इलाहाबाद कार्यशाला की रपट - प्रस्तुति : बजरंग बिहारी



 
जनवादी लेखक संघ द्वारा एक से तीन अक्टूबर 2016 को इलाहाबाद में एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में विशेषज्ञों ने ‘वर्ग, जाति तथा जेंडर’ विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। देश भर से आए प्रतिभागियों ने अपने सवाल विशेषज्ञों के सामने रखे जिसके जवाब के क्रम में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं। इस कार्यशाला की एक वृहद् रपट तैयार की है कवि-आलोचक बजरंग बिहारी ने। तो आइए आज पहली बार पढ़ते हैं इलाहाबाद कार्यशाला की रपट।

     
जाति, वर्ग और जेंडर


इलाहाबाद कार्यशाला की रपट



बजरंग बिहारी

जनवादी लेखक संघ (जलेस) ने विगत 1-3 अक्टूबर, 2016 को इलाहाबाद में जाति, वर्ग और जेंडर विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया इस कार्यशाला के लिए प्रतिभागियों का चयन पहले ही हो चुका था। इसमें देश के तमाम राज्यों के लगभग सत्तर प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला में स्वागत वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ समाजकर्मी एवं मजदूर नेता हरिश्चंद्र द्विवेदी ने कहा कि यह विषय बेहद प्रासंगिक है और वर्ग, जाति तथा जेंडर पर नई पीढ़ी का ध्यान जाना बहुत जरूरी है। परिवर्तन का पहिया रुकना नहीं चाहिए। कार्यशाला के संयोजक बजरंग बिहारी ने कहा कि इलाहाबाद कार्यशाला बाँदा में पिछले वर्ष (अक्टूबर, 2015 में) हुई कार्यशाला का ही विस्तार है। बाँदा कार्यशाला का विषय था- ‘आंबेडकरवाद और मार्क्सवाद : पारस्परिकता के धरातल’। मार्क्स और आंबेडकर दोनों ने साम्य स्थापित करने के लिए वर्चस्व को गंभीरता से समझा था। भारत में वर्चस्व का स्वरूप जाति, वर्ग और जेंडर से बनता है। इनके अन्तर्संबंध को समझे बगैर शोषणतंत्र के उन्मूलन का अभियान विफल रहेगा। संयोजक ने कहा कि विषय खुला हुआ है। कार्यशाला तथा जलेस दोनों यह मानते हैं कि भारतीय वर्चस्व के किसी एक रूप को सब कुछ मानकर चलना ठीक नहीं। वर्ग का प्रश्न निश्चय ही महत्वपूर्ण है मगर जाति तथा जेंडर को कम महत्व का नहीं माना जा सकता। ये तीनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं। इनके मध्य एक सहयोग का रिश्ता कायम है। यह त्रयी एक विचित्र रसायन का निर्माण करती है। इस रसायन को समझे और भेदे बिना परिवर्तन के आंदोलन सफल नहीं हो सकते। यह भी कि किसी एक को वरीयता देकर शेष दो को मुल्तवी नहीं रखा जा सकता। तीनों के विरुद्ध एकसाथ संघर्ष छेड़ना होगा। जलेस के उप महासचिव संजीव कुमार ने अपनी प्रस्तावना में कहा कि यह कार्यशाला हमारी इस जिज्ञासा का समाधान ढूँढने के लिए है कि प्रभुत्व और मातहती की संरचनाएं बनाने वाली तीनों श्रेणियों के बीच के अन्तर्संबंध को कैसे देखा जाए। हम सामाजिक मुद्दों के साथ साहित्य को जोड़ कर देखते हुए इन तीनों के संबंध में अपनी समझ और दुरुस्त करना चाहते हैं। परिवर्तन का कोई भी आंदोलन एकांगी नहीं हो सकता। प्रथम सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखक तथा जलेस अध्यक्ष दूधनाथ सिंह ने की।

दूसरे सत्र में बोलते हुए समाजकर्मी और दलित नारीवादी लेखिका अनिता भारती ने कहा कि जलेस की यह पहल सराहनीय है। उन्होंने समाज में जाति की मजबूत पैठ पर विचार करते हुए कहा कि इसने स्त्रियों को भी आपस में बाँट दिया है। जाति तोड़े बगैर एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। इंसान भूखा रह सकता है मगर बेइज्जती सहन नहीं कर सकता। इस व्यवस्था के पीड़ित जैसे-जैसे अपना दर्द समझेंगे वैसे-वैसे वे एकजुट होंगे। उनकी एकजुटता ही हमारी ताकत है। अनिता ने कहा कि वे उन लोगों में नहीं हैं जो निराश हो चले हैं और कहने लगे हैं कि ‘कुछ नहीं हो सकता’। वे आशावादी हैं कि लोग समता की तरफ बढ़ेंगे।

अपनी बात रखते हुए अनीता भारती 
अनिता जी के वक्तव्य पर हुई चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए दलित आलोचक डॉ. अभय कुमार ने कहा कि जाति व्यवस्था नहीं, जाति प्रबंधन कहना चाहिए। यह देखने की बात है कि जाति प्रबंधन के सिद्धांत वर्ग से कैसे जुड़ते हैं। वर्ग बदल सकता है मगर जाति में बदलाव संभव नहीं है। डॉ. चंद्रभान सिंह यादव ने पूछा कि जो लोग यह कह रहे हैं कि दलितों में बुर्जुआजी बढ़ रही है क्या वे बुर्जुआजी की संख्या या प्रतिशत बता सकते हैं? ‘दलित ही दलितों का शोषण कर रहे हैं’ जैसे तर्क क्या आँख चुराने का बहाना तो नहीं हैं? वामपंथी कार्यकर्त्ता हरिश्चंद्र पाण्डेय ने कहा कि जनवादियों से निश्चय ही चूक हुई है। बेस और सुपर स्ट्रक्चर भ्रांतिपूर्ण श्रेणियां हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन ने ब्राह्मणवाद पर कभी खुल्लमखुल्ला हमला नहीं किया। स्त्रीवादी अध्येता डॉ. अवंतिका शुक्ला ने कहा कि वर्ग, जाति और जेंडर तीनों ही जुड़े हुए हैं। विवाह संस्था तीनों को बनाए हुए है। भूस्वामित्व इसी तरह कायम रहता है। बजरंग बिहारी ने कहा कि वक्तव्य में दो बातें गौरतलब और समस्यामूलक हैं। एक, दलित आंदोलन और राजनीति से हिंदुत्व की ओर जाने वाले लोगों को समझना तथा दो, इज्जत के सवाल को रोजी-रोटी के सवाल से ऊपर मानना। इस चर्चा पर अपनी टिप्पणी देते हुए अनिता जी ने कहा कि वर्ग की लड़ाई में दलित आगे हैं मगर आर्थिक मुद्दे पर लड़ाई अपमान के विरुद्ध संघर्ष को पीछे धकेल देती है। इज्जत की लड़ाई ही मुख्य है। जब दलितों को लगेगा कि वामपंथी उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं तो वे उनकी तरफ झुकेंगे। उन्होंने अपील की कि दलितों को बाँटें नहीं। 

