लाल बहादुर वर्मा का आलेख ‘जनतन्त्र और कुलीनता’।

लाल बहादुर वर्मा



भारत दुनिया का सब से बड़ा जनतन्त्र है। जनतन्त्र की राह में सबसे बड़ा अवरोध होता है– ‘अभिजात्यता-बोध’। ‘अभिजात्यता-बोध’ का मतलब है बड़े होने का एक झूठा-बोध। एक आधार-रहित दंभ। यह दम्भ जातीय, नस्लीय, धार्मिक, विद्वता, धन-संपत्ति आदि से कुछ इस तरह निर्मित होता है, कि हमारे आत्म में गहरे तक पैठ कर जाता है और हमें इसकी भनक तक नहीं लगती। कुल मिला कर यह बोध मानवताविरोधी वह बोध है जो पूरी तरह असमानता और अवमानना की क्रूर भावना पर आधारित है। यह बोध अवैज्ञानिक होने के बावजूद तमाम लोगों में अपनी पैठ बनाए हुए है। दुनिया में इस अवैज्ञानिक और आतार्किक बोध के खिलाफ कई क्रान्तियाँ तक सम्पन्न हो चुकी हैं जिसमें फ्रांसीसी क्रांति सबसे महत्वपूर्ण है। फ्रांसीसी क्रांति जिसका नारा ही था– ‘स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातृत्व’। एक समय अंग्रजों तक ने अन्य देशों पर अपने शासन के औचित्य को तार्किक ठहराने के क्रम में ‘व्हाईट मैन्स बर्डन’ का सिद्धांत गढ़ लिया था। कई एक देशों में अंग्रेजी शासन की हकीकत आज सामने है। बहरहाल सच्चे मायने में लोकतन्त्र या जनतन्त्र ही इस नारे को अपने आप में क्रियान्वित करता है। विगत कुछ महीनों से हम पहली बार पर प्रख्यात इतिहासकार प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा के लेख निरन्तर प्रस्तुत कर रहे हैं। इस बार उनका आलेख इस ‘जनतन्त्र और कुलीनता’ पर ही आधारित है और इसकी तहकीकात करने की एक सफल कोशिश इस आलेख में उन्होंने की है। तो आइए आज पढ़ते हैं प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा का यह महत्वपूर्ण आलेख ‘जनतन्त्र और कुलीनता’।   
             

जनतन्त्र और कुलीनता

लाल बहादुर वर्मा


आज जनतन्त्र की राह में जो व्यवधान हैं, उन पर बात करना चाहता हूँ। 

कुलीनता वैसे तो व्यवधान लगती ही नहीं पर जनतन्त्र की राह में यह बहुत बड़ी बाधा है। पिछले दिनों रोहित वेमुला नाम के विद्यार्थी की आत्म-हत्या देश के सामने बहुत से सवाल छोड़ गयी। सोचने पर मुझे यह लगता है कि वह भी कुलीनता का ही शिकार हुआ। इस समय में हर वह व्यक्ति कटघरे में खड़ा है, जो कुलीनता के केवल सकारात्मक पक्ष को देखता है। कुलीनता एक सकारात्मक रूप से इतना प्रेरक शब्द लगता है कि सब लोग कुलीन हो जाये तो क्या बुरा है? लेकिन कुलीनता के मर्म में जो विभाजकता है। सब कुलीन नहीं हो सकते, क्यों कि सब कुलीन हो जायेंगे तो कुलीनता का मतलब नहीं रह जायेगा। 

कुलीन की व्याख्या करने के लिए जरूरी है कि बहुत से लोग अकुलीन हो। कुलीन की व्याख्या करने से पहले यह बता दूं कि कुलीनता का मतलब है, जन्म पर आधारित श्रेष्ठता। आप चाह कर कुलीन नहीं बन सकते। भले ही बड़े धर्मात्मा हों। जैसे-मुझे नहीं लगता कि अम्बेडकर को कोई कुलीन कहेगा, चाहें उन्हों ने कितना भी श्रेष्ठ काम क्यों न किया हो? गाँधी को भी पारम्परिक कुलीनों ने कुलीन नहीं माना, भले ही मजबूरी में पैर भी छूते रहे हो। इसका सम्बन्ध सारी दुनिया में खानदानियत से है। इस तरह के मुहावरे भी बने हैं, जैसे-अच्छे खून का मालूम पड़ता है, जब कि खून तो अच्छा या बुरा होता नहीं है। इस तरह कुलीनता या श्रेष्ठता-बोध हमारे जन-तन्त्र को कैंसर की तरह ग्रसे हुए है। जिसका हाल-फिलहाल कोई इलाज नहीं दिख रहा है।




