्रेम और अध्ययन-व्यसन ने उन्हें घर का नहीं रहने दिया। तीर्थों-मठों-मंदिरों से होते हुए उन्होंने देश की कई-कई बार मानों परिक्रमा की। फिर अवसर आते ही उन्होंने एशिया और यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा की, जहाँ भी गए वहाँ के बारे में विस्तार से लिखा, और उन्हें भी यात्रा करा दी जो वहाँ कभी नहीं जा सकते थे। उनके लिए कोई जगह नई नहीं थी।

रूस के श्चेर्बात्सकी और इटली के तूची नामक विद्वानों की दृष्टि तिब्बत पर लगी थी। पर वे असफल हो रहे थे। राहुल ने प्रच्छन्न तरीकों का भी इस्तेमाल कर तिब्बत से न केवल बहुमूल्य ग्रन्थ-राशि उबारा, उस क्षेत्र को प्रकाश में ला कर उसे भी उबारा। 1930 में तिब्बत पहुँचे जो एक अज्ञात (‘टेरा इनकागनिटो’) क्षेत्र कहलाता था और अत्यन्त दुर्गम था। 1935 में वह यूरोप गए। फिर उन्होंने रूस और चीन की यात्राएं की।

जहाँ भी गए ‘टूरिस्ट’ की तरह महज घूमे नहीं उन क्षेत्रों को, वहाँ के इतिहास-भूगोल समाज को समझा और ग्रन्थ लिखते गए ताकि दूसरे लोग भी घूमने-समझने का आनन्द ले सकें। ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘लंका, ‘तिब्बत में सवा वर्ष’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘जापान’, ‘ईरान’, ‘रूस में पच्चीस साल’, ‘एशिया के दुर्गम खंडो में’, ‘किन्नर देश’, ‘कुमायूँ’, ‘गढ़वाल’, ‘नेपाल’, ‘हिमाचल प्रदेश’, ‘जॉनसार-देहरादून’ जैसे ग्रन्थ पूरे नहीं पड़े और 5 खण्डों में ‘मेरी जीवन यात्रा’ लिख यात्रा को पूरा अर्थ प्रदान किया। और यह पर्याप्त न मान एक ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ लिख सैद्धान्तीकरण भी कर दियाः ‘घुम्मक्कड़ी के लिए चिन्ताहीन होना आवश्यक है और चिन्ताहीन होने के लिए घुम्मकड़ी भी आवश्यक है।’ सार संकलन किया :  दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी, घुमक्कड़ से बढ़ कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता।’

आधुनिक भारत का नवजागरण पूरी तरह फूला-फला राहुल में। पिछड़े भारत के एक बेहद पिछड़े इलाके आज़मगढ़ के गाँव में एक किसान के घर एक होनहार बालक जन्म लेता है, उसकी जिज्ञासु और घुमक्कड़ी प्रवृत्ति उसे बेचैन रखती है। घर भी उसे बंधन लगता है। वहाँ से वह भागता है और फिर तो जीवन भर भागता फिरता है कि कैसे बदले वह यह बांधती दुनिया। पर जीवन के अंतिम दिनों में वह बंधन स्वीकार लेता है। घर परिवार गृहस्थी और शुरू हो जाता है अवसान और एक सदा-मुखर व्यक्तित्व बेजुबान हो जाता है। पल-पल-चपल राहुल, अस्थिर पांवों वाला राहुल असहाय विस्तर पर? एक असहाय यायावर! 

राहुल जीवन-जगत के निकट देखना-समझना शुरू करता है, छान मारता है दिग्-दिगन्त, विचार-दर-विचार। सनातन धर्म से आर्य समाज, बौद्ध धर्म होता हुआ मार्क्सवाद तक पहुँचता है और वहाँ टिकता है- पर वहाँ भी किसी रूढ़ि में नहीं फँसता। इस दौरान वह अपना विस्तार करता जाता है। एक गंवार विद्यार्थी जो डिग्री को कौन कहे एक सर्टिफिकेट तक नहीं प्राप्त करता वह विश्वविद्यालयों में ज्ञानी प्रोफेसर नियुक्त होता है। दुनिया में पंडितों की भरमार है पर ‘महापंडित’ अकेला है महापंडित राहुल सांकृत्यायन। कनैला के केदार का महारूपांतरण भारतीय समाज की संभवानाओं का सूचक और प्रतीक है कि अगर शेरपा तेनसिंह एवरेस्ट पर चढ़ सकता है तो गाँव का किसान-बच्चा भी ज्ञान के उच्चतम शिखरों पर सवार हो सकता है। यही नहीं, ऐसा ज्ञानी पंडित जनसंघर्षों में जमीदार की लाठी भी खा सकता है और जेल भी जा सकता है और उस लठैत को कुसूरवार भी नहीं ठहराता जिसने उस का सिर फोड़ दिया था। राहुल के अनुसार लठैत भी तो जमींदार के हाथ में लाठी की ही तरह तो था- जब लाठी का कुसूर नहीं तो लठैत का भी नहीं।



राहुल पेशेवर इतिहासकार नहीं था। पर उसने जब ‘मध्य-एशिया का इतिहास’ हिन्दी में लिखा तो बहुतों ने उसे पढ़ने के लिए हिन्दी सीखा। उसने क्या नहीं लिखा- कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, जीवनी, यात्रा संस्मरण, इतिहास, भूगोल-दर्शन, विज्ञान। क्या कुछ नहीं लिखा राहुल ने और वह भी हिन्दी में। हिन्दी वाडग्मय प्रेमचंद, निराला से ही नहीं बनता, उस में राहुल की भूमिका अनन्य है, जैसे अंग्रेजी साहित्य केवल शेक्सपीयर के नाटकों से नहीं बनता, उसे न्यूटन का विज्ञान पर और एडम स्मिथ का अर्थशास्त्र पर लेखन भी गढ़ता है।

नेपोलियन ने इतिहास को विवेक कहा था। उसका मतलब रहा होगा इतिहास से सीख लेकर हम अपने आचार-व्यवहार को बेहतर बना सकते हैं। पर वास्तव में ऐसा हो पाता है क्या? कितना प्रचलित मुहावरा है- ‘दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है’, यानी अपने अनुभव के आधार पर सावधानी बरती जाती है। पर यह तो सही सीख नहीं कि छाछ को भी फूँक-फूँक कर दिया जाय। इस तरह सवाल इतिहास से सीखने का ही नहीं, सही सीख लेने का है। 