दूसरे सत्र के वक्ता ‘सिनेमा ऑफ़ रेजिस्टेंस’ के संयोजक और दस्तावेजी फिल्म निर्माता संजय जोशी ने गैर फीचर फिल्मों में जाति और जेंडर की समस्या पर अपनी बात रखी। उन्होंने तमाम फिल्मों के विजुअल्स दिखा कर अपनी स्थापनाओं और प्रस्तावों को पुष्ट किया। संजय जोशी ने कहा कि विजुअल्स की दुनिया की पूरी लड़ाई बड़े संस्थानों और छोटे इनिशिएटिव्स के बीच की है। पुराने जमाने में सिनेमा सेल्युलाइड पर बनता था। तब सांस्थानिक मदद के बगैर फिल्म बनाना संभव नहीं था। आज का कैमरा सारे प्रोसेस तुरंत कर देता है। नए कैमरे से आप अपने गाँव के सामंत की हिंसा रिकॉर्ड कर सकते हैं। पहले यह मुमकिन नहीं था। उस्ताद अलीउद्दीन खां पर बात करते हुए संजय ने संगीत नाटक अकादमी की उन पर बनाई डाक्यूमेंट्री फिल्म के कुछ अंश दिखाए। इसे उन्होंने भारतीय सिनेमा का उज्ज्वल डॉक्यूमेंटेशन कहा। अलीउद्दीन खां ने ‘मैहर बैंड’ बनाया था। इस बैंड में ज्यादातर लोग अल्पसंख्यक या दलित थे। 1983 में आनंद पटवर्धन द्वारा बनाई दस्तावेजी फिल्म ‘बॉम्बे : अवर सिटी’ मुंबई के हाशिए के लोगों की जिंदगी को फोकस करती है। आनंद क्लास और स्टेट के रिश्ते को पूरी जटिलता से दर्शाते हैं। वे कहीं भी लाउड नहीं होते। भारतीय सिनेमा में आनंद पटवर्धन बहुत बड़े टर्निंग पॉइंट हैं। उन्होंने अपनी हर फिल्म को दूरदर्शन पर दिखाने के लिए लड़ाई लड़ी। संजय ने झारखंड की ‘अखड़ा’ समूह की चर्चा की। अखड़ा समूह में राम दयाल मुंडा, बीजू टोप्पो आदि लोग रहे। उसकी बनाई डाक्यूमेंट्री फ़िल्में आदिवासी जीवन, उत्पीड़न, आकांक्षा और संघर्ष को सामने लाती हैं। ‘शहीद जो अनजान रहे’ अखड़ा की दस्तावेजी फिल्म है। इसमें मांझी हत्याकांड का संदर्भ है। इस फिल्म से आदिवासियों के नाम पहली बार दर्शकों के समक्ष आते हैं। अखड़ा की दूसरी उल्लेखनीय फिल्म ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’ थी। मंजीरा दत्ता ने झारखंड के अति पिछड़े लोगों पर 'बाबू लाल भुइयां की कहानी' नामक फिल्म बनाई। यह डॉक्यूमेंटेशन एक ओरिएंटेशन के साथ था। मदुरै की एक दलित सफाईकर्मी महिला पर बनी फिल्म ‘पी’ के कुछ अंश दिखाते हुए संजय ने इस वर्ग की जीवन स्थितियों पर ध्यान आकृष्ट कराया। पुणे के कामगारों ने ‘कचरा व्यू’ नामक दस्तावेजी फिल्म का निर्माण किया है। हालैंड के फिल्मकार बर्ट की दस्तावेजी फिल्म ‘जू’ के हिस्से दिखा कर उन्होंने दर्शकों से पूछा कि ‘जू’ (चिड़िया घर) किधर है? ‘जू’ तत्व  मनुष्य में है या जानवर में? इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए संजय ने उड़ीसा की फिल्म ‘ह्यूमन जू’ के हिस्से दिखाए। फिल्म में जानवर नहीं हैं। यह फिल्म डोंगरिया आदिवासियों पर है। नियमगिरि पहाड़ी पर रहने वाले डोंगरिया आदिवासी अपनी जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता के कब्जे के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। संजय जोशी ने उदयपुर के शंभू खटीक की चर्चा की जिन्होंने दलितों के श्मशान पर फिल्म बनाई है। उन्होंने कहा कि जिनकी कोई कहानी नहीं है उनकी कहानियां बन रही हैं। यह दस्तावेजी सिनेमा का योगदान है। 1930-40 में भारतीय सिने जगत में महिलाओं की स्थिति पर रीना मोहन की बनाई डाक्यूमेंट्री ‘कमलाबाई’ के हिस्से दिखाते हुए उन्होंने कहा कि यह बहुत मूल्यवान काम है। उन्होंने अपने वक्तव्य में करीब 20 महिला फिल्मकारों का सोदाहरण जिक्र किया। मीरा दीवान की ससुराल पर, सुरभि शर्मा की जहाजी म्यूजिक पर, वसुधा जोशी की शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर और शबा दीवान की उत्तर भारत की पांच तवायफों पर बनाई फ़िल्मों की चर्चा प्रतिभागियों को बेहद महत्वपूर्ण लगी। इस चर्चा में अजीत प्रियदर्शी, अनिता भारती, किंगसन सिंह पटेल, स्वाती और क्रांति भाटापुरकर आदि प्रतिभागी शरीक हुए। 

अर्चना वर्मा वक्तव्य देते हुए
दो अक्टूबर की सुबह कार्यशाला के तीसरे सत्र में नारीवादी चिंतक अर्चना वर्मा ने वक्तव्य दिया। रेमण्ड विलियम्स के हवाले से उन्होंने कहा कि मनुष्य संस्कृति का भी उत्पादन करता है। आर्थिक तत्व निश्चय ही महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन समाज के केन्द्र निरंतर बदलते रहते हैं। वर्ग का निर्माण समान सांस्कृतिक रुचियों से भी होता है। सिर्फ आर्थिक कारक की निर्धारक नहीं होते। कभी वर्ग और संघर्ष प्रचलित शब्द थे आज उनकी जगह अस्मिता और प्रतिरोध ने ले ली है। वर्ग के भीतर शेष पहचानें विलुप्त नहीं होतीं। अन्यता और वैमन्यता पर विचार करते हुए उन्होंने ‘सामान्य’ का अर्थ किया- समं च अन्यं च। समान भी और अन्य भी। किसी भी अस्मिता में छोटी-छोटी अस्मिताएं समाहित रहती हैं। वे विलीन नहीं होतीं। उनमें टकराहटें होती रहती हैं। अर्चना वर्मा ने लिंग और लैंगिकता का फर्क समझाते हुए कहा कि एक जैविक है तो दूसरा संस्कृति द्वारा निर्मित। इसी क्रम में स्त्री विमर्श और जेंडर के अन्तर को भी समझना चाहिए। स्त्री सशक्तीकरण के विचारों और कार्यक्रमों के व्यावहारिक क्रियान्वयन की राजनीति स्त्री विमर्श के भीतर आती है। स्त्री दृष्टि (फीमेल गेज) पर स्त्री विमर्श का मुख्य बल होता है। स्त्री को उसके नागरिक अधिकारों की प्राप्ति कराने के लिए संघर्ष करते रहना इसका लक्ष्य है। आयरन जॉन के संदर्भ से उन्होंने कहा कि स्त्री होने का भाव जैविक है, जन्मजात है जबकि पुरुष को जीवन भर अपने पुरुषत्व का परीक्षण करते रहना पड़ता है। सिमोन के हवाले से अर्चना जी ने कहा कि यह पूरी तरह स्त्री के आत्मबोध पर निर्भर है कि वह खुद को किस तरह से देखती है- दासी की तरह या स्वतन्त्र स्त्री की तरह। स्त्री विमर्श स्त्री के आत्मबोध को पितृसत्ता के प्रतिपक्ष में निर्मित करना चाहता है। इसी से वह सीमित भी हो जाता है। अस्तित्ववादी विचारदर्शन की चर्चा के प्रसंग में उन्होंने कहा कि प्रामाणिकता का अर्जन आकांक्षा से नहीं, आचरण से होता है। हिन्दी के अस्मितावादी विमर्श पर टिप्पणी करते हुए अर्चना जी ने कहा कि अस्मिता की अभिव्यक्ति नहीं होती बल्कि अभिव्यक्ति अस्मिता का निर्माण करती है। उन्होंने प्रभा खेतान, मन्नू भंडारी, सुशीला टाकभौरे, मैत्रेयी पुष्पा और रमणिका गुप्ता की आत्मकथाओं का ससंदर्भ जिक्र किया। मैत्रेयी की आत्मकथा उपन्यास ज्यादा है, वह कृति आत्मकथा के रूप में निराश करती है। पितृसत्ता की परेशानियों पर बोलते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि औद्योगिक क्रांति ने पिता को घर से अधिकाधिक अनुपस्थित किया है। दूसरी तरफ फिल्म कला माध्यम पिता को भारी भरकम पुरुष के रूप में चित्रित करती है। अर्चना जी ने जेंडर स्टडीज में मुलायम पुरुषों को लेकर महसूस की जाने वाली असहजता की बात भी की।

अर्चना जी के वक्तव्य पर हुई चर्चा में हिस्सा लेते हुए लखनऊ के डॉ. अजीत प्रियदर्शी ने पूछा कि क्या स्त्री विमर्श लैंगिकता पर हो रहे विमर्श को निरस्त कर सकता है? अर्चना जी का जवाब था कि स्त्री विमर्श अस्मिता विमर्श का विकास है। इसमें स्त्रीलिंग भी है और लैंगिकता भी। रेखा अवस्थी का कहना था कि बदलाव मिल कर ही हो सकता है। पुरुष भी बदले और स्त्री भी। नांदेड़ से आईं शिक्षिका राजश्री भाटापुरकर ने ट्रांसजेंडर का मुद्दा उठाया। अभय कुमार ने पूछा कि स्त्री पुरुष पर क्रमशः निर्भर क्यों होती गई? अर्चना जी का कहना था कि इस प्रश्न का जवाब अनुमान के आधार पर ही दिया जा सकता है। संतान और व्यक्तिगत संपत्ति दो महत्वपूर्ण कारण है। पितृसत्ता की शुरुआत से स्त्री की पुरुष पर निर्भरता का आरंभ होता है। उन्होंने उद्दालक और श्वेतकेतु की कथा के जरिए अपनी बात स्पष्ट की। प्रेमचन्द की कहानी ‘नैराश्य लीला’ का भी उल्लेख किया जिसमें एक बाल विधवा को तरह-तरह से तोड़ा-मोड़ा जाता है। पुडुचेरी से आए शोधार्थी जगदीश नारायण तिवारी ने पूछा कि अस्मिता विमर्श में जातियाँ कहाँ तक बनी-बची रहेंगी? सुभाषिणी अली की टिप्पणी थी कि बड़ी जातियों ने छोटी जातियों की संस्कृति को विकृत करने का काम किया है। ब्राह्मणवाद का हित इसी से सधता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षक राजकुमार ने कहा कि सरनेम हटा लेना चाहिए। यह बहुत घातक है।     