पिछले 200 वर्षों में मानवता ने जो कुछ अर्जित किया है, वह पिछले 2,000 सालों में नहीं हो सका। आज दुनिया में जितने लोग प्रबुद्ध हैं, उतना आज से पहले की नहीं थे और यह सब जन-तन्त्र के कारण ही सम्भव हो सका। हिटलर ने भी जन-तन्त्र की दुहाई दी, एक ऐसे जन-तन्त्र की जहाँ आर्यों की श्रेष्ठता बनी रहे। उसने भी कुलीनता को ही हथियार बनाया। आर्य जाति को ही एकमात्र कुलीन जाति कहा और उसने कहा कि जो सबसे कुलीन हैं, जो सबसे श्रेष्ठ हैं, उसे ही राज करने का अधिकार मिलना चाहिए और पहलू यूरोप पर फिर सारी दुनिया पर वह अपना तन्त्र लादता रहा, लेकिन आर्यों के हित में जन-तन्त्र की ही बात करता था। नेपोलियन ने सारे यूरोप को जीतने के बाद एक राजघराने में शादी की। महज इसलिए कि वह न सही उसकी सन्तान कुलीन मानी जाये। परिवारवाद जो जनतन्त्र के मार्ग में खड़ा है। वह सारतः क्या है? अपने को कुलीन मान कर अपने ही द्वारा शासन चलाते रहने की एक बहुत बेतुकी और अलोकतान्त्रिक कोशिश है।

इलाहाबाद में जो भी छात्र सिविल सेवा की तैयारी करने आते हैं, वह एक अर्थ में कुलीन बनने आते हैं और यह कुलीनता केवल सकारात्मक अर्थों में श्रेष्ठ बनने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह दूसरे को धक्का दे कर आगे बढ़ने वाली श्रेष्ठता है। प्रतियोगिता तो कुलीनता का ही प्रपंच है। जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहाँ जो जीतने के लिए साथ वालों को लंगड़ नहीं मारी जा रही।



जो लोग जन्मना कुलीन हैं, वह संस्कृति में, नीतियों, वे यह प्रयास करते हैं कि कुलीनता को नियमबद्ध करें। जाति प्रथा और क्या है? इस से भारत की प्रतिभा का कितना नुकसान हो रहा है कि हम सभी से लगातार पिछड़ते जा रहे हैं।

जनतन्त्र केवल कुछ लोगों के श्रेष्ठ होने से फलीभूत नहीं हो सकता है। जन-तन्त्र का मूल तत्व है, समानता और स्वतन्त्रता और इन दोनों के समन्वय से पैदा हुआ भ्रातृत्व। जन-तन्त्र में पूरा समाज अपने को रचता है, उस में कोई राजा, कोई पुरोहित समाज को नहीं रचता है, बल्कि उसे ऐसे अवसर प्रदान किये जाते हैं कि वह रच सके। कुलीनता, संकीर्णता, अज्ञान और अंधविश्वास अवसर को खत्म करते हैं, प्रतिभा को खत्म करते हैं। राज-तन्त्र आपको आपकी सम्भावनाओं से परिचित नहीं होने देता है। जन-तन्त्र ऐसी व्यवस्था है, जो आप को, आप की सम्भावनाओं से परिचित कराती है। मैं स्थापित जन-तन्त्र का प्रवक्ता मात्र नहीं हूँ। जन-तन्त्र जीवन में, विचारों में होना चाहिए। मैं ऐसे जनतन्त्र की बात कर रहा हूँ, जो पूरी दुनिया को सर्जक बनाता है, सृजनशील बनाता है। 

सम्पर्क-
मोबाईल - 09454069645

(इस आलेख में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

टिप्पणियाँ

  1. श्रेष्ठ आलेख. विडंबना यह है कि कुलीनता का यह संस्कार उन वर्गों में भी दिखने लगा है जो इससे पहले तक अकुलीन यानी शूद्र वर्ग में गिने जाते थे. जनतांत्रिक समझ की कमी, लोगों के मन और विचारों का जनतांत्रिकरण करने में नाकाम रही है. इस कारण हम आज अनेक समस्याओं से रू—ब—रू हैं.

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