व्यक्ति की तरह समाज में भी अपने इतिहास से सहज भाव से सही-गलत सीख लेने की प्रवृत्ति होती है। पर संकट और संक्रमण के समय व्यक्ति और समाज खास तौर से अपने अतीत के किसी खास व्यक्ति, घटना या परिघटना को याद करते हैं। आज का समय सारी दुनिया में संक्रमण का है। सारे पुराने मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ प्रश्नों के घेरे में हैं और नई राहें प्रशस्त नहीं हो पा रही हैं। भारत में नवजागरण की बात की जा रही है। इस नवजागरण के लिए प्रेरणा का स्रोत कहाँ है? गौतम बुद्ध हमेशा प्रेरणास्पद रहेंगे। भक्ति-काल का भी स्पंदन हम महसूस कर सकते हैं। पर यह सब सुदूर अतीत है। दुनिया तब से काफी बदल चुकी है। आधुनिक काल पर दृष्टि डालें। राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले, दयानंद सरस्वती, सैयद अहमद खान, महात्मा गांधी आदि नाम दिमाग में आते हैं। पर सांस्कृतिक प्रेरणा के संदर्भ में सबसे उपयुक्त नाम सांकृत्यायन का लगता है। वह एक पिछड़े इलाके के सामान्य परिवार के किसान-पुत्र थे यानी एक आम भारतीय और अपने अध्ययन-अध्यवसाय से महापंडित कहलाने वाले एकमात्र भारतीय बन गए। क्षेत्र विचार का हो या व्यवहार का, सिद्धांत का या कर्म का, राजनीति का या धर्म का, साहित्य का या दर्शन का, जीवन के प्रायः हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी  और नई राह बनाई। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने आत्मविश्वास और आत्म सम्मान को पोसते हुए आम आदमी की अनंत संभावनाओं को उजागर किया। इसीलिए वह आज के संक्रमण काल के लिए सबसे उपयुक्त प्रेरणास्रोत हो सकते हैं।

9 अप्रैल 1892 को भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक आज़मगढ़ के गाँव में जन्मा राहुल मानों नाव पर गया था। बचपन में बहुत कुछ ऐसा नहीं था जो असाधारण हो पर पक रही थी आंखें और ज्ञानेन्द्रियां। स्कूल वाली पढ़ाई तो ठीक से नहीं हो पा रही थी पर जीवन-जगत से बुहत कुछ ग्रहण हो रहा था। मन चंचल था। बार-बार भागता था।

इस समय एक चीज उसे बांध सकती थी – उसकी शादी कर दी गई। पर उसने उसे अपने प्रति अन्याय समझा और भाग खड़ा हुआ। संयोग से एक सम्पन्न मठ में उसे शामिल कर लिया गया और शीघ्र ही वह महंत बन गया। सारी सुख-सुविधा उसके चरणों में थी और वह जहाँ चाहे घूम सकता था, जो चाहे कर सकता था, अपनी रुचि का स्वाध्याय भी जारी रख सकता था। पर पद-प्रतिष्ठा, सम्पत्ति ये सब भी तो बंधन हैं और वह इस सुखदायी घेरेबंदी से भी भाग खड़ा हुआ। 
11 वर्ष की उम्र में पढ़ा थाः 

सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहाँ
ज़िन्दगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ।

यह केदार के जीवन का सबसे उत्प्रेरक पक्ष बना रहा। इसी ने उसे ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ लिखने तक पहुंचा दिया जिसमें यायावरी एक जीवन-दर्शन भी है और यात्रा के ‘क्या-क्यों कैसे’ प्रश्नों का उत्तर भी है।

उसने पहली बड़ी यात्रा कलकत्ते की ओर की। उस जमाने में पुरबिया लोग कलकत्ता ही जाते थे। गीत गए जाते थे कि हमारी सबसे बड़ी दुश्मन ‘रेलिया’ है जो हमारे ‘पिया’ को परदेस ले जाती है। वहाँ कामगारों के बीच जीवन के बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव हुए। वहाँ एक बासे में खाने के बाद एक नौकरानी पान का बीड़ा दे जाती थी। केदार पान नहीं खाना चाहता था फिर भी डर के मारे बीड़ा ले लेता था, क्योंकि उसने सुना था कि बंगालनें जिसे चाहती है उसे भेड़ा बना कर अपने पास पाल लेती हैं। 

शीघ्र ही वह जीवन के उस दौर में जा लगा जिसमें उसका कुछ भी मानो व्यक्तिगत था ही नहीं - न घर, न रिश्ते, न चाहत। बस मित्र थे- जो बनते गए, और लक्ष्य रूपांतरित होते गए। सनातनी से आर्य समाजी, फिर बौद्ध और अन्ततः कम्युनिस्ट। एक सुन्दर और जवान बौद्ध भिक्षु बहुतों को आकर्षित करता था-युवतियों को भी। एक बार तिब्बत में और एक बार श्री लंका में स्त्री के प्रति आकर्षण ने उसे उद्विग्न किया था। पर वह विचलित नहीं हुआ और अंततः रूस में ही उसने हथियार डाले।

रूस में लेनिनग्राद में जब वह प्रोफेसर नियुक्त हुआ तो उसकी मुलाकात लोला से हुई। इस आकर्षण ने उसे बांध ही डाला। उसने लोला से विवाह कर लिया। शादी के बाद दोनों आचार्य श्चेर्वत्स्की के जन्मदिन पर उन्हें बधाई देने गए। भोजन पर उन्होंने जैसा पश्चिम का चलन है ‘वाइन’ पीने को दी। राहुल के नकारने पर कहा। ‘इसमें नशा नहीं है।’ ‘तो फिर यह गुनाह बेलज्ज़त है।’ राहुल का उत्तर था। ऐसा नहीं कि राहुल ने शराब नहीं पी। आवश्यकता पड़ने पर वह कुछ भी खा-पी लेते थे। पर खान-पान में वह सामान्य भारतीय थे। दो महीनों में राहुल लोला में रम गए थे पर उस लगाव में बहुत कुछ बौद्धिक और आत्मिक था। पर यायावर राहुल को रूस छोड़ना पड़ा। छोड़ते वक्त लोला को देख कर उनके मन में आयाः ‘बिछुरत एक प्राण हरि लेही...’ । 

जब ईगोर के जन्म की सूचना मिली तो वह प्रफुल्लित हो गए। उन्होंने लिखा; ‘पुत्र जन्म की प्रसन्नता होनी ही चाहिए, क्योंकि पुत्र ही आदमी का पुनर्जन्म और परलोक है।’

दोनों के विचार, उम्र, अभिरुचि, वर्ग, लक्ष्य सब में अंतर था। एक बाद नागार्जुन ने मुँहफट सा पूछ लिया था ‘क्यों फंसे बाबा?’ किसी के पास उत्तर नहीं था।

कुछ ही दिनों के बाद उसे सोवियत यूनियन छोड़ कर जाना पड़ा। लोला गर्भवती हो चुकी थी। बाद में ईगोर राहुलोविच नामक बेटा हुआ। दोनों के प्रति असीम प्यार उसके जीवन का सबसे बड़ा रागात्मक आलंब बना रहा।

राहुल ने जीवन को जो दिशा दी थी उसमें न तो वह सोवियत यूनियन में स्थायी रूप से रह सकते थे न लोला और इगोर भारत में। उनको भी अपने देश से और अपनी जीवन-पद्धति से उतना ही प्रेम था। कुछ दिन वे साथ रह पाए थे वह उनके जीवन के परम क्षण थे-लगता है तीनों के, क्योंकि वे तीनों एक-दूसरे बराबर याद करते थे और एक-दूसरे के लिए तरसते थे।

बाद में राहुल अंदर से थकने लगे थे। अध्यवसाय के अतिरेक के कारण बीमारियों ने भी घेरना शुरू कर दिया था। इसलिए पहले देहरादून में फिर दार्जिलिंग में उन्होंने वह जीवन को एक स्थिरता और स्थायित्व देने की कोशिश करते हैं। कमला उनके साथ काम करने लगी थी। में उन्होंने कमला से शादी कर ली। दो बच्चे भी हुए जया और जेता। पर लोला और ईगोर वाली अनुकूलता नहीं मिल पाई। इस विवाह में समरसता की कमी थी?