नांदेड़ से आईं मराठी लेखिका और सत्यशोधक कार्यकर्त्ता सुप्रिया गायकवाड़ ने चौथे सत्र को संबोधित करते हुए जाति, वर्ग और जेंडर के बीच के अन्तर्संबंध को समझने पर जोर दिया। जाति व्यवस्था भारत की है जबकि लिंग भेद दुनिया में हर जगह काम करता है। हमने मान लिया है कि सवर्ण महिलाएं ही प्रतिबंधों में जीती हैं और दलित स्त्रियाँ उससे मुक्त हैं जबकि सचाई यह है कि सभी जाति समुदायों की औरतें सामाजिक व्यवस्था की कठोर श्रृंखला में जकड़ी हुई हैं। नारीवादी इतिहासकार उमा चक्रवर्ती को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ की पितृसत्ता ब्राह्मणी पितृसत्ता है और इसे जाति के भीतर ही समझा जा सकता है। जाति और पितृसत्ता के मिले जुले रूप को महात्मा फुले ने भी स्पष्ट किया था। सुप्रिया ने कहा कि स्त्री शोषण को समझना है तो ब्राह्मणी धर्म को समझना होगा। स्त्री पर सारी पाबंदियां शुद्धता के कारण हैं। महिला जितनी शुद्ध है जाति उतनी ही प्रतिष्ठित होगी। अपनी जाति को प्रतिष्ठित करने के लिए उन्होंने निचली जाति की स्त्रियों को निशाना बनाया। फुले के समय की एक घटना काशीबाई की हत्या का उल्लेख करते हुए सुप्रिया ने कहा कि जिस व्यक्ति ने काशीबाई को गर्भवती बनाया वह तो छूट गया लेकिन काशीबाई को दंड मिला। फुले ने ऐसी स्त्रियों और उनके बच्चों को बचाने के लिए बालहत्याप्रतिबंधक गृह शुरू किया। फुले का कहना था कि व्यभिचारी स्त्रियाँ नहीं, पुरुष होते हैं। ब्राह्मण स्त्री का शोषण घर के भीतर होता है जबकि कुनबी स्त्री घर और बाहर दोनों जगह शोषित होती है। फुले ने इसीलिए शूद्र स्त्री की मुक्ति को ज्यादा तरजीह दी है। सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाते हुए राजा राममोहन राय ने तर्क दिया कि धर्मशास्त्रों में सतीप्रथा नहीं है। इसी तरह दयानंद सरस्वती ने ऋग्वेद में मूर्तिपूजा का उल्लेख न होने का तर्क देते हुए मूर्तिपूजा के खिलाफ आवाज उठाई। कल्पना कीजिए अगर वहाँ इसका प्रावधान होता तो ये विचारक क्या करते?

सवाल पूछती हुई एक प्रतिभागी
डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं को जातिप्रथा का प्रवेश द्वार कहा है। वे स्त्री मुक्ति को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि जातिप्रथा और पितृसत्ता दोनों में स्त्री पीड़ित है। सुप्रिया ने स्त्री मुक्ति हेतु बाबासाहेब के प्रयासों का विवेचन करते हुए उनके द्वारा स्थापित दलित महिला फेडरेशन का विस्तार से उल्लेख किया। अपने वक्तव्य के अंतिम भाग में उन्होंने कास्ट, पैट्रियार्की और कैपीटलिज्म के गठजोड़ की चर्चा की। आज जो आंदोलन चल रहे हैं वे समस्या के एक खंड को ही एड्रेस करते हैं। आपस में बंटे हुए आंदोलन समस्या को जड़ से उखाड़ कर नहीं फेंक सकते। तीनों को साथ लेकर जो आंदोलन बनेगा, समाधान उसी से निकलेगा। कोपर्डी घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मराठों का दलित समुदाय के विरुद्ध खड़े होना, एससी/एसटी एक्ट ख़तम करने की मांग करना, आरक्षण पर प्रतिक्रियात्मक स्टैंड लेना चिंतनीय है। दलित-दलित, दलित-ओबीसी, महिला-महिला के बीच शोषण का रिश्ता ‘स्ट्रक्चर’ से जुड़ा हुआ प्रश्न है। हम संरचनागत परिवर्तन की कोशिश करें। उसी से कुछ संभव होगा।

चर्चा का आरंभ करते हुए डॉ. अभय कुमार ने पूछा कि दलित राजनीति और आंदोलन में खेमे बन रहे हैं, क्या यह ब्राह्मणी शिकंजा नहीं है? गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ. किंगसन सिंह पटेल का कहना था कि नारीवाद के बीच विभाजन है। ये लोग इकट्ठे क्यों नहीं हो पाते? कुटुम्ब के भीतर के सवाल बाहर क्यों नहीं आ पाते? अजीत प्रियदर्शी का सवाल था कि क्या मीडिया जातियों को लड़ाने का खेल नहीं खेल रही है? नांदेड़ से आए शोधछात्र बड़ेवद राम ने जानना चाहा कि क्या मराठा आंदोलन प्रतिक्रियावादी नहीं है? कवि-अनुवादक और दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक डॉ. संजीव कौशल का कहना था कि पुरुषवादी भाषा में स्त्री गायब कर दी जाती है। मीडिया में राजनीति के तहत जाति को चिन्हित करने का काम होता है। सुभाषिणी अली ने कहा कि संपत्ति में बँटवारे से बचने के लिए नम्बूदरी ब्राह्मणों ने सिर्फ बड़े बेटे के विवाह की प्रथा चलाई थी। परिवार के शेष बेटे नायर जाति की स्त्रियों से सम्बन्ध करते थे। गोलवरकर ने इसकी व्याख्या ब्राह्मण श्रेष्ठता के रूप में की। उनके अनुसार ब्राह्मण दूसरी जाति की स्त्रियों से बच्चे पैदा करेंगे तो वे बच्चे उत्तम कोटि के होंगे! दलित स्त्री के शरीर का इस्तेमाल ऊँची जाति वाले कर सकते हैं, यह मक्कारी आज भी बनी हुई है। शिक्षक और समीक्षक डॉ. चन्द्रभान सिंह यादव ने कहा कि मीडिया का चरित्र हिंदूवादी है। सुप्रिया गायकवाड़ ने अपने रेस्पांस में कहा कि जो भी शोषित हैं वे एक साथ आ सकते हैं। दलित और महिलाएं एकजुट हो सकते हैं। प्रतिगामी ताकतों के खिलाफ लड़ना है तो एक होना पड़ेगा। मित्र संगठनों के एक मंच पर आना पड़ेगा।     

पांचवें सत्र में बोलते हुए प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री और परिवर्तनकामी चिंतक प्रो. गोपाल गुरु ने प्रतिबद्धता का प्रश्न उठाया। उन्होंने वर्कशॉप के स्वरूप और उसकी मर्यादा (प्रोटोकाल) का ध्यान रखने की अपील की। उनका कहना था कि वक्ता से वही सवाल पूछे जाएं जिस पर उसने अपना मत रखा हो। मनमर्जी से सवालों से कार्यशाला का उद्देश्य भोथरा हो जाता है। ‘हिप्पोक्रेट’ के लिए ‘मक्कार’ शब्द का अनुमोदन करते हुए उन्होंने इस अच्छे अनुवाद के लिए सुभाषिणी अली को धन्यवाद दिया। कोपर्डी परिघटना को उन्होंने मक्कारी का उदाहरण बताते हुए कहा कि खैरलांजी की घटना को यहाँ अलग करके रख दिया गया है। गोपाल गुरु ने सवाल किया कि जाति, वर्ग और जेंडर को साथ लेने पर आपकी राजनीति क्या होगी? उनका प्रस्ताव था कि इन तीनों में से किसी एक को ही ले सकते हैं या किसी एक को मुख्य मान सकते हैं। उनकी यह राय भी थी कि ये तीनों कैटेगरीज थक गई हैं, अर्थहीन-सी हो गई हैं। अब उनमें नई ऊर्जा लाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह भी सोचने की आवश्यकता है कि इन तीनों से ऊपर भी एक कैटेगरी है जो इन्हें साथ रखती है। हम उस कैटेगरी को पहचानें। ‘आल इन वन’ से काम नहीं चलेगा। आपको स्पेशलाइज करना पड़ेगा।

एक लेखक संगठन के रूप में उन्होंने जलेस की सराहना करते हुए कहा कि क्या कविता करना पर्याप्त है? कवि तो उसे पर्याप्त मान लेते हैं। कविता की अपर्याप्तता को पहचानना भी आवश्यक है। कविता मेटाफर देती है। वह आसमान तक पहुँचा देती है। गद्य का चुनाव इसलिए होना चाहिए कि हमें जड़ तक जाना है। जड़ तक जाने के लिए फिलासफी चाहिए। यह प्रोज में ही संभव है। अब वर्ग कहाँ है? जहाँ पर पूँजीपति नेचर को नष्ट कर रहा है वहाँ वर्ग है। मुंबई की टेक्सटाइल मिलों में तीनों तरह के शोषण थे। इस शोषण पर आंबेडकर ने लिखा, अण्णा भाऊ साठे ने लिखा। अभी मिल नहीं हैं तो तीनों कहाँ चले गए? वे सब साम्प्रदायिकता में तब्दील हो गए हैं। प्रकाश आंबेडकर का यह कथन बहुत अर्थपूर्ण है कि अभी जातिवाद नहीं, जाति है। जाति की राजनीति ख़तम हो गई है मगर जाति मौजूद है। जाति अब शोषण, विभेद से ज्यादा हिंसा में अभिव्यक्त हो रही है। यह कहना गलत है कि वायलेंस का कोई स्ट्रक्चर नहीं है। संरचना के भीतर ही वायलेंस होता है। वायलेंस के दायरे को उसकी संपूर्णता में देखें। ख़ामोशी भी हिंसा है। ओढ़ी हुई ख़ामोशी, थोपी हुई ख़ामोशी वायलेंस है। अगर पत्नी रात दस बजे साहस करके कहे कि आज उसका प्रमोशन हुआ है तो यह हिंसा है। दिन भर अपने को जब्त किए रहना हिंसा है। गोपाल गुरु ने कहा कि हम सब मैराथन में हैं। हमें मैराथन में दाल दिया गया है। इसका उद्देश्य है कि एक जैसा अनुभव किसी को हासिल न हो सके। मेरा दुःख सबसे बड़ा है- सब यही दावा कर रहे हैं। दलित, स्त्री, आदिवासी सबके बीच एक होड़-सी लगी है। सब मैराथन में हैं। यह सब उदारवाद की देन है। अगरचे अनुभव एक हुआ तो पूँजीपतियों पर संकट आ सकता है। इसीलिए पूँजीवाद सबको अलग-अलग खेमे में रखता है। पावर्टी को बांटकर रखना उसकी रणनीति है। वर्ग, जाति और जेंडर को एक-साथ रखा जाना जरूरी है। इसके लिए इंसान की भाषा अपेक्षित है। हमें आदमी को इंसान बनाना है। उसके लिए शास्त्र चाहिए, विचार चाहिए। जो अन्याय करते हैं वे अपनी आत्मकथा कभी नहीं लिखते। आपको उनकी आत्मकथा लिखनी है और अपनी भी। दोनों को बदलने का जिम्मा आपको ही उठाना पड़ेगा। हाल में संपन्न जे.एन.यू. छात्र संघ चुनाव पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ बापसा का नारा था- ‘भगवा लेफ्ट एक है, बाकी कामरेड फेक है।’ यहाँ सारा कथन एक नारे में समा गया है। नारा है मगर विश्लेषण कहाँ है? प्रतिबद्धता से शुरू हुआ वक्तव्य प्राथमिकता पर समाप्त हुआ। गोपाल गुरु ने प्राथमिकता का सवाल उठाते हुए कहा कि किसी एक कैटेगरी को आगे रख कर चलना होगा। आप जो भी कैटेगरी चुनें उसे शार्प, फोकस्ड और पॉलिटिकली चार्जेबल होना चाहिए। प्रायऑरिटी के साथ सॉलिडरिटी का मुद्दा जुड़ा हुआ है। विचारधारा के सामने ‘प्यूरिटी’ का प्रश्न आ सकता है। उनका संकेत पुअर (गरीब) को प्राथमिक कैटेगरी बनाने का था।

गोपाल गुरु के वक्तव्य पर संजीव कौशल ने पूछा कि आइडेंटिटी पॉलिटिक्स सबकी अलग-अलग है। ऐसे में छोटी-छोटी अस्मिताओं से क्या असर पड़ने जा रहा है? आलोचक और दिल्ली के भारती कॉलेज में शिक्षक कवितेन्द्र इंदु की राय थी कि मार्क्सवाद ने एक कैटेगरी को ऊपर करके शेष तबकों के शोषण को जारी रखने का मौका दिया है। क्लास को ऊपर रखने में दिक्कत है। चंचल चौहान ने पूछा कि वर्ग कहाँ है? क्या मार्क्स के इस कथन की प्रासंगिकता ख़तम हो चुकी है कि मानव इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है? कवि शंभू यादव का प्रश्न था कि अंतिम कैटेगरी क्या होगी? गोपाल गुरु के वक्तव्य से अपनी सहमति दर्ज कराती हुई सुभाषिणी अली ने कहा कि बँटवारा करके रखना नियोलिबरल युग की स्ट्रेटजी है। सबको मैराथन में डाल देने से बिखराव होगा और हिंसा होगी। इसमें उनका फायदा है। जबकि हिंसा अस्मिता का लक्षण बन चुकी है तब इसे कैसे रोका जाए? आलोचक रेखा अवस्थी ने कहा कि कॉरपोरेट बाँट रहा है ऐसे में हम क्या एक हो सकते हैं? क्या ‘पुअर’ एक सक्षम कैटेगरी हो सकती है? दिल्ली यूनिवर्सिटी के शोधार्थी राम नरेश राम ने प्रश्न किया कि पूँजीवाद ने जाति, वर्ग और जेंडर का कैसे इस्तेमाल किया है? उनका कहना था कि गरीब को एक श्रेणी के रूप में स्वीकार कर लेने से एक सुविधा रहेगी। ऊना ने वर्ग को आगे किया है। बादल सरोज ने ध्यान खींचा कि पूँजीवाद का निर्माण भी किसी ढाँचे के भीतर हुआ होगा। वर्ग के निर्माण में स्ट्रक्चर किस तरह काम कर रहा था? गुजरात सेंट्रल यूनिवर्सिटी के शोधार्थी सुनीत मिश्र की शंका थी कि जातियों के भीतर अलग-अलग सवाल हैं। क्या इनके रहते एकता हो पाएगी? पिछड़ा वर्ग गरीबी के विरुद्ध लड़ रहा है, दलित अपनी अस्मिता के लिए और आदिवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। इनके मध्य एकता होगी? डॉ. अवंतिका शुक्ला की राय थी कि जाति और जमीन मिल कर यौनिक नियंत्रण स्थापित करते हैं। जाति के आर्थिक आधार को कैसे समझें? क्लास और कास्ट मिलकर हम ‘क्लास्ट’ का उपयोग कर सकते हैं। रमा शंकर सिंह ने बताया कि गरीबी और कंगालीपन एक नहीं हैं। हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के शिक्षक डॉ. रूपेश कुमार जाति उन्मूलन में अन्तरजातीय विवाह की भूमिका पर स्पष्टीकरण चाहते थे। किंगसन सिंह पटेल ने स्त्रियों का वर्ग जानना चाहा। इन सभी टिप्पणियों और सवालों के मद्देनजर प्रो. गोपाल गुरु ने कहा कि गरीबी एक बुनियादी मुद्दा, एक वैध कैटेगरी है, यह मेरा प्रस्ताव नहीं है। पहले कई लोगों ने यह बात कही है। गरीबी बड़ा इमोशनल मामला है। पूँजीपति वर्ग दिखता है। इससे साबित होता है कि वर्ग है। मगर, वर्ग चेतना वाला वर्ग कहाँ चला गया? सोशल मीडिया से जो क्लास बन रहा है मैं उसकी बात नहीं कर रहा। मैं उस वर्ग की बात कर रहा हूँ जो मैटेरियल है, विजिबल है, ठोस और कांक्रीट है। बदलने की क्षमता उसी में है। ट्रेन में पहला इंजन तो होता ही है उसमें भले ही तीन इंजन लगें। यह लड़ाई सवर्ण-अवर्ण की नहीं है। सवर्ण-अवर्ण रेशियल कैटेगरी है। ब्राह्मणवाद, दलितवाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना उचित है। ब्राह्मणवाद को किसी भी काया में घुसने से कोई परहेज नहीं है। गाँधी ऐसे आदमी थे जो आंबेडकर को प्रारंभ से सुन रहे थे। उस समय सभी लोग उन्हें अवॉयड कर रहे थे। ऊना का स्ट्रगल मॉस रीयलिटी कैसे बनेगा, नहीं मालूम! 

दो अक्टूबर दोपहर बाद छठे सत्र में बोलते हुए हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के अंगरेजी विभाग की प्रो. माया पंडित ने कहा कि इन दिनों राजनीतिक विमर्श से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण धर्माचार्यों के बयान लगते हैं। उन्हें सुनने के बाद ऐसा लगता है कि भारत में जो कुछ बुरा घट रहा है- अकाल, अतिवृष्टि, अनाचार आदि है उसका कारण हम स्त्रियाँ ही हैं। कांची के शंकराचार्य कहते हैं कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि स्त्रियों के केश लंबे हो रहे हैं। मौलवी कहते हैं कि लड़कियां जींस पहन रही हैं इसलिए आफत आ रही है। आरएसएस के नेता कहते हैं कि 10 बच्चे जनो तभी तुम्हारा जीवन सार्थक है। विजयाराजे सिंधिया कहती हैं कि सती प्रथा बहुत गौरवशाली प्रथा है। इतने लांछनों, आरोपों, प्रत्याशाओं और प्रतिबंधों के बीच सवाल है कि मै कौन हूँ। माया पंडित ने इस संदर्भ में गोदा रानी को याद किया जिन्होंने आदिवासी स्त्रियों को संघर्ष के लिए घर के बाहर निकाला था। अगर जीने की रीत संस्कृति है तो यह रीत कौन तय कर रहा है? क्या पहनना है, क्या खाना है, किस बरतन में खाना है आदि चीजें कहाँ तय हो रही हैं? कॉ. पानसारे की हत्या कर दी गई, दाभोलकर और कलबुर्गी को मार दिया गया। एक उपन्यास लिखने के दंडस्वरूप पेरूमल मुरुगन को कहना पड़ा कि एक लेखक के रूप में मैं खुदकुशी कर रहा हूँ। यह सब एक असहिष्णु संस्कृति के नतीजे हैं। रेमण्ड विलियम्स को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि परम्पराओं का समुच्चय होता है। एक परम्परा नहीं होती। आज जो परम्परा थोपी जा रही है उसे पहचानने की आवश्यकता है। ब्राह्मणी इतिहासकारों ने इतिहास, वर्तमान सब बिगाड़ रखा है। पेशवा (ब्राह्मण) युग में उन्होंने लिस्ट बनाई कि क्या करना है क्या नहीं। सुनारों ने ब्राह्मणों का अनुसरण किया। महिलाओं को जाति की इज्जत का कारण बना दिया गया। उन पर अत्याचार का हेतु यह इज्जत ही है। ऐसी हायरार्की बनाई गई कि कोई अपनी जगह से हिले नहीं। मैला उठाने का काम सिर्फ एक जाति-समुदाय के लोग ही करते आ रहे हैं। यहाँ लेबर का नहीं, लेबरर्स का बँटवारा किया गया- ऐसा बाबासाहेब ने कहा। बेबी कांबले से लिए इंटरव्यू का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दलित जीवन दृष्टि भिन्न है इसलिए उनकी परम्पराएं, विश्वास और कथाएं भी अलग हैं। उदाहरण के रूप में तुलसी विवाह की कथा रखी जा सकती है। राजकन्या वृंदा की कहानी को सवर्ण मानस ने रोमांटिक कथा में बदल दिया है। माया पंडित ने सवाल किया कि गणपति पंडाल और उत्सव का पैसा कहाँ से आता है? कैडबरी और सैमसंग धार्मिक आयोजनों को प्रायोजित करने में इतनी रूचि क्यों लेते हैं? गणेश को व्हिस्की के, मैकडोनाल्ड्स के विज्ञापन क्यों मिलते हैं? पंचतंत्र लंबे समय से पाठ्यपुस्तक है। उसमें स्त्रियों को दोषों का सन्निधान बताया गया है। आज बच्चा 4-5 घंटे टीवी देखता है। बाज़ार ने स्त्री की जो छवि गढ़ी है, वही उसे परोसी जाती है। स्त्री को गोरी, स्लिम, सेक्सी के फ्रेम में जड़ दिया जाता है। अब नए तंत्र का सूत्रधार वैश्वीकरण है। उसके द्वारा संचालित मीडिया है। मीडिया की भाषा ही आज की भाषा है। यह भाषा उपभोग की ललक पैदा करती है। आप मात्र उपभोक्ता हैं। नए बाज़ार ने कंडीशनिंग की मुहिम छेड़ी हुई है। 