जीवन भर बंधनों से भागते फिर राहुल अब संपत्ति और संबंधों के बंधन में बंध चुके थे। उनका मन तो ऐसे जीवन के अनुकूल नहीं ही था, शरीर को भी मानो श्रम तथा कठिन जीवन की आदत पड़ चुकी थी। उनका तपा हुआ शरीर जवाब देने लगा। सबसे पहले शरीर के उस अंग ने ही साथ छोड़ा जिसका उन्होंने सायास सबसे अधिक इस्तेमाल किया था यानी मस्तिष्क और उनका इलाज कलकत्ता और अंत में सोवियत यूनियन में भी हुआ पर उन्हें बचाया नहीं जा सका। अब तो बस उनकी विरासत को बचाया जा सकता है, क्योंकि ऐसी विरासत ही हमें सतत उत्प्रेरणा दे सकती है।




राहुल और धर्म  

पारंपरिक परिवेश में जन्मे राहुल की जीवन यात्रा में धर्म पर आस्था की शुरू में निर्णायक भूमिका हो यह स्वाभाविक था। बचपन में केदार मंत्र-तंत्र के भी चक्कर में था। नवरात्र में सिद्धि और दुर्गा दर्शन के लिए पूरा अनुष्ठान किया था। सारे विधि विधान से व्रत करने के बावजूद जब दर्शन नहीं हुआ तो जीवन निरर्थक लगा और धतूरा खा कर आत्महत्या करने का प्रयास किया था। पर धर्म पर सच्ची आस्था के ही कारण वह उन्हें सनातनी, शैव, वैष्णव दौरों से गुजरते हुए वह आर्य समाजी बने। वहाँ भी रोशनी नहीं मिली तो बौद्ध हो गए। भारत के विभिन्न धार्मिक मार्गों में बौद्ध धर्म ही सबसे अधिक आधुनिक मन को स्वीकार्य था। पर था तो वह भी धर्म ही। इसलिए उसे भी छोड़ना पड़ा- हालांकि गौतम बुद्ध की शिक्षाओं की उन पर छाप अमिट थी अन्त में उन्होंने धर्म की सारी सीमाओं का परित्याग कर दिया। उनके अनुसारः

‘विज्ञान कभी धर्मों की दोहाई नहीं देने जाता, किन्तु धर्म विज्ञान की दोहाई देता फिरता है। क्या यह विज्ञान की प्रबलता को सिद्ध नहीं करता।’
‘हमारे देश में ऐतिहासिक दृष्टिकोण बनने में बहुत सी बाधाएं हैं। धर्म के प्रति अत्यन्त आग्रह सबसे बड़ी बाधा है।’
‘धर्म की गुलामी से बदतर गुलामी और क्या हो सकती है।’

इस प्रकार राहुल ने धर्म के पाखंड को नकारा, उसे दर्शन ओर संस्कृत से अलग कर उसकी भूमिका का सामान्य जन तक में प्रचार किया। पर इसके बावजूद जब धर्म का विश्लेषण करना होता था तो वह धर्मों का उपयुक्त परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करते थे।

असाधारण अध्येता  
अध्ययन का मार्ग प्रशस्त करती है भाषा और उसे विस्तार देते हैं विविध विषय। आर्य समाजी होने के बाद उन्होंने अरबी-फारसी का अध्ययन किया। असहयोग आन्दोलन में मिली सजा के दौरान संस्कृत भाषा और दर्शन को मथा। 1925-27 हजारीबाग जेल के दिनों में बौद्ध साहित्य को पचाया। जब बौद्ध धर्म स्वीकार किया तो उसके सांगोपांग अध्ययन के लिए पालि आगम तथा उसकी ‘अट्ठ कथा’ व्याख्यानों का ऐसा आत्मसात किया कि ‘त्रिपिटकाचार्य’ बन गए। 1930 में तिब्बत से 22 खच्चरों पर लाद कर लाये गये दुर्लभ साहित्य का स्वयं सम्पादन भी शुरू किया और टीकाएं लिखीं। जो काम एक शोध संस्थान का है और कई पीढ़ियों तक चलने पर ही पूरा हो सकता है, उसे बिना इन्तजार किए स्वयं किया। जब पुरातत्व में बैठे तो निबंधावली लिख डाली और गाँव-गाँव डीहों तक में बिखरे स्रोतों को जानने समझने के लिए ‘विशेष स्रोत तथा नेत्र’ विकसित करने की बात की। अध्ययन का विस्तार उन्हें समाजशास्त्र और नृशास्त्र (एन्थ्रोपालाजी) तक ले गया और ‘थारु’ जाति का उन्होंने असाधारण अध्ययन प्रस्तुत किया। भारत के विभिन्न दार्शनिक मतों का गहन अध्ययन करने के साथ पाश्चात्य दर्शन का भी मनन किया और ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ जैसी हिन्दी में अनन्य पुस्तक की रचना की। ऐसे अप्रतिम अध्येता को भारत के किसी विश्वविद्यालय ने नहीं स्वीकारा - स्वीकारा श्रीलंका और सोवियत रूस के विश्वविद्यालयों ने।

एक लेखक के अनुसार राहुल दार्शनिक समालोचना, धार्मिक समालोचना, साहित्यिक समालोचना तो करते ही हैं, इनके वे अधिकारी विद्वान थे, पर इनके अतिरिक्त उन्होंने राजनीतिक, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक समालोचनाएं भी कीं जो अधिकांशतः तथ्यपरक हैं। 

तिब्बत से लाए ग्रन्थों में धर्म कीर्ति की प्रमाणवर्तिका भी थी। उसकी प्रस्तुति के साथ भगवत शरण उपाध्याय के अनुसार राहुल शाम्पोइओं (मिस्त्र की चित्र भाषा हिअरोग्लिफ लिपि को पढ़ने वाला फ्राँसीसी विद्वान) और प्रिंसेप (अशोक के शिलालेखों को पढ़ने वाला अंग्रज विद्वान) की कोटि में पहुँच गए थे।

इतिहासकार राहुलः राहुल एक ऐसे इतिहासकार थे जो इतिहास को इतिहास निर्माण के लिए आवश्यक समझते थे। वास्तव में सही अर्थों में इतिहास समझने वाला कोई भी व्यक्ति कभी ‘निष्क्रिय’ हो ही नहीं सकता - फिर इतिहासकार तो ऐक्टिविस्ट नहीं है तो वास्तव में इतिहासकार ही नहीं है, वह भी राहुल जैसा इतिहासकार। राहुल की इतिहास दृष्टि में देश-काल की महत्तम व्यापकता है- सारा विश्व और पृथ्वी की रचना से अब तक। उन्होंने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों और कार्यों पर लिखा है- मैक्रो और माइक्रो दोनो स्तर पर, मानव समाज पर भी और आजमगढ़ पर भी। उनका पुरातत्व बहुत व्यापक था- ढीहों और ढूहों तक, गाँव में बिखरे ठीकरों तक। ‘पुरातत्व ग्रन्थावली’ और ‘गंगा’ नामक पत्रिका के पुरातत्व विशेषांक का सम्पादन मील का पत्थर हैं। उनका इतिहास लेखन विविध है जिसे उनके पुस्तकों के उदाहरण से समझा जा सकता है।

1. ‘मध्य एशिया का इतिहास’ हिन्दी में तो मानक है ही - आज भी, दुनिया की कम भाषाओं में उस समय तक ऐसा ग्रन्थ लिखा गया था। प्रमाण यह है कि कई विदेशी विद्वानों ने हिन्दी सीखा उसे पढ़ने के लिए। 
2. ‘अकबर’ एक ऐसा ग्रन्थ है जो अकबर ही नहीं उसके काल को सामने रखता है, उसके नवरत्नों को भी उसके समकालीन समाज को भी और अकबर-राणा प्रताप संघर्ष को केन्द्रीय शासन और विघटनकारी क्षेत्रीयता के फ्रेम में रख कर राणा प्रताप की आलोचना करता है। 
3. ‘वोल्गा से गंगा’ जो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधिरित असाधारण गल्प है और 
4. ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ जो इतिहास के सार को प्रचारात्मक शैली में जनग्राह्य बनाता है।
इतिहास लेखन के क्षेत्र में राहुल की अनन्य पुस्तक ‘अकबर’ से एक उद्धरण उनके उत्कृष्ट और पैने लेखन का प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हैः

‘जिस तरह चौबीस घंटे खुली या प्रकट लड़ाई, एक दूसरे के प्रति घृणा,  चल रही थी, उससे हम मानवता से दूर हटते जा रहे थे। हर वक्त विदेशी आक्रान्ता के आ जाने का खतरा रहता था। तैमूर, नादिरशाह, अब्दाली के आक्रमणों ने सिद्ध कर दिया कि विजेताओं-आक्रान्ताओं की तलवारें हिन्दू-मुस्लमान का फर्क नहीं करतीं। मुसलमानों और हिन्दूओं के धार्मिक नेताओं में कुछ ऐसे भी पैदा हुए जिन्होंने रामखुदैया के नाम पर लड़ी जाती इन भयंकर लड़ाइयों को बन्द करने का प्रयत्न किया। ये थे मुस्लिम सूफी और हिन्दू सन्त। पर इनका प्रेम सन्देश अपनी खानकाहों और कुटियों में ही चल सकता था, लड़ाई के मैदान में उनकी कोई पूछ नहीं थी। लाखों लोगों में अपने-अपने धर्म के नाम पर जब दोनों ओर से कटाकटी होने लगती, तो सन्तों-सूफियों को कोई नहीं पूछता था। दोनों दल कहते थे- जो हमारे साथ नहीं, वह हमारा दुश्मन है। सन्तों-सूफियों के शांति और प्रेम के सन्देश ने हजारों-लाखों के मन को शान्ति प्रदान की, पर वह देश की सामाजिक समस्या को हल करने में असमर्थ रहा।

भारत में दो संस्कृतियों के संघर्ष से जो भयंकर स्थिति पिछली तीन-चार शताब्दियों से चल रही थी, उसको सुलझाने के लिए चारो तरफ से प्रयत्न करने की जरूरत थी और प्रयत्न ऐसा, कि उसके पीछे कोई दूसरा छिपा उद्देश्य न हो। संस्कृतियों के समन्वय का प्रयास हमारे देश में अनेक बार किया गया। पर, जो समस्या इन शताब्दियों में उठ खड़ी हुई थी, वह उससे कहीं अधिक भयंकर और कठिन थी। बीसवीं सदी के मध्य में देश के दो टुकड़े हो गए और वह भी खून की नदियों के बहाने के साथ।



साहित्यकार राहुल

राहुल ने साहित्य की सभी विधाओं में रचना की। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास से जीवनी तक और साहित्य के सभी उद्देश्य पूरे किये। मनोरंजन, लोकरंजन से दिशा निर्देशन तक। साहित्य की यात्रा की, सभी मंजिलें पूरी कीं - यथार्थवाद, आलोचनात्मक यथार्थवाद से समाजवादी यथार्थवादी तक। यथार्थ की धरती पर भी थे और कल्पना की उड़ानें भी भरीं। कवि शैली के स्काइलार्क की तरह और इतना भरपूर साहित्य समाज का सौंप गए कि कई पीढ़ियां उसे पचाती रहेंगी। उन्होंने आलोचकों के लिए नहीं लिखा, न पुरस्कारों के लिए, न केवल लेखकों के लिए। उनके लिए साहित्य सामाजिक उत्पाद था और वह बिना मुनाफा उठाए समाज के ही, उसी की भाषा-शैली-मुहावरे में समर्पित था। चूंकि शुद्धता सहज और नैसर्गिक गुणवत्ता नहीं रही इसलिए उसे अलग से विशिष्टता बोधक विशेषण के रूप में इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि राहुल प्रचारक अधिक थे साहित्यकार कम। परन्तु जो यह मान ले कि हर साहित्य मूलतः और सारतः प्रचार- साहित्य ही होता है उसे यह कम-बेश वाला मानदंड बेकार लगेगा। राहुल को साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष बनाना कोई उनके प्रति उदारता या मेहरबानी नहीं थी, प्रगतिशील लेख संघ बन जाने के बाद के माहौल में सहित्य की नई भूमिका स्वीकारने का परिणाम था। साहित्य का सामाजिक सरोकार और सामाजिक ऊर्जा के रूप में साहित्य की स्वीकृति के बाद ऐसे सवाल नहीं उठेंगे या निरर्थक लगेंगे। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में राहुल के साहित्य का उद्देश्य है – 

1. लोक चित्त पर से मिथ्या रुढ़ियों के जंगल को दूर करना। 
2. शोषकों का अंत तथा 
3. समस्त मानव जाति को न्याय, समता, अन्न-वस्त्र और ज्ञानोपार्जन का सुयोग देना।