सवाल पूछते हुए दूधनाथ सिंह
प्रश्नोत्तर सत्र में सुप्रिया गायकवाड़ ने कहा कि किसी भी सामान्य टीवी सेट पर 100 से अधिक चैनल उपलब्ध होते हैं। कमोबेश सभी स्त्री के प्रति पूर्वग्रह बनाते और पोसते हैं। वरिष्ठ लेखक दूध नाथ सिंह ने कहा कि वृंदा प्रसंग की चर्चा डी. डी. कोसांबी ने की है। स्त्री-सत्ता के संदर्भ में उन्होंने उर्वशी-पुरुरवा का उल्लेख किया। पुरुरवा उर्वशी से जान की भीख मांगता है। मातृसत्तात्मक कबीलों में कबीले की रानी सारा वर्ष गुजारने के बाद उस पुरुष की बलि दे देती थी। सुभाषिणी अली ने उच्च जाति की स्त्रियों द्वारा मनुस्मृति के पढ़े जाने की जानकारी पर संदेह व्यक्त किया। डॉ. चन्द्रभान यादव ने कहा कि डी. डी. कोसांबी अपनी परिकल्पना को इतिहास पर आरोपित करते हैं। क्रांति भाटापुरकर ने शिक्षा व्यवस्था में दखलंदाजी का मुद्दा उठाया। दीपक रूहानी ने जानना चाहा कि कलबुर्गी ने ऐसा क्या लिखा था जिसकी वजह से उनकी हत्या की गई? इन प्रश्नों के जवाब में माया पंडित ने कहा कि माइथोलॉजी यथार्थ की सामाजिक निर्मिति है। मार्क्सवाद कभी भी किसी कहानी को एकार्थी नहीं मानता। कहानियाँ व्याख्या सापेक्ष होती हैं। डी. डी. कोसांबी के इतिहास में बेबी कांबले की कहानी नहीं है। डॉ. कलबुर्गी ने कहा था कि जो भगवान खुद को सुरक्षित नहीं रख सकता वह भक्त की रक्षा कैसे करेगा। दाभोलकर भी अंधश्रद्धा की व्याख्या करते थे, उसका विरोध करते थे। आज लेखक की बहुत बड़ी जिम्मेदारी हो गई है। उसे जान हथेली पर रख कर अपना लेखकीय दायित्व निभाना है। माया पंडित ने आइडेंटिटी पॉलिटिक्स पर कहा कि यह संघर्षशील अवाम को जोड़ने का काम नहीं करती है। 

  
सातवें सत्र की वक्ता कथाकार और संपादक नमिता सिंह ने कहा कि समाज में विभाजन-दर-विभाजन चकित करता है। वर्ग और जाति कभी आपस में मिलते हैं और कभी अलग होते हैं। वे एक दूसरे पर आश्रित हैं और जुदा भी हैं। लड़कियों की शिक्षा को ले कर बरती जा रही घोर उदासीनता की समीक्षा करते हुए उन्होंने कहा कि स्कूलों में लडकियाँ रजिस्टर हो जाती हैं मगर कभी स्कूल नहीं जातीं। क्या धन की कमी के कारण? कितने स्कूलों में उनके लिए टायलेट है? कितने स्कूलों में सुरक्षा का वातावरण है? घर से स्कूल तक रास्ते में असुरक्षा का खौफ उनका पढ़ने जाना बंद करवा देता है। यूएनडीपी की रिपोर्ट कहती है कि 70% सामान्य और 74% गर्भवती महिलाएं रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की हालत देख लीजिए। 70% स्वास्थ्य सेवाएं प्राइवेट सेक्टर में हैं। पुत्र की अदम्य इच्छा स्त्रियों पर अलग कहर बरपा रही है। औरतों पर हिंसा बढ़ी है। हर दिन कम से कम 3 दलित महिलाओं के रेप केस थानों में दर्ज होते हैं। आंबेडकर कहते थे कि जाति को हटाए बगैर स्त्रियों की स्वतन्त्रता अर्जित नहीं की जा सकती। जाति उन्मूलन का जिम्मा सिर्फ दलितों पर क्यों छोड़ा जाता है? ऊपर की जातियां इसमें भागीदार क्यों नहीं बनतीं? अकेडमिक स्टाफ कॉलेज में हुए अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि हर बार व्याख्यान के बाद प्रतिभागी यही कहते हैं कि औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं। धर्म ग्रन्थ लगातार औरतों के नियंत्रण के बारे में निर्देश देते हैं। औरत मर्द की आचार संहिता सामजिक चित्त में घोल दी गई है। पति पत्नी को पीटे तो बुरा क्या- यह आम राय इसी से निकली है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के महिला कॉलेज की युवतियों ने मंडल विरोधी जुलूस निकाला था। जुलूस में प्लेकार्ड्स पर लिखा था- ‘वी डोंट वांट एन अनएम्पलायड हस्बैंड’। इससे जातिवादी जकड़न का कुछ-कुछ अंदाज होता है। संस्कृतिकर्मियों का दायित्व है कि वे वे कहें सो करें। क्रांतिकारी पोलिटिकल पार्टियों से कभी-कभी चूक हो जाती है। सैद्धांतिक नीति बनानी चाहिए। पार्लियामेंटरी सिस्टम में स्त्री और जाति पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। कारपोरेट कल्चर का विरोध जरूरी है। आर्थिक संसाधनों पर 2% लोगों का ही कब्ज़ा है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हों। एक लाख में 190 महिलाएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं। नमिता सिंह ने कहा कि हिन्दू औरतों पर बात करते समय मुस्लिम औरतों को भूलना ठीक नहीं है। वहाँ भी जाति व्यवस्था है। सैयद अंसारियों में शादी नहीं करते। गुजरात नरसंहार 2002 में माया कोडनानी का नाम आने पर उन्होंने कहा कि इससे यह मिथ टूटा कि सभी औरतें एक हो जाएंगीं।

इसी सत्र में अपने विचार व्यक्त करते हुए कवि शंभु यादव ने कहा कि सभी संस्कृतियाँ पितृसत्तात्मक मूल्यों का वहन करती हैं। मैस्कुलाइन को प्रखर, कठोर के साथ जोड़ दिया गया है और फेमिनाइन को कोमल, विनम्र के साथ। फ्रायड के विचारों का विकास लाकां में दर्शाते हुए उन्होंने कहा कि रीयल, सिम्बोलिक और इमैजिनरी ये तीन कोटियां लाकां देते हैं। डिजायर का दमन हिस्टीरिया पैदा करता है – यह बात फ्रायड के साथ फूको के यहाँ भी है। जूडिथ बटलर और जिजेक की वैचारिकी पर भी शंभु जी ने रोशनी डाली। जूडिथ बटलर कहती हैं कि स्त्री बनाई नहीं जाती। उसका बनना पूरी जिंदगी होता रहता है। उसकी निर्मिति में साइंस की भूमिका है। पहले के स्त्री विमर्श में विज्ञान नहीं था। पुरुष भी फेमिनाइन हो सकता है। पुरुष-प्रभुत्व में स्त्री पुरुष दोनों आते हैं। हम पूर्ण नहीं हैं। इनकम्प्लीट होने के भाव के साथ जीते हैं। जिजेक के अनुसार मेस्कुलाइन और फेमिनाइन लॉजिक सामंजस्य की एक असफल कोशिश है। दोनों परस्पर प्रत्यारोपित हैं। रियल रियलिटी का पर्याय नहीं होता। जिजेक मेस्कुलाइन लॉजिक को यूनिवर्सल मानते हैं। सभी समाज अग्रगामी उत्पादकता और वर्ग-संघर्ष से संचालित नहीं होते। पूँजीवाद और पुरुष दोनों पूरा वर्चस्व चाहते हैं मगर पा नहीं सकते।

इस सत्र पर पर हुई चर्चा में नांदेड़ के सूर्यवंशी रावसाहेब ने कहा कि हर जाति के ठेकेदार हैं। वे जाति को मजबूती दे रहे हैं और कह रहे हैं कि जाति तोड़ो। डॉ. अभय कुमार ने कहा कि व्याकरण में पूर्वग्रह व्यक्त होते हैं। प्रिया भारती का प्रश्न था कि स्त्री पूरे तरह से मुक्त क्यों नहीं हो पाती? नमिता सिंह का कहना था कि निहित स्वार्थ बदलाव में बाधा बनते हैं। धार्मिक मान्यताएं भी रुकावट डालती हैं। पितृसत्ता आर्थिक स्वाधीनता के बावजूद स्वाधीन नहीं होने देती। विचार सत्र के समापन के बाद देर शाम गंगा तट पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि हरीश चन्द्र पाण्डेय ने की। मुख्य अतिथि चंचल चौहान थे। सान्निध्य वरिष्ठ कथाकार दूध नाथ सिंह का था। संचालन युवा कवि और अनहद पत्रिका के संपादक संतोष कुमार चतुर्वेदी ने किया। कार्यक्रम की व्यवस्था चर्चित कवि विवेक निराला के सहयोग से की गई। इसमें कार्यशाला के प्रतिभागी कवियों और इलाहाबाद शहर के कई युवा और वरिष्ठ कवियों ने अपनी रचनाएं पढ़ीं।

कविता गोष्ठी

तीसरे दिन सुबह सातवें सत्र में आलोचक और कवि चंचल चौहान ने अपनी बात एक लोक कथा से आरंभ की। उस कथा में तोते जाल में इसीलिए फंसे रहते हैं कि वे एक साथ नहीं उड़ते। इंसानी नाबराबरी को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने आदिम अवस्था का चित्र खींचा। इस अवस्था में कुछ तगड़े लोगों ने संसाधनों पर कब्ज़ा कर लिया था। मानव सभ्यता का अगला चरण क्लासिकल विचारधारा का उदय था। इस विचारधारा ने मिथकों के सहारे यह बात प्रचारित की कि मनुष्य अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता। ग्रीक ट्रेजेडी के एक पात्र इडिपस की कथा यही कहती है कि जो कुछ नियत है वही होता है। ‘मैकबेथ’ और ‘पैराडाइज लॉस्ट’ इसी की पुष्टि करते है। ‘होइहिं वहीँ जो राम रचि राखा’ में यही फलसफा है। सभी धर्मों के धर्मगुरु नाबराबरी का दर्शन प्रतिपादित करते हैं। अभी पूँजीवाद क्षतिग्रस्त नहीं है। कुछ लोगों को क्लास दिखाई नहीं देता। क्लास है तभी उसकी राजनीतिक पार्टियां हैं। आज तेजी से परिवर्तन हो रहा है। जो अप्रासंगिक है, नष्ट हो रहा है उसे क्या बचाना! गुलामी का अपना सुख होता है। वैचारिक रूप से गुलाम बनाए रखना सत्ता के हित में रहता है। आज अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी यह फलसफा आगे बढ़ा रही है। मोंटेक सिंह अहलूवालिया, अरविन्द पानगढ़िया सब एक ही स्रोत से भेजे जा रहे है। इस फलसफे की जकड़बंदी को तोड़ने के लिए नई कतारबंदी की जरूरत है। इसी कतारबंदी की वजह से हिन्दुस्तान आजाद हुआ था। वर्गीय कतारबंदी हो तो भूस्वामी, पूँजीपति और राजनेता का त्रिगुट टूटे और समाज बदले।

चर्चा में हिस्सा लेते हुए शोधार्थी प्रिया भारती ने पूछा कि आप दलितों के बीच बहुत सारे विभाजन की बात कर रहे हैं। इसके मूल में क्या कारण हैं? डॉ. अभय ने कहा कि गुलामी में सुरक्षा होती है जबकि स्वतन्त्रता में हर सांस की कीमत चुकानी पड़ती है। अवंतिका शुक्ला ने कहा कि पितृसत्ता के औचित्यनिरूपण के लिए मातृसत्ता की कल्पना की गई है। स्त्री के पास सत्ता कभी रही नहीं। महाराष्ट्र के बड़ेवद राम ने प्रश्न किया कि जाति-समाज का निर्मूलन किस तरह किया जा सकता है? अतीत में जो गलतियां हुई हैं उन्हें वर्तमान में सुधारा क्यों नहीं जा सकता? सुनील कुमार वर्मा ने पूछा कि धनी होना क्या खराब बात है? कोई व्यक्ति धन कमा रहा है, पूँजीपति बन रहा है तो दिक्कत क्या है? माया पंडित का कहना था कि भारत का तो नहीं पता पर यूरोप में मार्क्सवादी-नारीवादी इतिहासकारों ने मातृसत्तात्मक समाजों का साक्ष्य दिया है। सुप्रिया गायकवाड़ ने जोड़ा कि भारत में मातृसत्ता के बारे कॉमरेड शरद पाटिल ने पर्याप्त लिखा है। भूषण कोलावरे का कहना था कि स्त्री आंदोलन जाति के प्रश्न को छोड़ कर लड़ रहा है। हम एक क्यों नहीं हो सकते? कवितेन्द्र ने मातृसत्ता और मातृवंशात्मक समाजों का फर्क जानना चाहा। वर्धा से आए नृतत्वशास्त्री वीरेन्द्र यादव ने बताया कि प्रारंभिक समाज यौनमुक्त समाज था। तब यह जान पाना असंभव था कि पिता कौन है। इसलिए, वह समाज मातृवंशात्मक कहा गया। सत्ता का नियामक तत्व है निर्णय लेने का अधिकार। जिसका डिसीजन उसकी सत्ता। अगर आज महिलाएं डिसीजन ले पा रही हैं तो यह समाज मातृसत्तात्मक कहा जाएगा। चर्चा का समापन करते हुए चंचल चौहान ने कहा कि गुरुग्रंथ साहब में ज्ञानी की परिभाषा ‘आप पिछाणे ग्यानी सोय’ कहकर की गई है। जो खुद को पहचाने वही ज्ञानी है। नाबराबरी के फलसफे से मुक्ति को ही मुख्य मानना चाहिए। जब अपनी जाति में किसी को सुकून मिल रहा हो तो वह उसे तोड़ना क्यों चाहेगा? नाबराबरी का उन्मूलन तभी होगा जब इसके उत्स को समझ लिया जाए।

प्रणय कृष्ण
आठवें सत्र में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव और प्रखर आलोचक प्रणय कृष्ण ने वक्तव्य दिया। प्रणय जी ने कहा कि जाति का उन्मूलन जाति की जमीन पर खड़े रह कर नहीं किया जा सकता। आंबेडकर ने इस समाज व्यवस्था के तीन आधार माने थे- पुरोहित वर्ग द्वारा की गई बाड़ेबंदी, जातितंत्र की निरंतरता और आर्थिक असमानता। वर्ग, जाति और जेंडर भिन्न-भिन्न डिब्बे नहीं हैं। ये अन्तर्ग्रथित हैं। उम्मीद की गई थी कि सामंतवाद ख़त्म होगा तो जाति प्रथा ख़त्म हो जाएगी। अंग्रेजों से यह उम्मीद की गई थी। कार्ल मार्क्स के डिसपैचेज में कहीं-कहीं यह संकेत झलकता है। ऐसा नहीं हुआ। कैपीटलिज्म को जाति से, पितृसत्ता से काम है। आजादी के सत्तर साल बाद भी सर पर मैला धोने की प्रथा कायम है। यह एक जाति विशेष के जिम्मे है। जातिप्रथा नहीं रहेगी तो इतना सस्ता श्रम कहाँ से मिलेगा? क्या स्त्री-पुरुष के बीच असमानता को पूँजीवाद मिटाना चाहेगा? उसने तो पितृसत्ता के अपने संस्करण का निर्माण किया है! आज दो नारे चलन में हैं- स्वच्छता अभियान और स्मार्ट सिटी। स्वच्छ कौन बनाएगा? स्मार्ट सिटी को ग्रीन कौन बनाएगा? इसमें जाति का प्रश्न विचारणीय क्यों नहीं है? टेक्नोलॉजी तो तब आएगी जब उससे फायदा हो! एल.पी.जी. (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) व्यवस्था को बनाए रखेंगे। ऊना काण्ड की चर्चा करते हुए प्रणय ने जिग्नेश मेवाणी की हर दलित को 5-5 एकड़ जमीन की मांग को उचित ठहराया। उनका कहना था कि जमीन का सवाल आंबेडकर के लिए भी महत्त्वपूर्ण था। पटेल, जाट और मराठा आंदोलन को उन्होंने नव उदारवादी मॉडल की विफलता का परिणाम बताया। नव उदारवाद को हिंदुत्व पसंद क्यों है? वे समरसता को इसलिए चाहते हैं कि वह समानता का प्रश्न ओझल कर देता है। तमिलनाडु में गारमेंट वर्कर्स का मुद्दा उठाते हुए प्रणय ने कहा कि महिलाएं इन फैक्टरियों में काम करती हैं। उन्हें आराम का एक मिनट भी नहीं मिलता। अपने साथ मोबाइल फोन नहीं रख सकतीं। वे सामाजिक रूप से दलित हैं इसलिए डोसाइल वर्कर्स हैं। उन्हें बनाए रखना बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए जरूरी है। इंडिविजुअल लिबर्टी ली जा सकती है परंतु कलेक्टिव लिबर्टी की इजाजत नहीं है। आंबेडकर कहते थे कि लिबर्टी ने इक्वलिटी को खा लिया। नियो लिबरल निजाम चाहता है कि पितृसत्ता बनी रहे। स्त्री की सेक्सुअलिटी की सीमा बाँध दी गई। पुरुषों पर कोई प्रतिबंध नहीं। यह सभी समाजों में है। सिस्टम में इनबिल्ट है। दबंग और दलित पुरुष स्त्री के सवाल पर एक हो जाते हैं। सम्पत्तिशाली अपनी जाति को एकजुट रखने के लिए ऑनर किलिंग का इस्तेमाल करते हैं। जाति, वर्ग और जेंडर तीनों चीजें डिब्बाबंद नहीं हैं। प्रणय ने कहा कि जाति उन्मूलन के बिना वर्ग संघर्ष संभव नहीं है। उन्होंने अन्तरजातीय विवाह को आवश्यक बताते हुए ऐसा करने वालों को प्रोत्साहन, सुरक्षा और अनुकूल माहौल देने की मांग की।