राहुल की सबसे प्रसिद्ध और चर्चित किताब ‘वोल्गा से गंगा’ की अंतिम कहानी है ‘सुमेर’ जो 1942 के भारत को चित्रित करती है। उसका एक पात्र सुमेर पटना में एम. ए. का विद्यार्थी है और तथा कथित ‘अछूत’ है। उसकी एक ब्राह्मण छात्र से बात होती है
‘आप अपनी जाति पर गांधी जी का कोई उपकार नहीं मानते ?’
‘उतना ही उपकार मानता हूं जितना मजदूर को मिल मालिक का मानना चाहिए।’
‘जमींदारों, पूंजीपतियों, राजाओं को वली-संरक्षक-गार्जियन कहने का दूसरा क्या अर्थ हो सकता है? गांधी जी का हमारे साथ प्रेम इसीलिए है कि हम हिन्दूओं में से निकल न जाएँ। पूना में आमरण अनशन इसलिए किया था कि हम हिन्दूओं से अलग अपनी सत्ता न कायम कर लें। हिन्दूओं को हजार वर्षों से सस्ते दासों की जरूरत थी और हमारी जाति ने उसकी पूर्ति की। पहले हमें दास ही कहा जाता था। अब गांधी जी ‘हरिजन’ कह कर हमारा उद्धार करने की बात करते हैं। शायद हिन्दूओं के बाद हरि ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन रहा है। आप खुद समझ सकते हैं, ऐसे हरि का जन बनना हम कब पसन्द करेंगे?’
‘तो आप भगवान को भी नहीं मानते?’
‘किस उपकार पर? वर्षो से हमारी जाति पशु से भी बदतर, अछूत, अपमानित समझी जा रही है और उसी भगवान के नाम पर जो हिन्दूओं की बड़ी जातियों को जरा-जरा सी बात पर अवतार लेता रहा, रथ हांकता रहा, किन्तु सैकड़ों पीढ़ियों से हमारी स्त्रियों की इज्जत बिगाड़ी जाती रही, हम बाजारों में सोनपुर के मेले में पशुओं के तरह बिकते रहे, आज भी गाली-मार खाना, भूखे मरना ही हमारे लिए भगवान की दया बतलाई जाती है। इतना होने पर भी जिस भगवान के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, उसे माने हमारी बला।’

साहित्यकार स्वयं रचना करने के साथ उत्कृष्ट साहित्य का दूसरी भाषाओं से उत्कृष्ट अनुवाद कर के भी साहित्य की कम महत्वपूर्ण सेवा नहीं करता। साहित्य से गहरा और सामाजिक सरोकार रखने वाले बहुत से बड़े साहित्यकारों ने अनुवाद के लिए भी समय निकालना अपना दायित्व समझा है। इस संबंध में राहुल के ‘सांस्कृतिक काव्य धारा’ का एकमात्र उदाहरण राहुल का महत्व स्पष्ट कर देगा। इसमें भारद्वाज, वशिष्ठ और विश्वामित्र से जयदेव श्री हर्ष तक अर्थात आदिकाल से 17 वीं शताब्दी तक के सम्पूर्ण संस्कृत काव्यधारा से हिन्दी पाठकों का परिचय करवा पाने की क्षमता राहुल के अतिरिक्त किसी दूसरे व्यक्ति में आज तक नहीं देखी गयी। उन्होंने ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ जैसे ऐतिहासिक ग्रन्थों का भी अनुवाद किया।

राहुल के अनुसार प्रगतिवाद का अर्थ था बंद दरवाजे खोलना। वह कलाकार की स्वतंत्रता नहीं उसकी जंजीरों का, सीमाओं का, शत्रु होता है। प्रगतिशील लेखक सिपाही भी होता है सेनापति भी। उसे जनसाधारण का समानधर्मा होना चाहिए। इसी अर्थ में वह साहित्य की अनन्य सेवा करते रहे और साहित्य को समाज का दर्पण ही नहीं मशाल भी बना कर छोड़ा। उनके जैसा कोई दूसरा साहित्यकार नहीं हुआ- शायद पूरे भारत में।

राजनीति मूलतः विद्वान-बुद्धिजीवी होते हुए भी उन्होने राजनीति कर्म का निर्णायक महत्व स्वीकार कर स्वयं भी मैदान में कूदने से गुरेज नहीं किया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं उनकी जेल-यात्रायें। किसी महत्वपूर्ण ग्रन्थ-रचना में भी लगे हों तो आवश्यक आन्दोलनात्मक कार्यवाई में कूदने में वे जरा भी देर नहीं करते थे।

राहुल सब से पहले असहयोग आन्दोलन में कूदे। सारन जिले में एक जमींदार की भूमि पर किसानों को दखल दिलाने के लिए जेल गए। बहुत कम विद्वानों-साहित्यकारों ने जरूरत पड़ने पर राजनीतिक नेतृत्व कर किसानों के हितों (मध्यवर्गीय हितों नही) के लिए खून बहाया होगा। 1934 में बिहार में किसानों का नेतृत्व करते हुए जमीदार का गन्ना काटा और जमीदार के पिलवान ने डन्डे से उनका सर फोड़ दिया। सरकार ने महावत पर मुकदमा चलाया पर राहुल ने यह बयान देकर मुकदमा समाप्त करवा दिया कि उनकी लड़ाई जमींदार से है उसके पिलवान से नहीं।

उनके राजनीति कर्म का प्रेरक सूत्र थाः ‘जोंकों का राज्य खत्म करना होगा। हवा-पानी की तरह धरती और धन सब कुछ को सब का साझे का करना होगा, तब जा कर दुनिया का नरक खतम होगा।’



राहुल और राजनीति

राहुल ने अपनी आत्मकथा में स्पष्ट किया है कि वह राजनीतिक प्राणी नहीं थे यानी राजनीति के प्रति उनमें स्वाभाविक आकर्षण नहीं था। पर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति, और वह भी उनके जैसा जीवन-जगत से सरोकार रखने वाला देश में विदेशी राज के विरुद्ध उद्वेलित हो यह स्वाभाविक था। वह उस तरह के बुद्धिजीवी नहीं थे जो दुखी लोगों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उनकी कभी-कभी मदद करके संतृप्त हो जाते हैं। वह स्वयं भी किसान थे और खासतौर से किसानों के दोहरे दमन-उत्पीड़न, सरकार द्वारा और जमीदारों, के विरुद्ध सक्रिय हो गए। उनके जैसा व्यक्ति केवल ऊपर से नेतृत्व कर दायित्व का निर्वाह नहीं कर सकता था। वह तृण-मूल कार्यकर्त्ता की तरह आंदोलन में शामिल रहे।

वह स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। कांग्रेस के अधिवेशनों में गए। जिला कमेटी के सेक्रेटरी भी बनाए गए। खादी और चर्खे का प्रचार करने गाँव-गाँव घूमें। पर गांधी जी की राजनीति से कभी अभीभूत नहीं हुए- उनके व्यक्तित्व से भी नहीं। वह धीरे-धीरे मार्क्सवाद से प्रभावित होते जा रहे थे क्योंकि एक ओर उस विचार के उन्हें बेहतर जन-सरोकार दिखाई देता था तो दूसरी ओर सोवियत यूनियन की सफलताएं भी उन्हें प्रभावित करती थी। अन्ततः वह कम्युनिस्ट बन गए पर वह किसी मामले में कट्टरपंथी नहीं हो सकते थे। वह पार्टी के अन्धानुयायी नहीं थे। राहुल ने यशपाल से बात करते हुए तीन नतीजे निकाले थे। 

1. एक अभियान के बाद क्रांतिकारी अपने मुहिम के प्रति उदासीन हो जाते हैं। 
2. किसान-मजदूर वर्ग में जो पैदा हुए वह जरूरी नहीं कि क्रांतिकारी ही हो।  अक्सर मुद्दों के अनुसार उनका मतभेद भी होता रहता था। एक बाद उन्हें पार्टी छोड़ना भी पड़ा। डॉ. राम विलास शर्मा उनके कटु आलोचक बन गए थे, परन्तु उनके मन में अपने आलोचकों और पार्टी के लिए कोई कटुता नहीं पैदा हुई। वह एक कम्युनिस्ट की तरह ही मरना चाहते थे, और ऐसा ही हुआ, क्यों कि उन्हें पार्टी में शामिल कर लिया गया।

उनके मन में धनिकों के प्रति एक पूर्वाग्रह सा समा गया था। इसीलिए वह जवाहर लाल नेहरू से भी प्रभावित नहीं थे। इलाहाबाद प्रवास के लिए लालायित नहीं रहते थे। यहाँ तक जवाहर लाल नेहरू ने उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। तब भी वह उत्साहित नहीं हुए।

राजनीति एक ऐसा खेल है जिसमें ‘फेयाप्ले’ हमेशा संभव नहीं होता और राहुल में न्याय और सद्कर्म को लेकर कट्टर नैतिकता थी। इसलिए धीरे-धीरे वह राजनीति से उदासीन होते गए और अपने पठन-पाठन-शिक्षण में रमते गए। उनका कहना था, ‘मैं राजनीति में अपने हृदय की पीड़ा दूर करने आया था। गरीबी और अपमान को मै। अभिशाप समझता था।’ पर धीरे-धीरे उन्हें लगा था कि वह स्वयं ऐसा कर पाने में समर्थ नहीं हैं।



राहुल और हिमालय

राहुल सांकृत्यायन का हिमालय से विशेष संबंध था। यहाँ तक कि राहुल के व्यक्तित्व की हिमालय से तुलना की जा सकती है। वैसा ही विस्तार, वैसी ही ऊँचाई और वैसी ही विविधता। थोड़ा अतिरेक भले ही हो जाए यह कहा जा सकता है कि जैसे हिमालय से टकरा कर मानसून भारत को सींचता है वैसे ही राहुल से टकरा कर भारत का नवजागरण भारतीय मनीषा को सींच सकता है।

राहुल ने हिमालय की न जाने कितनी यात्राएँ कीं और तिब्बत में तो मानो उनका मन ही रम गया। इस संबंध में एवरेस्ट विजय की यात्रा करने वाले मलोरी की याद आती है। तब एवरेस्ट विजय आज की तरह अपेक्षतया आसान नहीं था और मलोरी एक दिन बर्फ के तूफान में गुम हो गए थे। उनसे किसी ने पूछा कि आखिर आप हिमालय की दुर्गम यात्रा क्यों करते हैं? उनका उत्तर बहुत सारगर्भित था। उन्होंने कहा थाः ‘क्योंकि हिमालय है।’ इसका मतलब यह हुआ कि कुछ लोगों को कठिनता और दुर्गमता ही आकर्षित करती है।

राहुल भी हिमालय को बार-बार पार करते थे। तिब्बत तो उन्हें विशेष रूप से आकर्षित करता था- तिब्बत का भूगोल, इतिहास, समाज और खासतौर से धर्म। उन्होंने तिब्बत को बहुत से तिब्बतियों से भी बेहतर जाना-समझा। उन्होंने तिब्बत की भाषा को मानो अपनी भाषा बना ली और उसमें बहुमूल्य पुस्तकें लिखी। तिब्बत उस समय प्रच्छन्न देश (Terra Incognita) कहा जाता था। उसको दुनिया के सामने उजागर करने वालों में राहुल का नाम अग्रणी है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि राहुल ने तिब्बत में बहुत से ऐसे ग्रंथ ढूंढ निकाले जो भारत में लुप्त हो गए। ऐसे ग्रंथ ल्हासा में ही नहीं दूर-दराज के बौद्ध मठों में मौजूद थे। उन जगहों पर पहुँचना भौगोलिक ही नहीं राजनीतिक कारणों से भी दुर्गम था। कई जगहों पर तो राहुल को भेष बदल कर बौद्ध लामा की तरह जाना पड़ता था। बिजली तो थी नहीं। तिब्बत की गाय ‘याक’ की चर्बी जला कर देर रात वह पांडुलिपियों की नकल करते। इस तरह अपनी अनेक यात्राओं में उन्होंने पांडुलिपियों और कलावस्तुओं का अद्वितीय संग्रह इकट्ठा किया और खच्चरों पर लाद कर तरह-तरह के जोखिम उठाते हुए भारत ले आये। वह सामग्री उस समय भी करोड़ो की रही होगी। पर वह सब वह अपने मित्र इतिहासकार के. पी. जायसवाल को सौंप देते। उनमें से अधिकांश आज भी पटना संग्रहालय में मौजूद है। उस दौरान तो राहुल की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। फिर भी उन्होंने अपने संग्रह का कोई व्यक्तिगत लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया।

राहुल प्रकृति प्रेमी तो थे ही अधिकांशतः यात्रा पैदल ही करते थे। हिमालय में उन्हें सबसे प्रिय थे ‘देवदार’। देवदार के सुन्दर वृक्षों को देख कर वह कवि हो जाते। देवदार की घनी हरियाली और उसे छूता और लहराता मंद सुगंध उन्हें मोह लेता। देवदार को वह प्राकृतिक सौंदर्य का मानदंड’ मानते थे। हिमालय की तो जोंके भी उन्हें बहुत आकर्षित करती। उन्होंने बहुत से रूपक-प्रतीक हिमालय से लिए हैं। उनका एक प्रतीक ‘जोंक’ भी था। जब वह पूंजीवादी व्यवस्था को जोंक कहते तो शोषण पूरी तरह उजागर हो जाता। 

वास्तव में, हिमालय में वह घुमक्कड़ और शोधकर्ता दोनों ही रूपों में जाते और उनके इन दोनों ही रूपों का उत्कर्ष हिमालय की गोद में ही हुआ।



जीवन दृष्टि

राहुल ने समाज में प्रचलित दृष्टियों तथा मर्यादाओं की नैतिक तथा तार्किक परीक्षा ली, जो खरा न उतरा उसकी आलोचना की। विचार उनके लिए पार उतरने के लिए पतवार थे न कि बोझ।