चर्चा सत्र में डॉ. अभय कुमार ने कहा कि रामदेव बाबा अगर योग को स्थापित कर रहे हैं तो क्या दलित फूड स्थापित नहीं हो सकता? जाति का प्रश्न उठाने के लिए धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि क्या जेएनयू छात्र आंदोलन को फिर से वर्ग, जाति व जेंडर को लेकर सक्रिय नहीं होना चाहिए? डॉ. अजीत प्रियदर्शी ने नवउदारवाद से लड़ने के लिए असीमित उपभोग से बचने की जरूरत बताई। शोधार्थी रमा शंकर सिंह ने जानना चाहा कि गाँव की तरफ पढ़े-लिखे लोग क्यों नहीं जा रहे हैं? उन्होंने अपने इलाके में सक्रिय बालू माफिया की कार्यपद्धति की तरफ कार्यशाला का ध्यान आकृष्ट किया। राजश्री भाटापुरकर ने पूछा कि थर्ड जेंडर को जाति वर्ग के संदर्भ में कैसे समझा जाए? डॉ.चन्द्रभान सिंह यादव ने दलित चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स पर प्रश्न उठाने वालों की मंशा पर सवालिया निशान लगाया। बड़ेवद राम ने बीजेपी के कार्यकाल में दलितों पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया। उन्होंने गौरक्षकों के आतंक की गंभीरता को भी चिह्नित किया। डॉ. रूपेश कुमार सिंह ने गुजरात और महाराष्ट्र के ओबीसी आंदोलन को सही ठहराते हुए किसान समस्या का समाधान जानना चाहा। चर्चा का उपसंहार करते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि सवाल दलित पूँजीपति बनाम अन्य पूँजीपति का नहीं है। आपकी ही जाति का होने के बावजूद वह आपके वर्ग का नहीं है। उसके धनी होने से सारे दलितों का भला कैसे होगा? थर्ड जेंडर वाले प्रश्न पर उन्होंने कहा कि एलजीबीटी कम्युनिटी को समर्थन देना ही चाहिए।

सुभाषिनी अली

नवें सत्र में वामपंथी संगठनकर्ता और विचारक सुभाषिणी अली ने शिकायत दर्ज कराई कि एक लेखक संगठन द्वारा आयोजित कार्यशाला में मुख्य भूमिका रचनाकारों की होनी चाहिए, मंच उनको ही मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस कार्यशाला में दलित साहित्य पर बात नहीं हुई है। दलित और गैर दलित दृष्टि और प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि 6 दिसंबर और 14 अप्रैल के बारे में गैर दलित जानते तो हैं मगर कभी वहाँ जाते नहीं। कोरेगांव युद्ध के महार शहीदों की स्मृति को मूल्यवान बताते हुए सुभाषिणी ने कहा कि 1801-02 में अंग्रेजी सेना ने पेशवा की सेना को हरा दिया था। पेशवा की सेना में बीस हज़ार सैनिक थे। अंग्रेजों की सेना कुल दो-ढाई हज़ार सैनिकों की थी। इसे मराठा युद्ध के नाम से जाना जाता है जबकि इसका मराठों से कोई संबंध नहीं है। पेशवा सेना ब्राह्मण सेना थी। महार सैनिकों की जीत ने कई मिथ ध्वस्त किए। पहली जनवरी को कोरेगांव में मेला लगता है। वहाँ शहीद महार सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। डॉ. आंबेडकर वहाँ गए थे। सुभाषिणी ने कहा कि मुट्ठी भर सवर्ण पुरुषों को मुख्यधारा बना दिया गया है। इससे छुटकारा मिलना चाहिए। जाति के भीतर उपजाति बनने के बहुत सारे मटेरियल कंडीशंस हैं। जब नव उदारवादी दौर में असमानताएं बहुत बढ़ गई हैं तो हम नए सिरे से समाधान तलाशने में लगें। संघर्ष की नई पारी प्रारंभ करें। मार्क्सवादियों का आंबेडकर के पास जाना अपेक्षित था। क्लास की चर्चा में दलित महिलाओं का सवाल आना चाहिए। नव उदारवादी तंबू इनके शोषण के सहारे ही खड़ा हुआ है। महिला को अपने श्रम की कोई कीमत नहीं मिलती है। उसे बस सेवा करते रहना है। घर में, घर के बाहर। आशा कार्यकर्ता बन कर, आंगनबाड़ी वर्कर बन कर, रसोइया बन कर। शर्त यही है कि अपने श्रम का मानदेय न मांगो। मार्क्स महिलाओं को रिप्रोडक्शन ऑफ़ सोसाइटी कहते हैं। समाज के पुनर्निर्माण का कार्य महिलाएं करती हैं। वे पूँजीपतियों को स्वस्थ मजदूर मुहैया कराती हैं। गाँव में पशुपालन उनके जिम्मे है। चारा काटना, गोबर फेंकना, दूध दुहना आदि। मगर वे उन पशुओं की मालिक नहीं हैं। खेतों में निराई, कटाई उनके माथे है। वे मनरेगा में खपती हैं। पुरुष गर्मी से बच कर हुक्का पीते हैं। राजस्थान सहित तमाम राज्यों में यह आम दृश्य है। एसपी, बीएसपी आदि राजनीतिक दल पूँजीवाद समर्थक है। ये शोषणकारी सिस्टम के खिलाफ क्यों खड़े होंगे? अमेरिका में 1% लोगों के हाथ में 99% संसाधन हैं। भारत में 10% के हाथ में 76% सम्पत्ति है। एंगेल्स ने लिखा है कि जब प्राइवेट प्रॉपर्टी और स्टेट के कुछ फॉर्म उभरने लगे तो पितृसत्ता ने मातृसत्ता को ओवरथ्रो किया। भाजपा के सत्ता में आने से बहुत से मुखौटे हट गए हैं। वे तो घोषित मनुवादी हैं। हाल की बड़ी हड़तालें आश्वस्त करती हैं। वर्गीय पहचान पैदा हो रही है, मजबूत हो रही है। अब स्त्रियों, दलितों और दलित स्त्रियों को नेतृत्व में लाने की सख्त जरूरत है।

कार्यशाला के प्रतिभागी
सुभाषिणी के वक्तव्य पर हुई चर्चा में मराठी लेखिका और कार्यकर्ता स्वाती ने सवाल किया कि दलित महिलाएं अपनी सामाजिक पहचान छोड़ कर ही मजदूर के रूप में, वर्ग के रूप में क्यों आगे आएं? सुप्रिया गायकवाड़ ने कोरेगाँव की स्मृति को ठीक से समझने की जरूरत बताई। अभय कुमार ने पूछा कि बंगाल में लेफ्ट की सरकार रही। वहाँ महिषासुर की पूजा नहीं होती जबकि केरल में महाबली पूजे जाते हैं। ऐसा अन्तर क्योंकर है? वीरेन्द्र सिंह यादव ने कहा कि सरकारें ओबीसी की संख्या सामने नहीं ला रही हैं। वे डरी हुई हैं। ओबीसी बहुत बड़ी संख्या में हैं। अपनी प्रतिक्रिया में सुभाषिणी ने कहा कि हर इलाके की अपनी कुछ खासियत होती है। केरल में लोग महाबली को प्यार करते हैं। पूजा नहीं करते। महिषासुर की पूजा की परम्परा झारखण्ड में है, बंगाल में नहीं है। स्त्री श्रम के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि वर्ग चेतना आ रही है, यह मान लेना चाहिए। दलित महिलाएं अपनी सामाजिक पहचान भी रखें और श्रम को, वर्ग को भी जानें। दलित समाज के भीतर आरएसएस बहुत गहरे तक काम कर रहा है। हम नहीं जानते। समाज की बहुत-सी परतें हैं। इन परतों से लड़ना है। मायावती के आने से पहले सारे ठेकेदार सवर्ण थे। मायावती ने दलित और मुलायम सिंह ने ओबीसी ठेकेदारों को मौका दिया। आंबेडकर गाँवों में सड़कें आ गईं। कुछ तो हुआ! हाँ, मूल ढाँचा बदल गया हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। जाति का उदय समाज को तोड़ने के लिए हुआ है इसलिए जाति तंत्र तोड़ना अनिवार्य है।   