सकाल संध्या, वैदिक संहिताओं का सस्वर पाठ, शिव की आग्रहपूर्वक भक्ति, ठेठ निराकारोपासना, विष्णु भक्ति और दीक्षा, आर्य समाजी, सुधारवादी, राष्ट्रवादी आन्दोलन में भागीदार, ईसाई मिशनरियों और मौलवियों से शास्त्रार्थ, हिन्दू धर्म के लिए भी मिशनरी तैयार करने की उत्सकता, बौद्धधर्म के प्रति आकर्षण, बुद्ध की बुद्धवादिता और उदारता से प्रभावित, भिक्षु दीक्षा, मार्क्स के प्रति आकर्षण, बुद्ध और मार्क्स के विचारों का समन्वय, भारतीय दर्शनों द्वारा धर्म का पिछलगू होना अस्वीकार्य, धार्मिक सीमाओं का परित्याग, और अंततः ऐसी थी उनकी जीवन दृष्टि और विश्व दर्शन। उस समय भी मुख्यधारा से प्रभावित नहीं था। भगत सिंह के विचारों से आकर्षित तो थे पर मुख्य प्रभाव समाजवाद का था। वह थे तो बुद्धिवादी पर भावनाओं का उतना ही महत्व। जो व्यक्ति अपने माँ-बाप की मुत्यु पर नहीं रोया वह तिब्बत में एक कुदिया की मृत्यु पर फूट-फूट कर रोया था, क्योंकि वह उनकी हो गई थी। उनका मानना था कि आदमी का हृदय वीणा के तार जैसा सूक्ष्म भेद कर सकता है। संबंध में मिठास मिल जाय तो भरपूर अन्यथा उन्हें ठोक-बजा कर ठीक नहीं किया जा सकता।

उनके जीवन में सबसे मूल्यवान संबंध मित्रता का था। गाँव के मेहनतकश से विश्व विख्यात विद्वान तक उनके मित्र रहे और सबसे आत्मीयता निर्माण मित्रता परस्पर विश्वास और विकास का संबंध है। राहुल ने हमेशा यही किया। वह कहते थे ‘घनिष्ठता’ मेरी कमजोरी है। उन्होंने ‘ नाते सभी राम के मनियत’ की जगह लिख ‘नाते सभी मीत के मनियत।’ मित्रता उनके लिए, सूद पर लगी पूंजी जैसी थी, जिससे मूल पर आंच न आने पाएं।

जीवन के एक-एक दिन ही नहीं एक-एक घन्टे-सेकंड का हिसाब रखते थे। इसलिए आन्दोंलनों भी, यहां तक कि जेल में लोकोत्थान में लगे रहते थे।
उनका विचार था कि दुनिया से जितना लिया जाता है उसका 100 गुना चुकाना चाहिए।

राहुल के दृष्टिकोण, लेखन तथा जीवन में चूकें हैं, भूलें है पर वे उनके विकासमान व्यक्तित्व और सामाजिक सरोकार वाले कृतित्व पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगातीं। उनकी बहुत सी सीमाएं उस संगटन की हैं जिससे वह जुडे़ रहे। राहुल की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यह है कि उनके ग्रंथों की, उनके कार्यों की, आज भी उतनी जरूरत है। जब तक ‘जोकों का राज्य’ समाप्त नहीं होता, जब तक दुनिया को बदलने की जरूरत बाकी है तब तक एक दिशा संकेत और समर्पित जिजीविषा की प्रेरणा के रूप में राहुल जिन्दा रहेंगे।


राहुल जी के जीवन की प्रमुख तिथियां

जन्म - 9 अप्रैल 1893। ननिहाल-ग्राम पन्दहा, जिला आजमगढ़ में।
गोत्र-सांकृत्य - पिता-गोवर्धन पांडे, माता-कुलवंती देवी।
नाना- रामशरण पाठक। 
बचपन का नाम केदारनाथ; चार भाई तथा एक बहन में सबसे जेष्ठ।
शिक्षाः आजमगढ़ में मिडिल तक। आगरा में अरबी, फारसी की पढ़ाई और लाहौर तथा काशी में संस्कृत की।
1912-13 - परसा-मठ के साधु तथा महन्त के उत्तराधिकारी ।
1913-14 - दक्षिण भारत का पर्यटन।
1922 - बक्सर जेल में छः मास। जिला कांग्रेस के मंत्री।
1923-25 - हजारीबाग जेल में।
1927-28 - श्रीलंका में संस्कृत के अध्यापक; बौद्ध-साहित्य का अध्ययन।
1929-30 - तिब्बत में सवा साल। पहली यात्रा।
1932-33 - इंग्लैंड और यूरोप में।
1934 - दूसरी तिब्बत यात्रा।
1935 - जापान, कोरिया, मंचूरिया, सोवियत संघ तथा ईरान की यात्रा।
1936 - तीसरी तिब्बत-यात्रा।
1937  - सोवियत संघ में (दूसरी बार)।
1938 - तिब्बत में चौथी बार। राहुल जी की इसी यात्रा के दौरान, सोवियत रूस में इगोर राहुलोविच का जन्म।
1939 - किसान संघर्षः अमवारी-सत्याग्रह। जेल में।
1940-42 - हजारीबाग जेल में।
1944-47 - लेनिनग्राद (सोवियत संघ) में प्राध्यापक।
1947 - हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापित।
1952 - मसूरी में अपना घर।
1953 - पुत्री जया का जन्म।
1955 - पुत्र जेता का जन्म।
1958 - चीन में साढे़ चार मास। साहित्य अकादमी एवार्ड।
1959-61 - श्रीलंका में दर्शन-शास्त्र के प्राचार्य।
1959 - मसूरी छोड़ कर दार्जलिंग में।
1961 - दिसम्बर महीने में ‘‘स्मृति लोप’’ का आघात।
1962-63 - सोवियत संघ में सात महीने चिकित्सा।
महाप्रयाण - 14 अप्रैल, 1963, सत्तर वर्ष की आयु वर्ष में। 

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रमुख रचनाएं
उपन्यास

1. बाईसवीं सदी (1923)
2. जीने के लिए (1940)
3. सिंह सेपापति (1944)
4. जय यौधेय (1944)
5. भागो नहीं, दुनिया बदलो (1944)
6. मधुर स्वप्न (1949)
7. राजस्थानी रनिवास (1953)
8. विस्मृत यात्री (1954)
9. दिवोदास (1960)
10. निराले हीरे की खोज (1965)


कथा साहित्य

11. सतमी के बच्चे (1953)
12. वोल्गा से गंगा (1944)
13. बहुरंगी मधुपुरी (1953)
14. कनैला की कथा (1955-56)


नाटक

15. नयकी दुनिया (1942)
16. मेहरारुन के दुरदसा (1942)
17. जपनिया राछछ (1942)
18. जरमनवा के हार निहचय (1942)
19. देस रच्क्षक (1942)
20. ढुनमुन नेता (1942)
21. ई हमार लड़ाई (1942)
22. जोंक (1942)


आत्मकथा

23. मेरी जीवन-यात्रा भाग-1 (1944)
24. मेरी जीवन-यात्रा भाग-2 (1950)
25. मेरी जीवन-यात्रा भाग-3
26. मेरी जीवन-यात्रा भाग-4
27. मेरी जीवन-यात्रा भाग-5
28. नये भारत के नये नेता (खण्ड-1) (1942)
29. नये भारत के नये नेता (खण्ड-2) (1942)
30. बचपन की स्मृतियां (1953)
31. अतीत से वर्तमान (प्रथम खण्ड) (1953)
32. स्तालिन (1954)
33. लेनिन (1954)
34. कार्ल मार्क्स (1954)
35. माओ त्से-तुंग (1954)
36. सरदार पृथ्वी सिंह (1955)
37. घुमक्कड़ी स्वामी (1956)
38. मेरे असहयोग के साथी (1956)
39. जिनका मैं कृतज्ञ (1956)
40. वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली (1956)
41. महामानव बुद्ध (1956)
42. सिंहल घुमक्कड़ जयवर्धन (1960)
43. कप्तान लाल (1961)
44. सिंहल के वीर पुरुष  (1961)

यात्रा वृतांत

45. मेरी लद्दाख यात्रा (1926)
46. श्रीलंका (1926-27)
47. तिब्बत में सवा साल (1931)
48. मेरी यूरोप यात्रा (1932)
49. यात्रा के पन्ने (1934-36)
50. जापान (1935)
51. ईरान (खण्ड-1) (1935-36)
52. ईरान (खण्ड-2) (1935-36)
53. मेरी तिब्बत यात्रा (1937)
54. रूस में पच्चीस मास (1944-47)
55. किन्नर देश में (1948)
56. घुमक्कड शास्त्र (1949)
57. सोवियत भूमि
58. सोवियत मध्य एशिया
59. दार्जलिंग परिचय (1950)
60. कुमायूं (1951)
61. गढ़वाल (1952)
62. नेपाल (1953)
63. हिमाचल प्रदेश (अप्रकाशित) (1954)
64. जौनसार देहरादून (1955)
65. आजमगढ़ की पुराकथा
66. एशिया के दुर्गम भूखंडों में (1950)
67. चीन में क्या देखा?
68. हिमालय दर्शन

निबंध

69. साम्यवाद क्यों? (1934)
70. पुरातत्व निबंधावली (1936)
71. दिमागी गुलामी (1937)
72. तुम्हारी क्षय (1937)
73. आज की समस्याएं (1944)
74. साहित्य निबंधावलि (1949)
75. अतीत से वर्तमान (खंड-1) (1953)
76. अतीत से वर्तमान (खंड-2) (1953)
77. (अ) राहुल निबंधावली (साहित्य) (1970)


विभाग

78. विश्व की रूपरेखा (1942)

समाजशास्त्र

79. मानव-समाज (1942)

राजनीति

80. क्या करें? (1937)
81. सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास (1939)
82. सोवियत न्याय (1939)
83. राहुल जी का अपराध (1939)
84. आज की राजनीति (1949)
85. कम्युनिस्ट क्या चाहते हैं? (1953)
86. रामराज्य और मार्क्सवाद (1959)
87. चीन के कम्यून (1960)


दर्शन
88. वैज्ञानिक भौतिकवाद (1942)
89. दर्शन-दिग्दर्शन (1943)
90. बौद्ध दर्शन (1942)

धर्म
91. इस्लाम धर्म की रूपररेखा (1923)
92. बुद्धचर्या (1930)
93. बौद्ध संस्कृति
94. धम्मपद (1933)
95. मज्झिम निकाय (1933)
96. विनय-पिटक (1934)
97. दीर्घ निकाय (1935)
98. तिब्बत में बौद्ध धर्म (1935)

इतिहास

99. मध्य ऐशिया का इतिहास (खंड-1) (1952)
100. मध्य ऐशिया का इतिहास (खंड-2) (1952)
101. ऋग्वैदिक आर्य (1956)
102. अकबर (1956)
103. भारत में अंग्रेजी राज्य के संस्थापक (1957)

साहित्य इतिहास

104. पालि साहित्य का इतिहास (1944)
105. हिन्दी काव्यधारा (1952)
106. दक्खिनी काव्यधारा (1952)

लोक-साहित्य
107. आदि हिन्दी की कहानियां और गीतें (1950)


शोध-ग्रंथ
108. सरहपादकृत दोहा-कोष (1954)

कोश
109. शासन शब्दकोश (1948)
110. तिब्बती हिन्दी कोश (प्रथम खंड) (1947)


संस्कृत
111. संस्कृत पाठमाला भाग 1, (1928)
112. संस्कृत पाठमाला भाग 2 (1928)
113. संस्कृत पाठमाला भाग 2 (1928)
114. संस्कृत पाठमाला भाग 2 (1928)


तिब्बती
115. तिब्बती बाल शिक्षा (1933)
116. पाठावली भाग 1 (1933)
117. पाठावली भाग 1 (1933)
118. पाठावली भाग 1 (1933)
119. तिब्बती व्याकरण

सम्पादन-कार्य : हिन्दी
1. तुलसी रामायण (संक्षेप) (1957)
2. हिन्दी साहित्य का वृहद् इतिहास (भाग-16)

सम्पादन-कार्यः पालि
3. पालि-काव्य धारा

सम्पादन-कार्य एवं टीकाः संस्कृत
4. अभिधर्म कोश (1930)
5. विज्ञप्ति मातृता सिद्धि (1934)
6. वाद न्याय
7. सूत्र कृतांग
8. प्रमाण-वार्तिक (1935)
9. अध्यर्धशतक (1935)
10. प्रमाण-वार्तिक भाष्य (1935-36)
11. प्रमाण-वार्तिक वृतिः (1936)
12. प्रमाण-वार्तिक स्ववृत्तिः (1936)
13. प्रमाण-वार्तिक स्ववृत्ति टीका (1937)
14. विग्रह व्यावर्तिनि
15. विनय सूत्र (1943)
16. हेतु बिंदु (1944)
17. संबंध परीक्षा (1944)
18. महापरिनिर्वाण सूत्र (1952)
19. निदान सूत्र (परीक्षा) (1952)
20. संस्कृत काव्यधारा (1955)

अनुवाद
1. शैतान की आंख (1923)
2. जादू का मुल्क (1923)
3. सोने की ढाल (1923)
4. विस्मृति के गर्भ में (1923)
5. दाखुंदा (1947)
6. जो दास थे (1947)
7. अनाथ (1948)
8. संविधान का मसौदा (1948)
9. अदीना (1951)
10. सूदखोर की मौत (1951)
11. शादी (1952)


लाल बहादुर वर्मा





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