कामरेड बादल सरोज
अंतिम ग्यारहवें सत्र में मार्क्सवादी कार्यकर्त्ता बादल सरोज ने कहा कि हम अपने फ्रेम का निर्माण यथार्थ के अनुसार करें। रीयलिटी को फ्रेम के अनुरूप न काटे-छाटें। परिवर्तन का मुख्याधार वर्ग संघर्ष है लेकिन यह मशीनी मामला नहीं है। यह सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार होता है। परिस्थितियाँ मिलती हैं, चुनी नहीं जातीं। हर क्रांति के आइकान (आदर्श नायक) होते हैं। सामाजिक आंदोलनों के नायक चुने जाते हैं। अगर हम क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते हैं तो हम अपना आइकान चुनें। फुले-आंबेडकर हमारे आइकान हो सकते हैं। कबीर भी हो सकते हैं। यही हमारी क्रांति के लोकोमोटिव होंगे।

अखबारों में रपट

समापन सत्र में प्रतिभागियों ने कार्यशाला पर अपने अभिमत दिए। कवितेन्द्र इंदु ने थोड़े तंजिया लहजे में कहा कि हिंदी की दुनिया में जो कुछ कहा गया हो उसकी तारीफ किए जाने की परम्परा है। बाँदा कार्यशाला ने सोचने-समझने की प्रक्रिया में बुनियादी बदलाव किया। इस कार्यशाला में वह कसक गायब दिखती है जो बाँदा में प्रकाश करात के भाषण से लेकर अन्त तक बनी हुई थी। यूजीसी के पॉइंट सिस्टम ने निराश किया है। ऐसे में वैकल्पिक मंच का उभरना अपेक्षित और आवश्यक है। कभी कम्युनिस्टों की पार्टी को चमारों की पार्टी कहा जाता था। आज स्थिति कुछ और है। कम्युनिस्ट एकता चाहते हैं तब दलित दूर क्यों चले गए? क्या यह मार्क्सवादी सोच की कमी थी या भारतीय जमीन की खासियत है? या फिर, दलित समाज नासमझ है? स्त्रियों की अधीनता का सवाल सबसे पेचीदा है। स्त्रियाँ अकेली ऐसी समुदाय हैं जो अपने लड़ने वाले के साथ रहने को बाध्य हैं। भारतीय समाज व्यवस्था में जाति और जेंडर घुले मिले हैं। इन्हें अलग कर के न देखा जाए। कार्यशाला में भाषा प्रयोग को लेकर लापरवाही की शिकायत कवितेन्द्र ने की। उन्होंने कहा कि विषय ओपन न रहे। वक्ताओं को तय विषय दिए जाएं। कार्यशाला आयोजन का यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। स्वाती ने कहा कि उन्होंने पिछली कार्यशाला की चर्चा सुनकर इस कार्यशाला में शामिल होने का फैसला लिया। यहाँ बहुत सी बातें सीखने को मिली हैं। रहने की व्यवस्था बहुत अच्छी थी। ऋषिकेश सिंह ने कहा कि कई नए मुद्दों की ओर इस कार्यशाला ने ध्यान दिलाया। स्त्रियों के श्रम का प्रश्न केंद्रीय होना चाहिए। कार्यशाला के शीर्षक में प्राथमिकता का क्रम ऋषिकेश को दिक्कततलब लगा। डॉ. अभय कुमार ने कहा कि मैं वामपंथी आंदोलन से दूर था। आप ने मुझे जोड़ा। वर्ग को जाति से पीछे करने पर उन्हें दिक्कत होगी ही। अब जाति और जेंडर अपनी जगह मांगेंगे। दलित राजनीति की स्थिति पर उन्होंने कहा कि वहाँ बँटवारा हो रहा है। चमार, दुसाध, धोबी अपनी गुटबंदी कर रहे हैं। अभय जी की शिकायत थी कि कार्यशाला में हिंदू कोड बिल की चर्चा होनी चाहिए थी जो नहीं हुई। गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका किंगसन सिंह पटेल ने वक्ताओं के चयन पर खुशी जाहिर की। उनका कहना था कि यहाँ विश्लेषण अच्छा हुआ है। अस्मिता विमर्श पर काम करते हुए उन्हें जिन प्रश्नों से मुखातिब होना पड़ता है, इस कार्यशाला ने विषय से जूझने में उन्हें और समृद्ध किया है। ‘अस्मिता विमर्श को मैं पर्याप्त और बहुत कामयाब मानती थी। उसकी प्रशंसक भी थी। मगर अब पुनर्विचार की जरूरत महसूस हो रही है। खानों में बांट कर लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है।’ कार्यशाला में यह प्रश्न क्यों नहीं उठा कि स्त्री को ही ससुराल क्यों आना पड़ता है? क्या पुरुष नहीं आ सकता? संपत्ति में स्त्री की भागीदारी की बात किसी ने नहीं उठाई। स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के छात्र कोत्तबरे भूषण रमेश ने कहा कि यहाँ आने से पहले उन्हें विषय स्पष्ट नहीं था। अब हम असमानता के खिलाफ एक होकर लड़ेंगे और जीतेंगे। यहाँ की आयोजन व्यवस्था बहुत अच्छी थी। इसी विश्वविद्यालय के बड़ेवद राम ने कहा कि अब सूरत बदलनी चाहिए। जनवादी लेखक संघ के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि समस्या की जड़ तक जाने में अभी और कोशिश करनी होगी। नांदेड़ से आए एम.ए. के छात्र सोनकांबले साहेब सतवाजी का विचार था कि कार्यशाला में सिर्फ प्रश्न ही नहीं उठाए गए हैं, उनका जवाब भी दिया गया है। नांदेड़ से आए शोधार्थी सूर्यवंशी रावसाहेब ने इलाहाबाद में मिली आत्मीयता की खास तौर पर चर्चा की। जलेस का अभिवादन करते हुए उन्होंने प्रणय कृष्ण की इस बात को यादगार माना कि जाति से बाहर आ कर ही जाति उन्मूलन संभव है। प्राध्यापिका राजश्री भाटापुरकर ने इलाहाबाद के लोगों को नारियल की तरह बताया जो बाहर से कठोर दिखते हैं परंतु भीतर उससे उलट होते हैं। उनका कहना था कि अगर वे यहाँ न आतीं तो एक सार्थक मौका गँवा देतीं। जो प्रश्न उठे हैं उनका समाधान कैसे हो; इस सवाल के साथ वे वापस लौट रही हैं। शोध छात्रा प्रिया भारती ने कहा कि यह विषय का तीव्र आकर्षण ही था जो उन्हें बनारस से यहाँ खींच लाया। आयोजकों ने कोई औपचारिकता नहीं की, सब सहजता से संपन्न हुआ। उन्होंने कहा कि दिक्कत यह है कि स्त्री स्त्री से ही लड़ती जा रही है। वह अपना टाइटल नहीं हटाना चाहती। वरिष्ठ वामपंथी ट्रेड यूनियन नेता हरिश्चंद्र द्विवेदी ने कार्यशाला की सफलता प्रतिभागियों के अभिमत में तलाशी। उनका कहना था कि पिछली बाँदा कार्यशाला की तुलना में यह कार्यशाला हड़बड़ी में आयोजित हुई है। डॉ. चंद्रभान सिंह यादव ने कहा कि वर्ण, जाति, वर्ग और जेंडर का वर्चस्व टूटना चाहिए। मीडिया में स्त्रियों पर जो प्रतिबंध लगे हुए हैं उन पर कार्यशाला में कोई चर्चा नहीं हुई है। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को याद रखना चाहिए जो जाति को तोड़ने के लिए था। भारत में पिछड़ा वर्ग 52 फीसद है। उसमें यादव और कुर्मी ही नहीं हैं। अति पिछड़ी जातियों की दशा बहुत ख़राब है। उनकी चर्चा होनी चाहिए। प्रतिभागियों को उनके अभिमत के लिए धन्यवाद देते हुए बजरंग बिहारी ने कहा कि यह कार्यशाला वास्तव में संयोजक कॉमरेड सुधीर सिंह और उनकी टीम की लगन और कर्मठता का नतीजा है जो तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद इसे पूरी सफलता से आयोजित कर सके।

प्रतिभागियों की एक सामूहिक तस्वीर
जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उप महासचिव संजीव कुमार ने प्राप्त प्रस्ताव पढ़े और उन्हें कार्यशाला के सम्मुख विचारार्थ प्रस्तुत किया। महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए। कार्यशाला के स्थानीय संयोजक सुधीर सिंह ने सबको धन्यवाद दे कर कार्यशाला के समापन की घोषणा की।

बजरंग बिहारी




सम्पर्क -

मोबाईल - 09868261895

ई-मेल - bajrangbihari@gmail.com
फोटो  : सुधीर सिंह की फेसबुक वाल से साभार

टिप्पणियाँ

  1. इलाहाबाद कार्यशाला की विस्तृत रपट के संदर्भ में कृपया एक सुधार नोट कर लें-
    संजय जोशी जी के वक्तव्य में आए इस वाक्य-
    "दीपा धनराज और आनंद पटवर्धन ने करीब तीस वर्ष लगाकर 1986 में बाबूलाल भुइयां की कुर्बानी नामक फिल्म बनाई।"
    की जगह यह वाक्य रहेगा-
    "मंजीरा दत्ता ने झारखंड के अति पिछड़े लोगों पर 'बाबूलाल भुइयां की कहानी' नामक फिल्म बनाई।"

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रमाशंकर सिंह का आलेख 'उत्तर प्रदेश के घुमन्तू समुदायों की भाषा और उसकी विश्व-दृष्टि'